माँ के चरणों तक झुकना मुझे रिवाज़ नहीं लगता,
यह तो अपने अस्तित्व का एहसास लगता है,
जिसने हर मोड़ पर थामे रखा मेरा हाथ,
उसके आगे झुकना सम्मान लगता है।
माँ के चरणों में सिर रखकर जो सुकून मिलता है,
वह किसी शब्द में बयाँ नहीं होता,
दुनिया की सारी भागदौड़ के बाद भी,
ऐसा ठहराव कहीं और नहीं होता।
जब भी जीवन ने मुझे उलझनों में डाला,
माँ की सीख रास्ता बन गई,
मैंने कदम तो अपने बढ़ाए थे,
पर मंज़िल उसकी दुआ से आसान हो गई।
माँ के चरणों की धूल भी अनमोल लगती है,
क्योंकि उसमें वर्षों की ममता बसी होती है,
हम जिसे साधारण समझ लेते हैं,
वहीं सबसे बड़ी दौलत छिपी होती है।
माँ ने कभी अपने उपकार नहीं गिनाए,
न कभी अपने प्रेम का हिसाब रखा,
मैं जितना समझदार होता गया,
उतना ही उसका कर्ज़ गहरा लगता गया।
जब भी अपने बारे में सोचता हूँ,
माँ की परछाईं नज़र आती है,
मेरी अच्छी आदतों में कहीं न कहीं,
उसकी परवरिश मुस्कुराती है।
माँ के चरणों तक पहुँचने से पहले,
अक्सर मेरा अहंकार झुक जाता है,
क्योंकि उसके त्याग को याद करते ही,
मन अपने आप विनम्र हो जाता है।
माँ ने मुझे चलना सिखाया था,
फिर गिरकर संभलना भी सिखाया,
आज दुनिया मेरी सफलता देखती है,
मैं उसमें उसकी सीख देखता हूँ।
उसके चरणों में बैठकर कभी महसूस किया है,
कि प्रेम कितना शांत हो सकता है,
बिना कुछ कहे भी कोई इंसान,
किसी का पूरा संसार हो सकता है।
माँ का आशीर्वाद कोई शब्द नहीं,
यह जीवन भर साथ चलने वाला विश्वास है,
जब भी हिम्मत कम पड़ने लगती है,
यही विश्वास मेरी ताकत बन जाता है।
माँ के चरणों में झुकते समय,
मैं केवल सम्मान नहीं करता,
मैं उन अनगिनत रातों का धन्यवाद करता हूँ,
जो उसने मेरी चिंता में जागकर बिताईं।
मेरे हर अच्छे निर्णय में,
कहीं न कहीं माँ की सीख शामिल है,
उसने सिर्फ़ बातें नहीं सिखाईं,
जीवन जीने का तरीका दिया है।
माँ के चरणों तक पहुँचना,
मानो अपनी जड़ों तक लौट आना है,
जहाँ प्रेम में कोई शर्त नहीं होती,
और अपनापन कभी कम नहीं होता।
मैंने दुनिया में बहुत सम्मान देखे,
बहुत बड़े पद और पहचानें भी,
पर माँ के सामने झुकने में जो गर्व है,
वह किसी उपलब्धि में नहीं मिला।
माँ की ममता का मूल्य क्या होगा,
यह प्रश्न ही अधूरा लगता है,
जिस प्रेम ने मुझे गढ़ा हो,
उसे शब्दों में मापना छोटा लगता है।
उसके चरणों में बैठकर अक्सर,
अपना बचपन लौट आता है,
वही सुरक्षा, वही अपनापन,
जो उम्र के साथ भी नहीं बदलता।
माँ ने कभी ऊँची बातें नहीं कीं,
बस सादगी से जीवन जीया,
और उसी सादगी ने मुझे,
इंसानियत का सबसे बड़ा पाठ दिया।
माँ के चरणों का सम्मान इसलिए नहीं,
कि यह परंपरा है,
बल्कि इसलिए कि वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते,
दिल कृतज्ञता से भर जाता है।
जब दुनिया मेरी कमियाँ ढूँढ़ती रही,
माँ मेरी अच्छाइयों पर भरोसा करती रही,
उस विश्वास के आगे आज भी,
मेरा सिर आदर से झुक जाता है।
माँ के चरणों में जो विनम्रता है,
वह किसी पुस्तक में नहीं मिलती,
उसके जीवन को पढ़कर ही,
सच्चे संस्कार समझ आते हैं।
मुझे ऊँचा उड़ना सिखाने वाली भी वही थी,
और ज़मीन से जुड़े रहना सिखाने वाली भी,
इसलिए उसके चरणों तक झुकना,
मेरे लिए गर्व की बात है।
माँ का प्रेम कभी शोर नहीं करता,
फिर भी सबसे गहरा होता है,
उसके चरणों में बैठकर समझ आता है,
कि अपनापन कितना सुंदर होता है।
मैंने कई बार उसे थका हुआ देखा,
पर कभी शिकायत करते नहीं देखा,
उसकी यही ख़ामोश मजबूती,
आज भी मुझे प्रेरणा देती है।
माँ के चरणों में सिर झुकाकर,
मैं कोई वरदान नहीं माँगता,
बस इतना चाहता हूँ,
कि उसका स्नेह हमेशा मेरे साथ रहे।
यदि जीवन की सबसे पवित्र जगह पूछो,
तो मैं कोई स्थान नहीं बताऊँगा,
मैं कहूँगा, जहाँ माँ का आशीर्वाद मिले,
वहीं मेरा सबसे बड़ा सम्मान है।