गिरे हो अगर तो खुद की नज़रों में मत गिरना,
यह बिखरना भी असल में एक नई शुरुआत की मोहलत है।
जो रास्ता सीधा हो, वहाँ पैर थिरकना भूल जाते हैं,
यह ठोकरें ही तो हैं जो सफ़र में संभलना सिखाती हैं।
जब पूरी दुनिया तुम्हारे मौन को हार समझने लगे,
तब तुम भीतर ही भीतर अपनी जड़ों को और गहरा कर लेना।
पौधे को फल देने में वक़्त लगता है मेरे दोस्त,
सिर्फ रोज़ पानी देने से रातों-रात बहार नहीं आती।
थक कर बैठ जाना कोई गुनाह नहीं है,
गुनाह है उस थकान को अपनी आख़िरी मंज़िल मान लेना।
आँखें बंद करो, एक गहरी सांस लो और फिर देखो,
तुम्हारे भीतर अब भी एक और कोशिश की जान बाकी है।
शायद इस बार भी बात न बने, शायद फिर से बिखरना पड़े,
पर उस तजुर्बे का क्या, जो हर नाकामी अपने साथ लाती है?
जीत का शोर तो बस कुछ दिनों की वाह-वाही देता है,
पर ये संघर्ष तुम्हें उम्र भर के लिए लोहे सा मजबूत बनाता है।
दूसरों की उम्मीदों के तराजू पर खुद को तोलना छोड़ दो,
तुम्हारी कहानी का अंत कोई और तय नहीं कर सकता।
जब तक तुम्हारे भीतर की आग सुलग रही है,
बाहर का कोई भी तूफ़ान तुम्हें बुझा नहीं सकता।
सूरज को भी ढलने के लिए पूरा दिन लड़ना पड़ता है,
और रात का अंधेरा ही सुबह की असली क़ीमत बताता है।
अगर आज वक़्त धुंधला है तो ज़रा सब्र रखो,
जो आज कांटों भरा रास्ता है, कल वही मंज़िल का पता बताएगा।
चुपचाप अपने काम में अपनी रूह को झोंक दो,
बदले में तारीफ मिले या आलोचना, दोनों को किनारे रख दो।
असली कामयाबी कभी शोर मचाकर नहीं आती,
वो तो बस एक दिन चुपके से तुम्हारे सब्र का हाथ थाम लेती है।
जब सब कहें कि अब कुछ नहीं हो सकता,
तब अपने दिल के किसी कोने से एक धीमी सी आवाज़ सुनना।
वो आवाज़ जो कहती है कि खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ,
क्योंकि तुम अभी मैदान छोड़कर भागे नहीं हो।
सीढ़ियाँ उनके लिए हैं जिन्हें सिर्फ छत तक जाना है,
तुम्हारी मंज़िल तो वो आसमान है जिसकी कोई सीमा ही नहीं।
फिर रास्ता छोटा हो या बड़ा, इससे क्या फ़र्क पड़ता है,
तुम्हें तो हर हाल में अपना रास्ता खुद ही बनाना है।
हारना सिर्फ एक घटना है, तुम्हारी पहचान नहीं,
इसे अपने दिल पर चोट की तरह मत लगने देना।
ये तो बस एक इशारा है कि अभी कुछ कमियाँ बाकी हैं,
उठो, उन्हें सुधारो और एक नए अंदाज़ में वापस लौटो।
जब पाँव थकने लगें और मंज़िल बहुत दूर दिखाई दे,
तब पीछे मुड़कर देखना कि तुम कहाँ से चलकर यहाँ तक आए हो।
वह पहला कदम भी तो तुमने अकेले ही उठाया था,
तो फिर आज इस मोड़ पर आकर हिम्मत कैसे हार सकते हो?
