तुमसे बिछड़ने के बाद मैंने जाना,
ख़ालीपन हमेशा अकेलेपन से नहीं आता,
कभी-कभी वो उस जगह से आता है
जहाँ पहले किसी की अहमियत बसी होती है।
हम दोनों ने रिश्ता बचाने की बातें बहुत की थीं,
मगर शायद रिश्ते बातें नहीं,
लगातार की गई कोशिशों से बचते हैं।
तुम्हारे जाने का दुख कुछ महीनों में कम हो गया,
लेकिन तुम्हारे साथ देखे गए सपनों को
अलविदा कहने में बहुत वक़्त लगा।
पहले मैं हर बात तुम्हें बताता था,
अब कई बातें सिर्फ़ मेरे भीतर रह जाती हैं,
और हैरानी ये है कि
इंसान इस ख़ामोशी का भी आदी हो जाता है।
तुम्हारी कमी ने मुझे कमज़ोर नहीं किया,
लेकिन उसने मुझे बदल ज़रूर दिया,
अब मैं लोगों की मौजूदगी को
पहले से कहीं ज़्यादा क़ीमती मानता हूँ।
कभी-कभी कोई पुराना गीत सुनकर
तुम याद नहीं आते,
बल्कि वो दौर याद आता है
जब ज़िंदगी थोड़ी आसान लगती थी।
हमारा रिश्ता एकदम से नहीं टूटा,
पहले बातें छोटी हुईं,
फिर मुलाक़ातें कम हुईं,
और आख़िर में हम एक-दूसरे की आदत से निकल गए।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने बहुत लोगों से मुलाक़ात की,
मगर हर नया चेहरा ये स
तुम्हारे जाने के बाद सबसे पहले
घर की कोई चीज़ नहीं बदली थी,
बदला था तो बस मेरा इंतज़ार,
जो हर शाम बिना वजह दरवाज़े तक चला जाता था।
हमने एक-दूसरे को अलविदा कहा ज़रूर था,
मगर सच तो ये है,
कुछ रिश्ते आवाज़ से नहीं,
धीरे-धीरे उम्मीदों के कम होने से ख़त्म होते हैं।
पहले तुम्हारा नाम देखकर मुस्कान आ जाती थी,
फिर एक दौर आया जब दर्द होता था,
अब बस एक पुरानी याद जैसा लगता है,
शायद यही वक़्त का सबसे शांत इलाज है।
तुम्हारी कमी से ज़्यादा
मुझे उस इंसान की कमी महसूस हुई,
जो तुम्हारे साथ रहते हुए
भविष्य को लेकर इतना निडर था।
कभी सोचा नहीं था कि
इतनी सारी बातें करने वाले दो लोग,
एक दिन इतने अजनबी हो जाएँगे
कि ख़ामोशी भी बोझ न लगे।
तुम्हारे बाद मैंने जाना,
हर बिछड़ना किसी की ग़लती नहीं होता,
कभी-कभी लोग साथ चलने की कोशिश करते हैं,
मगर उनकी मंज़िलें अलग होती हैं।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब हुई,
जब कोई अच्छी ख़बर मिली
और मैंने आदतन तुम्हें बताने के बारे में सोचा,
फिर याद आया कि अब वो जगह खाली है।
तुम्हारे दिए हुए वादों से शिकायत नहीं,
शिकायत बस इतनी है
कि मैंने उन्हें सच मानकर
अपने कई फ़ैसले बदल दिए थे।
मैंने बहुत दिनों तक ये समझने की कोशिश की
कि आख़िर क्या कम रह गया,
फिर महसूस हुआ,
हर रिश्ता किसी वजह से नहीं टूटता।
अब तुम्हारी याद आती है
तो मैं उसे रोकता नहीं,
कुछ यादों का गुज़र जाना ही बेहतर होता है,
उन्हें हर बार समझाना नहीं।
तुम्हारे जाने के बाद
मैं लोगों को खोने से डरने लगा था,
