कभी-कभी मुझे लगता है कि ज़िंदगी गुज़र नहीं रही,
बस अपने ही दोहराए हुए सवाल बदल रही है।
मैंने बहुत बार ख़ुद को समझाया,
मगर दिल को यक़ीन से ज़्यादा शक़ पसंद था।
अजीब है कि इंसान सच की तलाश करता है,
और सच मिलते ही उससे नज़रें चुराने लगता है।
ज़िंदगी ने मुझे दुख से नहीं थकाया,
मुझे उम्मीद और हक़ीक़त के फ़ासले ने थकाया है।
कुछ लोग चले गए,
और उनके जाने से ज़्यादा उनकी जगह का खाली रहना खला।
मैंने ख़ुद को कई नाम दिए,
मगर कोई भी मेरी पूरी पहचान न बन सका।
वक़्त ने यह नहीं बताया कि मैं कौन हूँ,
उसने बस यह दिखाया कि मैं कौन नहीं हूँ।
कभी-कभी तन्हाई कमरे में नहीं होती,
वह उन बातों में होती है जो कही नहीं जातीं।
ज़िंदगी से मेरी कोई दुश्मनी नहीं,
बस हमारी समझ कभी एक जैसी नहीं हुई।
मैंने बहुत कुछ हासिल किया,
फिर भी एक अनाम कमी मेरे साथ रही।
जो बातें कभी यक़ीन लगती थीं,
आज उन्हीं पर सबसे ज़्यादा सवाल हैं।
अजीब रिश्ता है मेरा ख़ुद से,
मैं उम्र भर अपने ही पीछे चलता रहा।
कुछ ख़्वाहिशें पूरी होने के बाद भी अधूरी रहीं,
शायद उन्हें मंज़िल नहीं, मायने चाहिए थे।
मैंने लोगों को नहीं खोया,
मैंने उनके बारे में अपने भ्रम खोए हैं।
ज़िंदगी अक्सर वहाँ ख़ामोश हो जाती है,
जहाँ इंसान सबसे सच्चे जवाब चाहता है।
कई बार लगता है कि मैं बदल गया हूँ,
फिर याद आता है कि मैं कभी तय ही नहीं था।
तन्हाई का सबसे गहरा रंग तब दिखता है,
जब इंसान ख़ुद से भी बातें कम कर दे।
मैंने हर दर्द का कारण जानना चाहा,
और हर जवाब ने एक नया सवाल पैदा कर दिया।
ज़िंदगी ने मुझे सुकून कम दिया,
मगर सोचने के लिए बहुत कुछ दे दिया।
कुछ रिश्ते ख़त्म नहीं होते,
वे बस अपनी परिभाषा बदल लेते हैं।
मैंने ख़ुद को समझने में आधी उम्र लगा दी,
और आधी उम्र इस बात पर कि शायद समझना ज़रूरी भी नहीं था।
अजीब है कि हम स्थिरता चाहते हैं,
जबकि हमारे भीतर सब कुछ बदलता रहता है।
वक़्त गुज़र गया,
मगर कुछ एहसास आज भी उसी दिन में खड़े हैं।
ज़िंदगी का सबसे मुश्किल सच शायद यह है,
कि हर सवाल का जवाब मिल जाए, तब भी बेचैनी बची रहती है।
आख़िर में मुझे यही लगा,
हम ज़िंदगी नहीं जीते, हम उसे समझने की कोशिश में जीते रहते हैं।
ज़िंदगी भर ख़ुद को समझने में लगा रहा,
और जब कुछ समझ आया, तब यक़ीन नहीं रहा।
अजीब बात है,
हम जिन जवाबों की तलाश करते हैं, वही हमें बेचैन रखते हैं।
मैंने ज़िंदगी से शिकायत भी की,
और उसी से उम्मीद भी बाँधे रखी।
वक़्त गुज़रता गया,
मगर कुछ सवाल उम्र से बड़े निकले।
कई बार ऐसा लगा कि मैं बदल गया हूँ,
फिर सोचा, शायद मैं पहली बार सामने आया हूँ।
ज़िंदगी की सबसे पेचीदा गिरह यह है,
इंसान ख़ुद से भी पूरी तरह वाक़िफ़ नहीं होता।
हम जिन चीज़ों को अपना समझते हैं,
अक्सर वही सबसे पहले अजनबी हो जाती हैं।
दिल को सुकून चाहिए था,
मगर उसने सच जानने की ज़िद कर ली।
कुछ ख़्वाहिशें पूरी हो गईं,
और तब मालूम हुआ कि मसला ख़्वाहिश का नहीं था।
मैंने तन्हाई से बचने की बहुत कोशिश की,
फिर देखा, सबसे लंबी बातचीत उसी से होती है।
ज़िंदगी कोई राज़ नहीं खोलती,
वह बस पुराने यक़ीन तोड़ती रहती है।
कभी-कभी लगता है कि हम जी नहीं रहे,
बस अपने बारे में बनी हुई राय निभा रहे हैं।
जो लोग मुझे जानते थे,
शायद वे भी मेरे अंदाज़े ही जानते थे।
वक़्त ने बहुत कुछ बदल दिया,
सिवाय उस खाली जगह के जो वजह माँगती है।
मैंने ख़ुद को कई बार मनाया,
मगर कुछ उदासियाँ तर्क नहीं मानतीं।
ज़िंदगी का बोझ दुख नहीं होता,
कई बार उसका अर्थ खोजने की कोशिश होती है।
कुछ रिश्ते टूटते नहीं,
बस अपनी अहमियत खो देते हैं।
मैंने हर मोड़ पर ख़ुद को पाया भी है,
और हर बार थोड़ा कम समझा है।
अजीब है कि इंसान उम्र भर मुकम्मल होना चाहता है,
जबकि उसकी पहचान ही अधूरापन है।
कई दफ़ा लगा कि मंज़िल पास है,
फिर एहसास हुआ कि मैं दिशा ही नहीं जानता।
ज़िंदगी से कोई बड़ी उम्मीद नहीं रही,
मगर उससे हैरत अब भी बाकी है।
हम जिन सच्चाइयों पर गर्व करते हैं,
वक़्त उन्हें भी सवाल बना देता है।
मैंने बहुत लोगों को खोया नहीं,
बस धीरे-धीरे उनके मतलब बदलते देखे हैं।
तन्हाई हमेशा लोगों की कमी नहीं होती,
कभी-कभी वह ख़ुद की मौजूदगी का एहसास होती है।
आख़िर में यही समझ आया,
शायद ज़िंदगी का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि वह पूरी तरह समझ में नहीं आती।