भीड़ का हिस्सा बनकर चलना बहुत आसान होता है,
वहाँ न कोई सवाल पूछता है, न कोई ज़िम्मेदारी होती है।
पर अगर तुम्हें अपनी अलग पहचान की ज़िद है,
तो अकेले चलने के इस अकेलेपन से दोस्ती करनी ही होगी।
सपने वो नहीं जो सोते हुए बंद आँखों से देखे जाएँ,
सपने तो वो ज़िद्दी ख़याल हैं जो आँखों को सोने ही न दें।
अगर कोई ख़्वाब तुम्हें अंदर से बेचैन नहीं करता,
तो समझो तुमने अभी तक कोई बड़ा सपना देखा ही नहीं।
तमाशा देखने वाले तो हर मोड़ पर खड़े मिलेंगे,
उनका काम सिर्फ तालियाँ बजाना या उँगलियाँ उठाना है।
तुम अपनी कला के जादूगर हो, अपनी धुन में मगन रहो,
एक दिन यही तमाशा देखने वाले तुम्हारी कतार में खड़े मिलेंगे।
वक़्त खराब नहीं होता, वो तो बस एक इम्तिहान लेता है,
कि तुम अपनी चाहत के लिए कितने गहरे पानी में उतर सकते हो।
जो बिखर गया वो कांच था, जो बच गया वही तो हीरा है,
अब यह तुम्हें तय करना है कि तुम्हें क्या बनकर उभरना है।
ज़िंदगी की इस किताब के कुछ पन्ने भले ही खाली या फटे हों,
पर पूरी कहानी अभी लिखी जानी बाकी है।
कल जो हुआ उसे एक पुराना सबक मानकर भूल जाओ,
आज की सुबह तुम्हारी कलम है, अपनी नई दास्तान खुद लिखो।
दर्द को अपनी कमज़ोरी मत बनने देना,
इसे वो ईंधान बनाओ जो तुम्हें आगे बढ़ने की ताकत दे।
जो इंसान अपने आंसुओं को हौसले में बदलना सीख जाता है,
उसे दुनिया की कोई भी ताकत कभी झुका नहीं सकती।
चट्टान कितनी भी भारी हो, बहते पानी के सामने टिक नहीं पाती,
क्योंकि पानी में ताकत उसकी एक बूंद की नहीं, उसके लगातार बहने की होती है।
तुम भी बस रुकना मत, हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा ही सही,
आगे बढ़ते रहना, क्योंकि ठहरा हुआ पानी अक्सर सूख जाया करता है।
लोग क्या सोचेंगे, यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है,
तुम्हारा काम है बस अपने हिस्से की ईमानदारी से मेहनत करना।
जब तुम खुद से आंखें मिलाने के काबिल हो जाओगे,
तब दुनिया की कोई भी राय तुम्हें डगमगा नहीं पाएगी।
एक आख़िरी कोशिश और सही, शायद इसी ताले की चाबी हो,
सफ़र के आख़िरी मोड़ पर आकर कभी हिम्मत मत छोड़ना।
जो लोग तैरना सीख जाते हैं, वो लहरों से डरा नहीं करते,
उठो और अपनी लहरों से कह दो कि तुम डूबने के लिए तैयार नहीं हो।
खुद को कोसना बंद करो और पैरों की धूल झाड़कर खड़े हो जाओ,
यह जो रीढ़ में दर्द है, यही कल की सबसे मजबूत ढाल बनेगा।
जब तालाब सूखने लगे तो किनारे पर बैठकर रोया नहीं करते,
पानी की तलाश में प्यासे को खुद नए कुएं खोदने पड़ते हैं।
तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि तुम कभी गिरे नहीं,
बल्कि यह है कि हर बड़ी गिरावट के बाद तुमने पहले से ज़्यादा ज़ोर से सिर उठाया।
शोर मचाने वालों को अपनी चुटकी भर कामयाबी का हिसाब मत दो,
जब घड़ा पूरा भर जाता है, तो उसकी आवाज़ अपने आप बंद हो जाती है।
जो आसानी से मिल जाए, वह सिर्फ एक समझौता होता है,
असली हकदार तो वो है जो बंद दरवाज़ों को भी अपनी ज़िद से खोल देता है।
हवा का रुख तुम्हारे खिलाफ है तो होने दो,
जड़ें जितनी पुरानी और गहरी होंगी, पेड़ उतना ही तूफानों में सीधा रहेगा।
आईने के सामने खड़े होकर ज़रा खुद की आँखों में झाँक कर देखो,
क्या सच में इस मामूली सी ठोकर से तुम्हारी पूरी हस्ती बिखर गई?
