Dard Bhari Zindagi Shayari
कभी-कभी पूरा दिन लोगों के बीच गुजरता है,
फिर भी शाम को लगता है
जैसे किसी ने मेरा हाल पूछा ही नहीं।
कुछ बोझ ऐसे होते हैं
जिन्हें उठाने में ताक़त नहीं लगती,
फिर भी वे इंसान को भीतर से थका देते हैं।
अब दुख अचानक नहीं आता,
वह पुराने परिचित की तरह आता है,
चुपचाप बैठता है
और बिना कुछ कहे बहुत कुछ याद दिला जाता है।
ज़िंदगी ने कई बार गिराया,
मगर सबसे मुश्किल गिरना वह था
जब भरोसा अपनी ही उम्मीदों से उठ गया।
कई बातों का दुख इसलिए नहीं हुआ
कि वे खो गईं,
दुख इसलिए हुआ
क्योंकि उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की थी।
कुछ रिश्तों का अंत झगड़ों से नहीं होता,
वे बस धीरे-धीरे
बातों की कमी में खो जाते हैं।
मैंने अपने हिस्से की खामोशी में
कई तूफ़ान गुज़ारे हैं,
लोगों को सिर्फ़ शांत चेहरा दिखा।
कुछ दिनों में
थकान का कारण काम नहीं होता,
बस लगातार मज़बूत बने रहना होता है।
जो लोग कहते हैं
सब ठीक चल रहा है,
अक्सर वही अपने भीतर
सबसे ज़्यादा बातें दबाए होते हैं।
अब पुराने घाव नहीं दुखते,
मगर मौसम बदलते ही
उनकी याद फिर जाग जाती है।
ज़िंदगी ने कभी एक साथ नहीं तोड़ा,
उसने थोड़ा-थोड़ा करके
बहुत कुछ बदल दिया।
कुछ इंतज़ार ऐसे थे
जिनकी कोई मंज़िल नहीं थी,
फिर भी बरसों तक साथ चले।
कभी अपनी ही आवाज़ अजनबी लगती है,
जब बहुत समय तक
दिल की बात दिल में ही रह जाए।
कुछ दर्दों की सबसे बड़ी तकलीफ़
उनका होना नहीं,
उनका किसी को समझा न पाना है।
मैंने कई लोगों को खोया नहीं,
वे बस वहाँ नहीं रहे
जहाँ मैंने उन्हें हमेशा के लिए रखा था।
उम्र के साथ ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं,
मगर कुछ अधूरेपन भी साथ बड़े हुए।
अब किसी से बहुत उम्मीद नहीं रखता,
क्योंकि उम्मीद टूटने से पहले
इंसान बहुत कुछ खो देता है।
कई बार लगा कि अब सब संभल गया,
फिर ज़िंदगी ने कोई पुराना पन्ना खोल दिया।
कुछ यादें तस्वीरों में नहीं रहतीं,
वे रोज़मर्रा की छोटी आदतों में छिपी रहती हैं।
सबके सामने सहज रहना आसान है,
अपने साथ अकेले बैठना मुश्किल।
मैंने देखा है,
सबसे गहरी उदासी शोर नहीं करती,
वह सामान्य दिखने की कोशिश करती है।
कुछ सपने पूरे न होने का दुख नहीं,
दुख यह है कि उनके लिए जिया बहुत था।
अब शिकायतें कम हैं,
मगर इसका मतलब यह नहीं
कि तकलीफ़ें कम हो गई हैं।
ज़िंदगी ने मुझे सिखाया
कि हर टूटन दिखाई नहीं देती,
कुछ दरारें सिर्फ़ महसूस होती हैं।
कभी-कभी मन किसी इंसान को नहीं,
अपने पुराने स्वरूप को ढूँढता है।
जो बातें पहले बहुत ज़रूरी लगती थीं,
आज उनका न होना भी
जीवन को नहीं रोकता।
कुछ हारें ऐसी थीं
जिन्होंने किसी और को नहीं,
मुझे मेरी सीमाएँ दिखाईं।