फिर धीरे-धीरे समझ आया,
हर नया रिश्ता किसी पुराने दर्द की सज़ा नहीं होता।
हमारी आख़िरी बातचीत याद नहीं,
लेकिन वो आख़िरी अपनापन याद है
जब अभी भी लगता था
कि चाहे कुछ भी हो, हम साथ रहेंगे।
कभी-कभी सोचता हूँ,
अगर हम थोड़ा और खुलकर बात करते,
तो शायद कहानी कुछ और होती,
मगर शायद यही सोच आगे बढ़ने नहीं देती।
तुम अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं हो,
लेकिन मेरी समझ का हिस्सा ज़रूर हो,
क्योंकि कुछ लोग चले जाने के बाद भी
बहुत कुछ सिखा जाते हैं।
पहले मैं तुम्हें वापस चाहता था,
अब बस तुम्हारे लिए सुकून चाहता हूँ,
शायद मोहब्बत का परिपक्व होना ऐसा ही होता है।
तुम्हारी यादें अब घाव नहीं,
बस पुराने मौसम जैसी हैं,
जो आते हैं, गुज़र जाते हैं,
और कुछ देर तक मन में ठहर जाते हैं।
मुझे अब ये साबित नहीं करना
कि मैं कितना टूटा था,
कुछ दर्द जितने गहरे होते हैं,
उन्हें उतनी ही ख़ामोशी से जिया जाता है।
तुम्हारे बाद मैंने ख़ुद से मिलना शुरू किया,
और पाया कि
मैंने रिश्ते को बचाने में
ख़ुद को बहुत पीछे छोड़ दिया था।
हर कहानी का अधूरा रहना दुखद नहीं होता,
कुछ कहानियाँ पूरी होकर भी खाली रह जाती हैं,
और कुछ अधूरी होकर भी बहुत कुछ दे जाती हैं।
अब अगर कोई पूछे
कि क्या मैं तुम्हें भूल गया हूँ,
तो जवाब होगा—
नहीं, बस तुम्हें याद करने का तरीक़ा बदल गया है।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ
तो दर्द से ज़्यादा शुक्रिया महसूस होता है,
क्योंकि तुम रहे भी मेरी ज़िंदगी में,
और तुम्हारे जाने से मैं बदला भी।
कुछ रिश्ते टूटते नहीं,
बस एक दिन बातों से एहसास गायब हो जाता है,
और फिर हम महीनों तक उसी रिश्ते का जनाज़ा
अपने भीतर उठाए फिरते हैं।
तुम्हारे जाने के बाद समझ आया,
किसी को खोना उतना मुश्किल नहीं होता,
जितना उस भविष्य को छोड़ना
जो हमने उसके साथ मिलकर सोचा था।
पहले हर छोटी बात तुम्हें बताने का मन करता था,
अब अच्छी ख़बर भी आती है
तो कुछ पल ख़ामोश रह जाता हूँ,
क्योंकि आदत अभी तक तुम्हारा नाम ढूँढ़ती है।
हम दोनों ग़लत नहीं थे शायद,
बस जिस मोड़ पर तुम पहुँचे,
मैं वहाँ तक पहुँच नहीं पाया,
और जिस जगह मैं ठहरा रहा,
तुम्हारे पास वहाँ रुकने की वजह नहीं थी।
तुम्हारे बाद मैंने ख़ुद को बहुत समझाया,
कि सब ठीक हो जाएगा,
मगर सच तो ये है कि
कुछ चीज़ें ठीक नहीं होतीं,
बस इंसान उनके साथ जीना सीख जाता है।
कभी-कभी पुराने संदेश नहीं,
पुरानी मासूमियत याद आती है,
वो भरोसा कि जो आज साथ है,
वो कल भी यहीं होगा।
तुम्हारे साथ बिताए हुए दिन
अब दुख नहीं देते,
लेकिन जब याद आते हैं,
तो ये एहसास ज़रूर दिला जाते हैं
कि खुशी भी हमेशा के लिए नहीं ठहरती।
हमने आख़िरी बार बात कब की थी,
