कई बार ज़िंदगी से लड़ते-लड़ते
इतनी थकान हो जाती है,
कि इंसान समस्या से नहीं,
सोचते रहने से हारने लगता है।
मैंने महसूस किया है,
कुछ दिनों का बोझ
घटनाओं से नहीं,
लगातार चिंता से बनता है।
ज़िंदगी की उलझनें
एक साथ नहीं आतीं,
मगर जब आती हैं
तो मन को साँस लेने की जगह कम पड़ जाती है।
कुछ बातें ऐसी हैं
जिनका हल अभी नहीं मिला,
और शायद यही बात
सबसे ज़्यादा बेचैन करती है।
मैं थका हुआ हूँ,
क्योंकि हर किसी को
अपना मज़बूत रूप दिखाते-दिखाते
खुद से मिलने का समय कम हो गया है।
कई बार मन करता है
कि कुछ देर के लिए
कोई अपेक्षा न रहे,
न खुद से, न दुनिया से।
परेशान ज़िंदगी का एक अजीब सच है,
यह इंसान को हँसना नहीं भूलने देती,
मगर खुलकर हँसना ज़रूर कम कर देती है।
मैंने देखा है,
जब ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं,
तो इच्छाएँ अक्सर चुप हो जाती हैं।
कुछ सपनों को
मैंने छोड़ा नहीं,
बस थोड़ा किनारे रख दिया है
ताकि ज़रूरी चीज़ें पूरी कर सकूँ।
ज़िंदगी से शिकायत कम है,
मगर यह सवाल अब भी है
कि सुकून इतना दुर्लभ क्यों लगता है।
कुछ थकानें ऐसी होती हैं
जिन्हें आराम नहीं,
आश्वासन चाहिए होता है।
मैंने अपने मन में
बहुत-सी अधूरी सूचियाँ बना रखी हैं,
शायद इसी वजह से
शांति पूरी तरह नहीं आती।
परेशानी हमेशा शोर नहीं करती,
कभी वह चुपचाप
हर खुशी की चमक थोड़ी कम कर देती है।
कुछ दिन ऐसे गुज़रते हैं
जहाँ कोई बड़ी मुश्किल नहीं होती,
फिर भी भीतर एक दबाव बना रहता है।
मैंने महसूस किया है,
हर बार टूटने का कारण
कोई हादसा नहीं होता,
कभी-कभी लगातार संभलते रहना भी थका देता है।
ज़िंदगी का सबसे कठिन सवाल
कई बार यह नहीं होता
कि आगे क्या करना है,
बल्कि यह कि खुद को कैसे संभालना है।
कुछ लोग मेरे हाल पूछते हैं,
और मैं "ठीक हूँ" कह देता हूँ,
क्योंकि पूरी कहानी
एक जवाब में नहीं समा सकती।
मैंने अपनी परेशानियों को
छिपाना सीख लिया है,
मगर उनसे निपटना अब भी सीख रहा हूँ।
कई बार मन सिर्फ़ इतना चाहता है
कि कोई यह समझे
कि मैं कमज़ोर नहीं,
बस थका हुआ हूँ।
परेशान ज़िंदगी ने मुझे
धैर्य से ज़्यादा
सहनशक्ति का अर्थ समझाया है।
कुछ उम्मीदें अब भी ज़िंदा हैं,
मगर वे पहले जैसी उत्साहित नहीं,
थोड़ी सावधान हो गई हैं।
मैंने जाना है,
हर संघर्ष दिखाई नहीं देता,
कुछ लड़ाइयाँ
सिर्फ़ इंसान और उसके मन के बीच होती हैं।
ज़िंदगी ने बहुत कुछ माँगा है,
और मैंने बहुत कुछ दिया भी,
मगर कभी-कभी मन पूछता है,
मेरे हिस्से की राहत कहाँ है?