मैंने अपने दर्द को छिपाना नहीं सीखा,
बस उसे हर जगह ले जाना छोड़ दिया।
कई साल लग गए समझने में
कि हर साथ हमेशा का नहीं होता,
और हर बिछड़ना दुश्मनी नहीं होता।
अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो सबसे कठिन दिन ही
सबसे स्पष्ट याद आते हैं।
कई दिनों से बस निभा रहा हूँ ज़िंदगी,
जीने जैसा कुछ हुआ नहीं,
सुबहें आती रहीं,
मगर किसी बात का इंतज़ार नहीं आया।
अब थकान सिर्फ़ शरीर में नहीं रहती,
कुछ बोझ ऐसे हैं
जो रात भर तकिये पर नहीं,
सोचों पर रखे रहते हैं।
लोग पूछते हैं सब ठीक है ना,
और मैं हाँ कह देता हूँ,
क्योंकि हर दर्द
बातों में समझाया नहीं जा सकता।
कुछ सपने इतने धीरे-धीरे टूटे,
कि आवाज़ भी नहीं हुई,
बस एक दिन महसूस हुआ
कि अब उनके बारे में सोचना बंद हो गया है।
ज़िंदगी ने मुझे रोकर नहीं,
चुप रहकर ज़्यादा बदला है,
कई बातें ऐसी थीं
जिन्हें सहना पड़ा, कहना नहीं।
अब किसी से शिकायत करने का मन नहीं करता,
क्योंकि जिन बातों ने सबसे ज़्यादा दुख दिया,
उनमें किसी एक का दोष नहीं था।
कुछ रिश्ते छूटे,
कुछ भरोसे कम हुए,
और सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की हुई
कि इंसान हर चीज़ का आदी हो जाता है।
कभी-कभी भीड़ में खड़े होकर लगता है,
जैसे मेरी गैरमौजूदगी से
किसी दिन का क्रम भी नहीं बदलेगा।
जो मुस्कान लोग देखते हैं,
वह खुशी की निशानी नहीं हमेशा,
कई बार वह सिर्फ़
बातों को वहीं खत्म करने का तरीका होती है।
ज़िंदगी का सबसे भारी हिस्सा शायद यह नहीं
कि दुख बहुत हैं,
बल्कि यह है कि
उनकी आदत पड़ने लगती है।
कुछ यादें अब रुलाती नहीं,
मगर भीतर कहीं बैठी रहती हैं,
जैसे पुराने घर की दीवारों में
नमी रह जाती है।
मैंने देखा है,
सबसे ज़्यादा टूटे हुए लोग ही
दूसरों का हाल सबसे पहले पूछते हैं।
कई रातें ऐसी गुज़रीं
जहाँ कोई बड़ी परेशानी भी नहीं थी,
फिर भी मन पर एक अनकहा बोझ रखा था।
अब उम्मीदें बहुत बड़ी नहीं रखता,
क्योंकि हर बार निराशा नहीं मिली,
मगर हर उम्मीद पूरी भी नहीं हुई।
कुछ दर्दों की कोई कहानी नहीं होती,
वे बस धीरे-धीरे इंसान की आवाज़,
आदत और नज़र में उतर जाते हैं।
समय ने बहुत कुछ सिखाया,
मगर इसकी फीस भी कम नहीं थी,
कई अपने,
कई भरोसे,
और कई मासूम उम्मीदें चली गईं।
कभी लगता है
मैं वही इंसान हूँ,
फिर किसी पुरानी तस्वीर पर नज़र पड़ती है
और समझ आता है कि बहुत कुछ बदल चुका है।
ज़िंदगी से हारने का मन नहीं,
मगर हर दिन लड़ने की ताक़त भी
पहले जैसी नहीं बची।
कुछ लोग चले गए,
कुछ बातें अधूरी रह गईं,
और कुछ सवाल आज भी वहीं हैं
जहाँ सालों पहले थे।
अब दर्द से डर नहीं लगता,
बस इतना चाहता हूँ
कि जो भीतर जमा है,
उसे ढोते-ढोते खुद को खो न दूँ।