वक्त बुरा नहीं है, बस तुम्हारी तैयारी को थोड़ा और मांज रहा है,
सोने को भी कुंदन बनने के लिए दहकते कोयलों के बीच बैठना पड़ता है।
दूसरों की गवाही पर अपनी काबिलियत का फैसला मत करो,
जो लोग खुद ज़मीन पर रेंगते हैं, वो तुम्हारी उड़ान का अंदाज़ा नहीं लगा सकते।
थकान को हावी मत होने देना अपने इस छोटे से दिल पर,
अभी तो तुम्हें उन लोगों के भ्रम भी तोड़ने हैं जो तुम्हारी हार का जश्न मनाने बैठे हैं।
रास्ता बदला जा सकता है, पर इरादा बदलने की भूल मत करना,
एक बार पीछे हटे तो उम्र भर सिर्फ बहानों की बैसाखी पर चलना पड़ेगा।
कोई बात नहीं अगर आज तुम्हारा सिक्का नहीं चल रहा,
तुम उस भट्टी के लोहे हो जो सुलगने में वक़्त ज़रूर लेता है, पर आकार अमर पाता है।
सपने देखने का गुनाह किया है तो अब उसकी पूरी क़ीमत भी चुकाओ,
नींद का छूटना और रातों का लंबा होना तो इस सफ़र का पहला पड़ाव है।
जब हर तरफ से सिर्फ निराशा की चीखें सुनाई देने लगें,
तब अपने कानों को बंद करके अपनी खामोश मेहनत की धीमी धुन पर भरोसा रखना।
कांच के टुकड़ों पर चलने से पैर लहूलुहान ज़रूर होते हैं,
पर वही पैर जब पथरीली चट्टानों पर पड़ते हैं तो पत्थर भी रास्ता दे देते हैं।
तुम्हारी लड़ाई किसी और से है ही नहीं जो तुम दूसरों की जीत से डर रहे हो,
तुम्हें तो बस कल के उस कमज़ोर खुद को आज धूल चटानी है।
एक दिन में कुछ नहीं बदलता, पर एक दिन सब कुछ बदल जाता है,
बशर्ते तुम उस 'एक दिन' के आने तक मैदान में डटे रहो।
किताब का एक धुंधला पन्ना पूरी कहानी का अंत नहीं होता,
स्याही अभी सूखी नहीं है, अपनी किस्मत का अगला पन्ना ज़रा हौसले से लिखो।
दुनियां की बंदिशें तुम्हें सिर्फ तब तक रोक सकती हैं,
जब तक तुम्हारे भीतर की ज़िद उन बंदिशों से छोटी है।
अगर किनारे पर ही बैठे रहे तो लहरों की गहराई कभी समझ नहीं आएगी,
लड़ना है तो समंदर के बीच उतरो, डूबने का डर तो वैसे भी कायरों का काम है।
जहाँ सब कुछ धुंधला दिखने लगे, वहाँ अपनी आँखों को कसकर मीचना,
यह जो भीतर एक खामोश बेचैनी है, यही कल के उजाले का पहला बीज है।
पैर की मोच और मन की हार, दोनों को एक रात से ज़्यादा मत पालना,
सुबह उठकर जब दोबारा जूता पहनोगे, तो वही रास्ता छोटा लगने लगेगा।
जब लोग तुम्हारे आज को देखकर तुम्हारी औकात का अंदाज़ा लगाने लगें,
तुम बस मुस्कुराना और अपने अधूरे नक्शों को ज़रा और बारीकी से तराशना।
जो फसल आधी रात में पक जाए, वह मौसम के पहले झोंके में झड़ जाती है,
तुम्हें तो उस गहरी जड़ का पेड़ बनना है जो सदियों की धूप झेलकर भी हरी रहती है।
किताब का आधा अधूरा अध्याय देखकर पूरी कहानी को बंद मत करो,
अभी मुख्य किरदार का उठना और पलटवार करना बाकी है।
अगर आज तुम्हारी मेहनत पर कोई तालियाँ नहीं बज रहीं, तो सब्र रखो,
गहरे समंदर के नीचे जब चट्टानें सरकती हैं, तो बाहर कोई शोर नहीं होता।
अपनी कमज़ोरियों को दूसरों से छुपाने की बजाय खुद के सामने कुबूल करो,