ये तो याद नहीं,
मगर आख़िरी बार तुम्हें अपना समझा था,
वो दिन आज भी याद है।
रिश्ते ख़त्म होने के बाद
इंसान सामने वाले को नहीं,
ख़ुद को सबसे ज़्यादा सवालों में घेर लेता है,
क्या थोड़ा और रुक सकता था,
क्या थोड़ा और समझ सकता था।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने लोगों को नए तरीक़े से देखना शुरू किया,
अब मैं शब्दों से ज़्यादा
लगातार निभाए गए व्यवहार पर भरोसा करता हूँ।
सबसे ज़्यादा दर्द उस दिन हुआ था,
जब तुम्हारी याद नहीं आई,
क्योंकि तब समझ आया
कि सचमुच एक दौर ख़त्म हो चुका है।
तुमसे जुड़ी चीज़ें संभालकर रखी थीं,
फिर एक दिन महसूस हुआ,
यादों को सुरक्षित रखना और
उनमें कैद रहना, दोनों अलग बातें हैं।
हम दोनों ने एक-दूसरे को खोया,
फ़र्क़ बस इतना है,
तुमने एक इंसान खोया होगा,
मैंने अपने कई सपने भी खो दिए थे।
अब अगर कभी मुलाक़ात हो,
तो शिकायतें नहीं करूँगा,
क्योंकि वक़्त ने सिखा दिया है
कि हर जवाब माँगना ज़रूरी नहीं होता।
तुम्हारी कमी अब शोर नहीं करती,
बस कुछ ख़ामोश लम्हों में
अपनी मौजूदगी दर्ज करवा देती है,
जैसे कोई पुराना गीत दूर से सुनाई दे जाए।
मैंने बहुत देर से ये सीखा,
कि किसी को चाहना और
किसी को रोककर रखना,
दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
कभी लगता था तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊँगा,
फिर दिन बीते,
महीने गुज़रे,
और ज़िंदगी ने चुपचाप मुझे ग़लत साबित कर दिया।
कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में
साथ निभाने नहीं,
हमें बदलने आते हैं,
तुम शायद उन्हीं लोगों में से थे।
जो बातें तुम्हें कभी नहीं कह पाया,
वो अब भी मेरे भीतर हैं,
लेकिन अब उन्हें कहने की बेचैनी नहीं,
सिर्फ़ उनकी मौजूदगी है।
तुम्हारे बाद मैंने ख़ुद का साथ देना सीखा,
क्योंकि हर बार टूटने पर
कोई दूसरा हाथ थामने नहीं आता।
सबसे कठिन काम भूलना नहीं था,
सबसे कठिन काम ये स्वीकार करना था
कि जिस कहानी पर मुझे भरोसा था,
उसका अंत मेरे मन जैसा नहीं होगा।
अब तुम्हारा नाम सुनकर
दिल नहीं धड़कता,
मगर एक पल के लिए वक़्त ज़रूर ठहर जाता है।
हमारी तस्वीरें मिटा दीं,
संदेश भी हटा दिए,
मगर कुछ रिश्ते फ़ोन से नहीं,
आदतों से निकलते हैं।
तुम्हें खोकर मैंने ये जाना,
कि प्यार हमेशा साथ रहना नहीं होता,
कभी-कभी प्यार का आख़िरी रूप
चुपचाप जाने देना भी होता है।
पहले मैं सोचता था
तुम क्यों बदल गए,
अब सोचता हूँ
लोग बदलते नहीं,
बस धीरे-धीरे अपने असली रूप में आ जाते हैं।
कई बार तुम्हारी याद इसलिए नहीं आती
कि मैं तुम्हें वापस चाहता हूँ,
बल्कि इसलिए कि
कुछ मौसम अपने साथ पूरे दौर वापस ले आते हैं।
आज भी जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो अफ़सोस कम होता है,
