दिनभर खुद को संभालते रहे,
फिर किसी मामूली-सी बात ने भीतर का सारा बोझ छू लिया।
आँखें भर आईं तो समझ आया,
दर्द छोटा नहीं था, बस उसे जगह देने का समय नहीं मिला था।
कुछ आँसू किसी इंसान के जाने पर नहीं,
उस उम्मीद के टूटने पर आते हैं जिसे हमने चुपचाप बचाकर रखा था।
उम्मीद खत्म होते ही सब खत्म नहीं होता,
बस मन को अपनी सच्चाई स्वीकार करने में थोड़ा समय लगता है।
मैंने बहुत-सी बातें मुस्कुराकर टाल दीं,
सोचा, बाद में अपने मन को समझा लूँगा।
पर मन भी कब तक चुप रहता,
एक दिन आँखों ने सारी अधूरी बातें अपने तरीके से कह दीं।
कभी किसी की याद नहीं,
अपना पुराना रूप याद करके भी आँखें नम हो जाती हैं।
जो पहले छोटी बातों में खुश हो जाता था,
वह जिम्मेदारियों के बीच कब इतना चुप हो गया, पता ही नहीं चला।
कुछ चोटें दिखाई नहीं देतीं,
इसलिए उन्हें समझाने के लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं।
फिर आँखों में आई नमी,
बिना किसी सफाई के बता देती है कि भीतर कुछ अभी बाकी है।
सबके सामने मजबूत बने रहना आसान लगता है,
क्योंकि वहाँ खुद को संभालने की आदत होती है।
मुश्किल तब नहीं जब आँसू आते हैं,
मुश्किल तब है जब उन्हें आने की अनुमति खुद से भी नहीं देते।
आज रोया तो किसी को दोष नहीं दिया,
न परिस्थितियों को, न किसी पुराने रिश्ते को।
बस थोड़ी देर अपने साथ बैठा,
और माना कि मन भी कभी-कभी थककर सहारे की माँग करता है।
किसी ने प्यार से हाल पूछ लिया,
और आँखें अचानक भर आईं।
शायद दर्द से ज्यादा,
अपने दुख को बिना समझाए स्वीकार कर लिया जाना भावुक कर देता है।
कुछ आँसू बीती हुई बातों के होते हैं,
और कुछ उस समझ के जो बहुत देर से आती है।
पीछे लौटना संभव नहीं,
पर आगे बढ़ते हुए उन भावनाओं को सम्मान देना संभव है।
अब आँसू आएँ तो उन्हें छिपाता नहीं,
हर भावना को मजबूत दिखने की जरूरत नहीं होती।
कभी आँखों को थोड़ा बोल लेने देना,
मन को उन शब्दों से ज्यादा राहत देता है जिन्हें हम कह नहीं पाते।
कभी आँसू किसी एक वजह से नहीं आते,
उनके पीछे कई दिनों की चुप्पी जमा होती है।
एक छोटी-सी बात बस इतना करती है,
कि भीतर रखी सारी भावनाओं को बाहर आने का रास्ता मिल जाता है।
सबके बीच हँसते हुए भी मन कितना कुछ छिपा लेता है,
यह शायद वही जानता है जो अकेले में खुद को संभालता है।
लोग चेहरे की सहजता देखते हैं,
आँखों की थकान पढ़ने वाले बहुत कम होते हैं।
कुछ आँसू किसी की याद से नहीं,
खुद को लगातार समझाते रहने से आते हैं।
हर बार कहना कि कुछ नहीं हुआ,
एक दिन मन को इतना थका देता है कि आँखें सच बोल देती हैं।
कभी किसी ने पूछा भी नहीं कि भीतर क्या चल रहा है,
और मैंने भी किसी को बताना जरूरी नहीं समझा।
फिर अचानक आँखें नम हुईं,
तो लगा जैसे मन ने अपनी बात कहने का सबसे सरल तरीका चुन लिया।
जो दर्द शब्दों में ठीक से उतर नहीं पाता,
वह अक्सर आँखों तक पहुँच जाता है।
वहाँ न सफाई देनी पड़ती है,
न किसी को समझाना पड़ता है कि चोट कितनी गहरी थी।
आज आँसू आए तो खुद को कमजोर नहीं कहा,
बस थोड़ी देर शांत बैठकर उन्हें बहने दिया।
मन को हर समय संभालकर रखना जरूरी नहीं,
कभी उसे बिखरे बिना भी रो लेने की जगह चाहिए।
कुछ आँसू पुराने होते हैं,