जो ज़ख्म हवा के सामने खुला रहता है, वो सबसे जल्दी भरता है।
ज़िंदगी तुम्हें उतनी बार कभी नहीं गिरा सकती,
जितनी बार तुम्हारे भीतर का इंसान उठने का हुनर जानता है।
जब जेब खाली हो और सिर पर ज़िम्मेदारियाँ पहाड़ों जैसी भारी हों,
तब बिखरने की बजाय खुद को एक लोहे की ज़ंजीर की तरह सख्त कर लेना।
यह वक्त गुज़र जाएगा, पर इस वक्त में कमाया हुआ सब्र उम्र भर काम आएगा।
दूसरों के बनाए रास्तों पर चलने से सफ़र भले ही आसान हो जाए,
पर उस सफ़र के आख़िर में तुम्हें कोई अपना ठिकाना नहीं मिलेगा।
अगर आज पाँव थक गए हैं तो पेड़ की छाँव में दो पल सुस्ता लो,
पर उस छाँव को अपना परमानेंट घर समझ लेने की भूल मत करना।
सफलता की कोई ऐसी चाबी नहीं होती जो बाज़ार में बनी-बनाई मिल जाए,
यहाँ तो हर इंसान को अपनी ज़िद की भट्टी में खुद को पिघलाना पड़ता है।
जब चारों तरफ से सिर्फ बंद दरवाज़े और दीवारें ही दिखाई दें,
तो समझ लेना कि अब तुम्हें अपनी बंद आँखें खोलकर भीतर का रास्ता देखना है।
भीड़ में चिल्लाने वाले अक्सर अकेले में बहुत कमज़ोर होते हैं,
तुम अपनी खामोशी को इतनी ताकत दे दो कि तुम्हारी चुप्पी भी एक जवाब बन जाए।
सपने जितने बड़े होंगे, उनके टूटने का दर्द भी उतना ही गहरा होगा,
पर उस दर्द से डरकर छोटे घरोंदों में सिमट जाना इंसानी फितरत नहीं।
कल जो हुआ उसे एक कड़वी दवा की तरह पीकर भूल जाओ,
आज का दिन तुम्हारे सामने एक खाली सफ़ेद पन्ना है, अपनी किस्मत फिर से लिखो।
जब लोग कहें कि तुम्हारी उम्र और वक़्त दोनों हाथ से निकल चुके हैं,
तब अपनी ज़िद्दी मुस्कान के साथ कहना कि मेरी कहानी का मुख्य हिस्सा अब शुरू हुआ है।
कांच का टूटना उसकी फितरत है क्योंकि वो सिर्फ चमकना जानता है,
पर तुम तो उस मिट्टी के बने हो जो पकने के बाद पत्थर को भी मात दे देती है।
एक आख़िरी प्रयास हमेशा उस वक़्त करना जब तुम्हें लगे कि अब कुछ नहीं बचा,
अक्सर गुच्छे की आख़िरी चाबी ही बंद पड़े ताले को खोल दिया करती है।
तुम्हारी असली जंग किसी और से है ही नहीं जो तुम दूसरों की जीत से परेशान हो,
तुम्हें तो बस कल के उस थके हुए खुद को आज के मैदान में हराना है।
नदी जब पहाड़ों को चीरकर निकलती है, तो किसी से रास्ता नहीं पूछती,
वो बस अपने बहने की धुन में पत्थरों को भी रेत बना देती है।
अपनी असफलताओं को गिनना बंद करो और जरा अपनी सांसों की रवानी देखो,
जितनी बार टूटे हो, हर उस दरार से एक नया तजुर्बा बाहर झांक रहा है।
जब रास्ते धुंधले हों तो रफ्तार कम करना अक्लमंदी है,
पर डरकर पीछे मुड़ जाना अपनी ही चुनी हुई राह का अपमान है।
पीठ पीछे होने वाली बातें सिर्फ यह साबित करती हैं कि तुम आगे बढ़ रहे हो,
जब तक तुम चुप रहकर अपना काम कर रहे हो, किसी का शोर तुम्हें डिगा नहीं सकता।
यह जो तुम्हारे भीतर एक खामोश ज़िद पल रही है न,
एक दिन यही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत बनकर पूरी दुनिया के सामने आएगी।