कुछ चिंताएँ ऐसी होती हैं
जिन्हें शब्द नहीं मिलते,
वे बस दिन भर साथ चलती रहती हैं।
और शायद मेरी सबसे सच्ची थकान यही है—
मैं हारना नहीं चाहता,
मगर हर समय लड़ते रहना भी
आसान नहीं होता।
ज़िंदगी से मेरी शिकायत
किसी एक मुश्किल की नहीं,
बस इतना है कि
आराम के पल अक्सर बहुत छोटे मिलते हैं।
कुछ दिनों से ऐसा लगता है
जैसे मन लगातार कुछ उठाए हुए है,
मगर क्या,
यह खुद भी ठीक से नहीं जानता।
मैं थका हुआ हूँ,
किसी सफ़र से नहीं,
हर समय संभलकर रहने की आदत से।
ज़िम्मेदारियाँ अजीब होती हैं,
वे इंसान को मज़बूत भी बनाती हैं
और चुप भी।
कई बार मन करता है
कि कुछ देर के लिए
किसी को कुछ समझाना न पड़े,
यह भी एक तरह की राहत होती है।
ज़िंदगी की सबसे बड़ी उलझन
कभी-कभी समस्या नहीं,
लगातार समस्याओं के बारे में सोचते रहना होता है।
मैंने देखा है,
थकान सिर्फ़ शरीर में नहीं होती,
कुछ थकानें उम्मीदों में भी जमा हो जाती हैं।
कुछ सपने अब भी हैं,
मगर उन्हें सोचते समय
पहले जैसी चमक नहीं,
ज़िम्मेदारियों की परछाईं साथ होती है।
कई बार सब कुछ ठीक चल रहा होता है,
फिर भी मन बेचैन रहता है,
शायद हर परेशानी का कारण दिखाई नहीं देता।
मैंने अपने हिस्से की चिंता
इतनी देर तक उठाई है
कि कभी-कभी सुकून भी अजनबी लगता है।
ज़िंदगी का दबाव
हमेशा बड़ी घटनाओं से नहीं आता,
रोज़ की छोटी-छोटी चिंताएँ भी
बहुत कुछ थका देती हैं।
कुछ लोग पूछते हैं,
"सब ठीक है?"
और मन सोचता है,
"कहाँ से शुरू करूँ?"
मैंने मुस्कुराना नहीं छोड़ा,
बस हर मुस्कान के पीछे
थोड़ी ज़्यादा कोशिश लगने लगी है।
परेशान ज़िंदगी का एक सच यह भी है
कि इंसान अक्सर
अपनी ज़रूरतों को सबसे आख़िर में रखता है।
कई रातें समाधान ढूँढते गुज़रीं,
और कई सुबहें
उसी सवाल के साथ शुरू हुईं।
अब हर बात पर प्रतिक्रिया नहीं देता,
क्योंकि कुछ लड़ाइयाँ
मन के भीतर ही चल रही होती हैं।
मैंने महसूस किया है,
सबसे भारी बोझ वह नहीं
जो कंधों पर हो,
बल्कि वह जो लगातार दिमाग़ में हो।
कुछ रिश्तों की कमी,
कुछ अधूरे लक्ष्य,
कुछ अनकही चिंताएँ—
मन अक्सर इन सबका हिसाब एक साथ करता है।
ज़िंदगी से हार नहीं मानी,
मगर यह मानता हूँ
कि कुछ दिन सचमुच कठिन होते हैं।
कभी-कभी थकान का कारण
काम नहीं होता,
हर चीज़ को सही रखने की कोशिश होती है।
मैंने अपने भीतर
बहुत-सी चिंताएँ छिपा रखी हैं,
क्योंकि हर परेशानी
शब्दों में नहीं उतरती।
परेशानी का सबसे कठिन हिस्सा
दर्द नहीं,
उसका लगातार बने रहना है।
कुछ दिनों में
मन को सलाह नहीं चाहिए होती,
बस थोड़ा-सा समझा जाना होता है।
अब मैं हर समस्या का हल तुरंत नहीं ढूँढता,
कुछ चीज़ों को समय देना भी
ज़रूरी समझता हूँ।
और शायद ज़िंदगी की यह थकान
मुझे एक बात सिखा रही है—
मज़बूत होने का मतलब
हर बोझ अकेले उठाना नहीं,
बल्कि यह जानना भी है
कि कब रुककर खुद को सुनना चाहिए।