बस उन्हें बाहर आने का समय नया होता है।
कोई छोटी-सी याद उन्हें छू देती है,
और बरसों से चुप पड़ा मन अचानक संवेदनशील हो उठता है।
कभी खुशी इतनी सच्ची होती है,
कि आँखें उसे भी संभाल नहीं पातीं।
जिस अपनापन की लंबे समय से जरूरत थी,
वह मिल जाए तो नमी भी राहत जैसी लगती है।
आँखें भर आईं तो किसी पर इल्ज़ाम नहीं रखा,
हर दुख का कोई दोषी हो, यह जरूरी नहीं।
कुछ बातें बस वैसी नहीं हुईं जैसी हमने चाही थीं,
और उन्हें स्वीकार करते हुए भी मन भर सकता है।
अब आँसू से डर नहीं लगता,
क्योंकि समझ आया है कि संवेदनशील होना हार नहीं।
जो भीतर महसूस करता है,
वही धीरे-धीरे उसे समझकर हल्का करना भी सीखता है।
कभी किसी बात पर नहीं, उसके पीछे छिपी कई बातों पर आँसू आते हैं,
एक छोटा-सा पल बस भीतर जमा वर्षों का दरवाज़ा खोल देता है।
फिर समझ आता है,
मन ने बहुत कुछ सहा था जिसे उसने कभी शिकायत नहीं बनने दिया।
दिनभर सब सामान्य रहा,
लोगों से मिला, बातें कीं, मुस्कुराया भी।
पर अकेले बैठते ही आँखें भर आईं,
शायद मन को भी किसी पल अभिनय से बाहर आना था।
कुछ आँसू यादों के नहीं,
अपने ही अधूरेपन के होते हैं।
जो बनना चाहते थे, जो कह नहीं पाए,
और जो समझते-समझते बहुत देर कर दी—सब एक साथ याद आ जाता है।
कभी किसी की कही छोटी-सी बात,
पुराना दर्द फिर से छू जाती है।
सामने वाला शायद भूल चुका होता है,
पर मन कुछ शब्दों को बहुत देर तक अपने भीतर रखता है।
मैंने अपने दर्द को हमेशा समझदारी का नाम दिया,
हर चोट पर चुप रहना सीख लिया।
फिर एक दिन आँखें भर आईं,
और लगा कि चुप रहना और ठीक होना एक बात नहीं।
कुछ आँसू खुशी के भी होते हैं,
जब कोई अपना बिना पूछे समझ लेता है कि भीतर क्या चल रहा है।
उस पल रोना दुख नहीं,
लंबे समय से संभाले हुए मन को राहत मिलना होता है।
आँखों में नमी आई तो इस बार चेहरा नहीं छिपाया,
हर भावना को दुनिया के सामने समझाना जरूरी नहीं लगा।
मैं दुखी था,
और उस सच को स्वीकार करने में अब कोई शर्म नहीं थी।
कभी पुराने संदेश या तस्वीरें नहीं,
बस कोई परिचित आवाज़ मन को वहीं पहुँचा देती है।
कुछ यादें इतनी गहरी होती हैं,
कि उन्हें याद करने के लिए किसी तस्वीर की जरूरत नहीं पड़ती।
आँसू बहने के बाद भी समस्या वहीं रहती है,
लोग वही होते हैं, परिस्थितियाँ भी तुरंत नहीं बदलतीं।
फिर भी मन थोड़ा हल्का लगता है,
जैसे भीतर दबे शब्दों को आखिर थोड़ी जगह मिल गई हो।
अब आँसू आएँ तो उन्हें रोकता नहीं,
क्योंकि हर भावना को मजबूत दिखने की कीमत पर दबाना जरूरी नहीं।
कुछ पल रो लेना भी अपने मन के प्रति ईमानदारी है,
और ईमानदारी से ही धीरे-धीरे भीतर जगह बनती है।
कुछ आँसू किसी के सामने नहीं आते,
वे तब गिरते हैं जब दिनभर निभाई हुई मजबूती उतर जाती है।
मन में जमा हर बात कही नहीं जाती,
कुछ भाव बस आँखों तक पहुँचकर अपना रास्ता बना लेते हैं।
किसी पुरानी याद ने आज अचानक छू लिया,
और आँखें बिना इजाज़त नम हो गईं।
शायद कुछ पल बीत जाने से खत्म नहीं होते,
वे भीतर अपना एक शांत-सा कोना बना लेते हैं।
मैंने बहुत बार कहा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा,
पर भीतर सच कुछ और ही था।
आँखों ने मेरी बात मानने से इनकार कर दिया,
और जो छिपाया था, उसे धीरे से बाहर रख दिया।
