ऐ ज़िंदगी,
तूने मुझे कभी सीधे उत्तर नहीं दिए,
बस हालात दिए,
और उन्हीं में छिपे अर्थ ढूँढने पड़े।
मैंने तुझसे पूछा,
"सब कुछ इतनी जल्दी क्यों बदल जाता है?"
तूने पुराने चित्र सामने रख दिए,
और मैं ख़ुद ही चुप हो गया।
ऐ ज़िंदगी,
पहले तेरे हर फ़ैसले पर सवाल था,
अब हर अनुभव में
कोई न कोई वजह दिखने लगी है।
तू भी कमाल है,
जिस दिन लगता है
कि अब तुझे समझ लिया,
उसी दिन कोई नया अध्याय खोल देती है।
ऐ ज़िंदगी,
तेरी सबसे बड़ी सीख
किसी किताब में नहीं मिली,
वह लोगों के आने-जाने में मिली है।
मैंने कहा,
"कुछ लोग हमेशा साथ क्यों नहीं रहते?"
तूने जवाब दिया,
"ताकि उनकी अहमियत हमेशा रहे।"
ऐ ज़िंदगी,
कभी तूने मुझे भीड़ दी,
कभी एकांत,
और सच कहूँ,
दोनों की ज़रूरत थी।
जब मैं अपने अधूरेपन से परेशान हुआ,
तूने धीरे से कहा,
"पूर्णता नहीं,
प्रगति देखो।"
ऐ ज़िंदगी,
तेरे साथ चलते हुए
यह समझ आया
कि हर खुशी का शोर होना ज़रूरी नहीं।
मैंने तुझसे शिकायत की,
"तू बहुत बदल गई है।"
तू हँसी और बोली,
"मैं नहीं,
तेरी नज़र बदल गई है।"
ऐ ज़िंदगी,
कभी तूने मेरा धैर्य परखा,
कभी मेरा विश्वास,
और दोनों ही मेरे काम आए।
जब मैंने कहा,
"बहुत देर हो गई",
तूने पूछा,
"किससे तुलना करके?"
ऐ ज़िंदगी,
तेरे कुछ सबसे सुंदर उपहार
मुझे उस समय मिले,
जब मैं उनकी उम्मीद भी नहीं कर रहा था।
मैंने पूछा,
"क्या हर बिछड़ना दुख देता है?"
तू बोली,
"नहीं,
कुछ बिछड़नें समझ देती हैं।"
ऐ ज़िंदगी,
तेरे साथ सबसे कठिन काम
आगे बढ़ना नहीं,
स्वीकार करना रहा है।
जब मैं पीछे छूटे दिनों को देखकर रुका,
तूने कंधे पर हाथ रखकर कहा,
"याद रखो,
वे दिन गए हैं,
बेकार नहीं गए।"
ऐ ज़िंदगी,
तूने मुझे यह भी सिखाया
कि कुछ सवालों का उत्तर
समय नहीं,
अनुभव देता है।
मैंने कहा,
"मुझे डर लगता है बदलाव से।"
तू बोली,
"फिर अपने पुराने रूप को याद करो,
वह भी तो कभी नया था।"
ऐ ज़िंदगी,
तेरी एक बात मुझे बहुत पसंद है,
तू हर टूटन के बाद
इंसान को वैसा नहीं रहने देती।
जब मैंने अपने संघर्ष गिनाए,
तूने मेरी ताक़तें याद दिला दीं।
ऐ ज़िंदगी,
पहले मैं हर घटना को
अच्छा या बुरा कहता था,
अब बस उसे
अपनी कहानी का हिस्सा मानता हूँ।
मैंने पूछा,
"क्या मैं सही चल रहा हूँ?"
तूने कोई दिशा नहीं बताई,
बस भीतर का भरोसा थोड़ा और मज़बूत कर दिया।
ऐ ज़िंदगी,
तेरे साथ गुज़रे वर्षों ने
मुझे यह एहसास दिया
कि शांति हमेशा परिस्थितियों में नहीं मिलती।
जब मैं अपनी कमियों से नाराज़ हुआ,
तूने कहा,
"यही तो जगह है
जहाँ अभी बढ़ना बाकी है।"
ऐ ज़िंदगी,
तेरी सबसे बड़ी खूबसूरती
तेरी अनिश्चितता में छिपी है,
क्योंकि अगर सब पहले से तय होता,
तो हैरानी कहाँ से आती?
और आज,
तुझसे कोई बड़ी माँग नहीं,
बस इतना चाहता हूँ—
जब तक यह सफ़र चले,
मैं सीखता रहूँ,
महसूस करता रहूँ,
और तेरा शुक्रगुज़ार बना रहूँ।
ऐ ज़िंदगी,
एक बात पूछूँ तुझसे,
जो लोग सबसे ज़्यादा सिखाते हैं,
वे अक्सर सबसे कम देर क्यों ठहरते हैं?