हार से डरकर घरोंदों में छिप जाना उन लोगों का काम है जिन्हें सिर्फ किनारे पसंद हैं,
जो लहरों से लड़ना जानते हैं, वो गहरे समंदर में भी अपनी नाव उतार देते हैं।
वक़्त कितना भी कठिन हो, वो तुम्हारी हस्ती को मिटा नहीं सकता,
लोहे को जितना पीटा जाता है, उसकी धार उतनी ही तेज़ और मुकम्मल होती है।
दूसरों की दी हुई शाबाशी पर अपनी काबिलियत का पैमाना मत बनाओ,
तुम्हारी अंदरूनी जंग का अंदाज़ा सिर्फ तुम्हें है, किसी और को नहीं।
जब तुम्हारी मेहनत का कोई नतीजा न दिखे तो अपनी जड़ों को और गहरा करो,
बड़ी इमारतों की नींव बनने में सालों लगते हैं, वो रातों-रात खड़ी नहीं की जातीं।
अपने आंसुओं को ज़मीन पर गिरकर बेकार मत होने देना,
इन्हें वो ज़हर बनाओ जो तुम्हारे भीतर के आलस और डर को हमेशा के लिए मार दे।
अगर आज तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है, तो समझो तुम सबसे आज़ाद हो,
अब तुम्हारे पास सिर्फ पाने और आगे बढ़ने का एक असीमित आसमान बाकी है।
किताब के कुछ पन्नों का खराब होना पूरी कहानी का अंत नहीं होता,
स्याही अभी सूखी नहीं है, उठो और अपनी ज़िंदगी का अगला अध्याय ज़रा शान से लिखो।
जब सब कहें कि अब रुक जाओ क्योंकि तुम्हारी उम्र और वक़्त दोनों कम हैं,
तब अपनी धीमी मगर अटूट मुस्कान के साथ कहना कि मेरी असली दौड़ तो अब शुरू हुई है।
भीड़ का हिस्सा बनकर चलना बहुत आसान है, वहाँ कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती,
पर अगर अपनी अलग पहचान की ज़िद है, तो इस अकेलेपन के सफ़र को गले लगाना ही होगा।
कांच का काम है चोट लगते ही बिखर जाना और शोर मचाना,
तुम तो उस मिट्टी के बने हो जो भट्टी में तपने के बाद पत्थर को भी चीर देती है।
एक आख़िरी कोशिश हमेशा उस वक़्त करना जब तुम्हें लगे कि अब सब कुछ ख़त्म हो चुका है,
अक्सर गुच्छे की वही आख़िरी और मामूली सी चाबी बंद ताले को झटके में खोल देती है।
तुम्हारी लड़ाई बाहर की दुनिया से है ही नहीं जो तुम दूसरों की तरक्की से जल रहे हो,
तुम्हें तो बस कल के उस थके हुए और हारे हुए खुद को आज के मैदान में मात देनी है।
नदी जब पहाड़ों के सीने को चीरकर निकलती है, तो किसी से रास्ता नहीं पूछती,
वो बस अपने बहने की धुन में बड़ी-बड़ी चट्टानों को भी रेत का जर्रा बना देती है।
थक कर बैठ जाना कोई गुनाह नहीं है, बस उस थकान को अपनी आख़िरी मंज़िल मत बनाना,
एक गहरी सांस लो, धूल झाड़ो और देखो कि तुम्हारे भीतर अब भी एक और प्रयास की जान बाकी है।
लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं, यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है,
तुम्हारा काम है बस अपने हिस्से की ईमानदारी से हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा आगे बढ़ना।
ज़िंदगी तुम्हें उतनी बार कभी नहीं गिरा सकती,
जितनी बार तुम्हारे भीतर का ज़िद्दी इंसान वापस उठ खड़े होने का हुनर जानता है।