क्योंकि रिश्ता भले अधूरा रहा,
मगर उसमें की गई मोहब्बत सच्ची थी।
कभी तुम्हारे संदेश आते थे तो दिन का रंग बदल जाता था,
अब पूरा दिन गुज़र जाता है और कुछ भी नहीं बदलता,
अजीब है न,
इंसान से ज़्यादा उसकी मौजूदगी की आदत छूटने में वक़्त लगता है।
हमारा बिछड़ना किसी लड़ाई का नतीजा नहीं था,
बस एक दिन महसूस हुआ कि
हम दोनों एक ही रिश्ते में रहकर
दो अलग-अलग कहानियाँ जी रहे हैं।
तुम्हें खोने का दुख उतना नहीं था,
जितना उस यक़ीन के टूटने का
कि कुछ लोग हमेशा साथ रहते हैं,
ज़िंदगी ने उसी भ्रम को सबसे पहले मुझसे वापस लिया।
अब तुम्हारी याद आती है तो मुस्कुरा भी लेता हूँ,
क्योंकि हर स्मृति दर्द नहीं देती,
कुछ यादें बस इतना बताती हैं
कि कभी किसी को पूरी सच्चाई से चाहा था।
मैंने तुम्हें माफ़ इसलिए नहीं किया कि भूल गया हूँ,
मैंने माफ़ इसलिए किया
क्योंकि हर वक़्त पुराने घाव उठाकर चलना,
तुम्हारे जाने से भी ज़्यादा थका देने वाला था।
हमने बिछड़ने का फ़ैसला किसी एक दिन नहीं लिया था,
वो तो धीरे-धीरे हुआ—
जब बातें ज़रूरत बन गईं और सुनना आदत से उतर गया,
जब साथ होने के बावजूद हम एक-दूसरे तक पहुँचना छोड़ बैठे।
आज भी कुछ जगहें तुम्हारी याद नहीं दिलातीं,
बल्कि उस इंसान की याद दिलाती हैं
जो तुम्हारे साथ रहते हुए मैं हुआ करता था,
शायद मुझे तुमसे ज़्यादा
हमारा वो रूप खोने का दुख है।
तुमने जाते वक़्त कोई बड़ा ज़ख्म नहीं दिया,
बस कुछ अधूरे जवाब छोड़ गए,
और अजीब बात ये है कि
इंसान दर्द से नहीं,
अक्सर उन्हीं सवालों से ज़्यादा थकता है
जिनका जवाब कभी नहीं मिलता।
एक वक़्त था जब भविष्य की हर बात में "हम" हुआ करते थे,
फिर ऐसा भी वक़्त आया
जब तुम्हारे अगले दिन की ख़बर भी मुझ तक नहीं पहुँची,
रिश्ते अचानक नहीं टूटते,
पहले उनमें से ख़बर लेना बंद हो जाता है।
मैंने बहुत दिनों तक तुम्हें भूलने की कोशिश की,
फिर समझ आया—
भूलना किसी इंसान का अंत नहीं,
उससे जुड़े अर्थ का बदल जाना है,
अब तुम्हारी याद आती है,
मगर पहले जैसी बेचैनी नहीं आती।
कुछ वादे झूठ नहीं होते,
बस उन्हें निभाने वाले लोग बदल जाते हैं,
इसलिए अब मैं तुम्हें ग़लत नहीं ठहराता,
बस इतना मानता हूँ कि
हम दोनों की कहानी,
हम दोनों की चाहत से लंबी नहीं थी।
तुम्हारे जाने के बाद मैंने जाना,
हर खोना सिर्फ़ कमी नहीं छोड़ता,
कुछ बिछड़नें इंसान को अपने भीतर लौटना भी सिखाती हैं,
और जो सीख दर्द देकर मिले,
वो उम्र भर साथ रहती है।
अब अगर कभी तुम्हारा ज़िक्र आता है,
तो दिल में शोर नहीं उठता,
बस एक हल्की-सी ख़ामोशी गुजरती है,
जैसे कोई पुराना घर याद आ जाए—
जहाँ अब रहा नहीं जा सकता,
मगर जिसे बुरा भी नहीं कहा जा सकता।