तूने जवाब तो नहीं दिया,
मगर कुछ खाली कुर्सियाँ छोड़ दीं,
और मैं समझ गया।
ऐ ज़िंदगी,
पहले जब तू मेरी योजनाएँ बदल देती थी,
तो बहुत शिकायत होती थी,
अब लगता है
तुझे मुझसे ज़्यादा अनुभव था।
ऐ ज़िंदगी,
तू अजीब हमसफ़र है,
जब मैं जल्दी में होता हूँ
तू ठहरा देती है,
और जब रुकना चाहता हूँ
तू आगे बढ़ा देती है।
ऐ ज़िंदगी,
तेरे साथ एक समझौता कर लिया है,
अब हर बात का कारण नहीं पूछूँगा,
कुछ अनुभवों को
बस अनुभव रहने दूँगा।
ऐ ज़िंदगी,
कभी तूने खाली हाथ लौटाया,
तो कभी उम्मीद से ज़्यादा दिया,
अब हिसाब नहीं रखता,
बस सफ़र याद रखता हूँ।
मैंने तुझसे पूछा,
"क्या मैं सही दिशा में हूँ?"
तूने कोई निशान नहीं दिखाया,
बस अगला कदम रखने की हिम्मत दे दी।
ऐ ज़िंदगी,
तेरी सबसे कठिन आदत यह है
कि तू जवाब देर से देती है,
मगर मानना पड़ेगा,
जब देती है तो गहरा देती है।
कभी लगता था
तू मुझे रोक रही है,
आज समझता हूँ,
तू मुझे तैयार कर रही थी।
ऐ ज़िंदगी,
तूने बहुत से लोग मिलवाए,
कुछ ने साथ दिया,
कुछ ने सीख,
और दोनों ही मेरे काम आए।
मैंने तुझसे कहा,
"थोड़ा आसान हो जा",
तू मुस्कुरा कर बोली,
"फिर तू इतना मज़बूत कैसे बनेगा?"
ऐ ज़िंदगी,
तेरे बारे में सबसे सुंदर बात यह है
कि तू कभी एक जैसी नहीं रहती,
हर मोड़ पर
एक नया नज़रिया दे जाती है।
जब मैं अपने अधूरे सपनों को देखकर उदास हुआ,
तूने धीरे से याद दिलाया,
कि कुछ पूरे हुए सपनों का धन्यवाद भी बाकी है।
ऐ ज़िंदगी,
पहले मैं तुझसे जीतना चाहता था,
अब बस तुझे समझना चाहता हूँ।
मैंने पूछा,
"क्या सब कुछ अपने समय पर होता है?"
तूने उत्तर नहीं दिया,
बस कुछ पुराने अफ़सोस
बेअसर कर दिए।
ऐ ज़िंदगी,
तेरे साथ चलते-चलते
मैंने यह सीखा है
कि हर ठहराव रुकना नहीं होता।
जब मैं अपने पुराने दिनों को याद करता हूँ,
तू चुप रहती है,
शायद क्योंकि कुछ बातें
सिर्फ़ महसूस की जाती हैं।
ऐ ज़िंदगी,
तूने मुझे बहुत कुछ नहीं दिया होगा,
मगर जो समझ दी है,
उसकी कीमत शब्दों में नहीं है।
मैंने तुझसे शिकायत की,
"सब कुछ वैसा क्यों नहीं हुआ जैसा सोचा था?"
तूने पूछा,
"अगर हो जाता,
तो क्या तू वही इंसान होता?"
ऐ ज़िंदगी,
तेरे साथ मेरा रिश्ता अब अजीब-सा सुकून देता है,
हर बात पसंद नहीं आती,
मगर हर बात से कुछ सीख मिल जाती है।
और आज,
तुझसे कोई सवाल नहीं है,
बस इतना कहना है—
तू जैसी भी रही,
तेरे साथ चलते-चलते
मैं खुद से थोड़ा ज़्यादा परिचित हो गया हूँ।
ऐ ज़िंदगी,
तू मंज़िल नहीं,
एक लंबी बातचीत है,
जो उम्र भर चलती है,
और हर साल
थोड़ी और समझ आने लगती है।
कभी मैं तुझसे नाराज़ था,
कभी हैरान,
कभी परेशान,
और अब अधिकतर समय
बस तुझे सुनता हूँ।
ऐ ज़िंदगी,
तेरी सबसे बड़ी खूबसूरती शायद यही है—
तू हमें वह नहीं बनाती
जो हमने सोचा था,
तू हमें वह बना देती है
जिसे हम रास्ते में खोज लेते हैं।
मैंने तुझसे कहा,
"बहुत कुछ बदल गया है",
तू बोली,
"हाँ,
मगर देख,
तू अब भी चल रहा है।"
ऐ ज़िंदगी,
तेरे साथ यह सफ़र अभी पूरा नहीं हुआ,
मगर इतना तय है—
अब मैं तुझसे डरता कम हूँ,
और तुझ पर भरोसा थोड़ा ज़्यादा करता हूँ।