कभी दर्द इतना पुराना हो जाता है,
कि उसके बारे में बात करना भी थका देता है।
फिर एक छोटी-सी बात आँखें भर देती है,
और समझ आता है कि मन ने उसे अभी पूरी तरह छोड़ा नहीं।
सबके सामने हँस लेना आसान है,
मुश्किल तब होती है जब अकेले में वही मुस्कान टिकती नहीं।
आँसू उस कमजोरी का नाम नहीं,
वे उस सच्चाई का हिस्सा हैं जिसे हम दुनिया से छिपाते रहे।
कुछ चोटें दिखाई नहीं देतीं,
इसलिए लोग समझ लेते हैं कि सब ठीक है।
पर भीतर दबा हुआ एक छोटा-सा दर्द,
कभी अचानक आँखों के रास्ते बाहर आ जाता है।
आज रोया तो खुद को रोकने की कोशिश नहीं की,
हर बार मजबूत बने रहना जरूरी नहीं लगा।
जो मन में था, उसे बह जाने दिया,
और उसके बाद थोड़ी देर खुद के साथ शांत बैठा रहा।
किसी के चले जाने से ही आँसू नहीं आते,
कभी अपने ही पुराने रूप को याद करके भी आँखें भर जाती हैं।
जो इंसान कभी बहुत सहज था,
उसे जिम्मेदारियों के बीच बदलते देखना भी एक तरह का दर्द है।
आँखें नम हुईं तो कोई शिकायत नहीं की,
न किसी को दोष दिया, न खुद को।
बस इतना माना,
कि कुछ भावों को ठीक होने से पहले महसूस करना पड़ता है।
अब आँसू आते हैं तो उनसे शर्म नहीं,
क्योंकि समझ गया हूँ कि संवेदनशील होना टूट जाना नहीं।
कभी-कभी मन का बोझ कम करने के लिए,
शब्दों से पहले आँखों को बोलने देना पड़ता है।
दिनभर मुस्कुराता रहा ताकि किसी को खबर न हो,
अंदर कितनी बातें बिना कहे जमा होती रहीं।
फिर किसी ने बस इतना पूछा, “सब ठीक है?”
और आँखों ने वह कह दिया जिसे होंठों ने रोक रखा था।
कुछ आँसू किसी इंसान के लिए नहीं होते,
वे उन उम्मीदों के लिए होते हैं जिन्हें हमने बहुत सच्चाई से जिया था।
जब वे पूरी नहीं होतीं,
तो मन उन्हें शब्दों से नहीं, चुपचाप बहकर स्वीकार करता है।
कभी-कभी आँखें अचानक भर आती हैं,
बिना किसी बड़ी वजह के।
शायद मन पुराने दुखों का हिसाब नहीं रखता,
बस किसी छोटे से पल में थोड़ा बोझ बाहर कर देता है।
मैंने रोने से खुद को बहुत बार रोका,
जैसे आँसू आ जाना अपनी कमजोरी मान लिया था।
फिर समझ आया,
जो भीतर महसूस होता है उसे स्वीकार करना भी साहस है।
कुछ दर्द इतने निजी होते हैं,
कि उन्हें समझाने से ज्यादा आसान उन्हें सह लेना लगता है।
पर जब आँखें नम हो जाती हैं,
तो पता चलता है कि मन अभी भी उस बात को पूरी तरह छोड़ नहीं पाया।
चेहरे पर मुस्कान बनी रही,
आवाज़ भी सामान्य थी,
बस आँखों में एक ऐसी थकान थी
जिसे कोई पूछकर भी शायद समझ नहीं पाता।
किसी की याद आई और आँखें भर गईं,
पर इस बार खुद को रोकने की कोशिश नहीं की।
कुछ रिश्ते वापस नहीं आते,
फिर भी उनसे जुड़ी भावनाओं को रो लेने से मन थोड़ा हल्का जरूर होता है।
कभी आँसू दुख से नहीं,
बहुत देर तक मजबूत बने रहने से भी आते हैं।
हर किसी के सामने संभलकर रहने के बाद,
अपने कमरे में टूटकर रो लेना भी मन को आराम देता है।
जो बात कहनी थी, कह नहीं पाया,
जो दर्द समझाना था, समझा नहीं पाया।
शायद इसी अधूरेपन ने आँखों को बोलना सिखाया,
और मन को पहली बार अपनी सच्चाई स्वीकार करनी पड़ी।
आज आँसू आए तो उन्हें कमजोरी नहीं कहा,
बस थोड़ी देर चुप बैठकर उन्हें बहने दिया।
दर्द अभी पूरी तरह गया नहीं,
लेकिन उसे छिपाने की जरूरत कम हो गई है।