रात की खामोशी जब हर तरफ़ फैल जाती है,
तो दिल की अनसुनी आवाज़ें और साफ़ सुनाई देने लगती हैं।
सब सो जाते हैं, पर कुछ यादें जागती रहती हैं,
और नींद को बार-बार रोक देती हैं।
अंधेरा बाहर जितना शांत दिखता है,
भीतर उतना ही बेचैन कर देता है।
कभी जो बातें किसी से कहनी थीं,
वो अब सिर्फ़ मन में घूमती रहती हैं।
रातें सिर्फ आराम नहीं लातीं,
ये कुछ पुराने एहसास भी वापस जगा देती हैं।
जो लोग दिन में मुस्कान बनकर रहते हैं,
उन्हीं की कमी रात में सबसे ज़्यादा महसूस होती है।
सन्नाटा इतना गहरा हो जाता है,
कि अपने ही विचार भारी लगने लगते हैं।
कभी किसी की आदत इतनी गहरी हो जाती है,
कि उसकी गैरमौजूदगी भी साथ चलती है।
रात के हर कोने में कुछ यादें छिपी होती हैं,
जो बिना पूछे सामने आ जाती हैं।
आँखें बंद करने पर भी चैन नहीं मिलता,
क्योंकि यादें अंदर चलती रहती हैं।
जो बातें अधूरी रह जाती हैं,
वो रातों में पूरी होकर भी अधूरी लगती हैं।
दिल खुद से सवाल करने लगता है,
जिनके जवाब कभी मिले ही नहीं थे।
ये रातें सिर्फ़ अंधेरा नहीं होतीं,
ये पुरानी कहानियों की परछाइयाँ होती हैं।
कभी किसी की हँसी जो सुकून देती थी,
अब वही हँसी याद बनकर चुप कर देती है।
रात का सन्नाटा इतना सच्चा होता है,
कि हर झूठी मुस्कान भी टूटने लगती है।
तकिए पर सिर रखते ही,
विचार और भी ज़्यादा जाग जाते हैं।
जो लोग दूर चले जाते हैं,
वे रात में और भी पास महसूस होते हैं।
नींद चाहकर भी नहीं आती,
जब यादें रास्ता रोककर बैठ जाएँ।
हर रात कुछ अधूरी बातें छोड़ जाती है,
जो सुबह तक भी शांत नहीं होतीं।
दिल थक जाता है खुद को समझाते-समझाते,
पर यादें समझना नहीं छोड़तीं।
रातें यह नहीं पूछतीं कौन अपना है,
ये बस सबको याद दिला देती हैं।
खामोशी में सबसे बड़ा शोर,
अपने ही दिल का होता है।
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते,
बस रातों में और गहरे हो जाते हैं।
और इस सन्नाटे में,
इंसान खुद को सबसे ज़्यादा महसूस करता है।
रात की ख़ामोशी जब कमरे में फैल जाती है,
तो यादें और भी ज़्यादा आवाज़ करने लगती हैं।
सब सो जाते हैं, बस मैं जागता रहता हूँ,
कुछ अधूरी बातों के साथ, जो कभी पूरी ही नहीं हुईं।
अंधेरा बाहर जितना गहरा होता जाता है,
उतना ही भीतर कुछ पुराना उजागर होने लगता है।
कभी जिनसे दिन आसान लगते थे,
रातें उन्हीं की कमी सबसे ज़्यादा बता देती हैं।
यह रात सिर्फ सन्नाटा नहीं लाती,
कुछ ऐसे चेहरे भी साथ ले आती है, जो अब पास नहीं हैं।
नींद आँखों तक आती है, पर ठहरती नहीं,
जैसे कोई याद बीच में रास्ता रोक लेती हो।
कमरे की दीवारें भी अब अजनबी नहीं रहीं,
वे मेरी खामोशी को लंबे समय से पहचानती हैं।
रात के इस खालीपन में सबसे ज़्यादा शोर,
अपनी ही सोचों का होता है।
जो बातें दिन में मुस्कुराकर टाल दी जाती हैं,
रात उन्हें फिर से सामने रख देती है।
कभी किसी के साथ जो सुकून मिलता था,
अब वही सुकून याद बनकर चुभने लगता है।
ये रातें सिर्फ अंधेरी नहीं होतीं,
इनमें कुछ रिश्तों की परछाइयाँ भी घूमती रहती हैं।
दिल थक जाता है समझाते-समझाते खुद को,
कि सब कुछ पहले जैसा नहीं रह सकता।
हर गुजरती रात कुछ और खाली कर जाती है,
और कुछ यादें और गहरी कर जाती है।
सन्नाटा इतना साफ़ होता है रात में,
कि अपनी ही कमी साफ़ सुनाई देने लगती है।
कभी जिनकी हँसी से दिन रोशन होते थे,
उनकी चुप्पी अब रात को भारी बना देती है।
रातें सिर्फ आराम के लिए नहीं होतीं,
ये कुछ अधूरे एहसास भी जगा देती हैं।
आँखें बंद करने पर भी चैन नहीं मिलता,
क्योंकि यादें आँखों के पीछे चलने लगती हैं।
जो लोग अब दूर हैं,
उनकी मौजूदगी रात में और करीब लगती है।
ये अजीब सा सच है रात का,
यह सबसे ज़्यादा उन्हीं को याद दिलाती है, जिन्हें भूलना आसान नहीं होता।
हर रात कुछ सवाल छोड़ जाती है,
जिनके जवाब सुबह तक भी नहीं मिलते।
तकिए पर सिर्फ नींद नहीं रहती,
वहाँ कुछ अनकहे लम्हों का भार भी होता है।
रात का हर पल यह बताता है,
कि कुछ रिश्ते दूरी से खत्म नहीं होते, बस चुप हो जाते हैं।
और इस चुप्पी में सबसे ज़्यादा,
दिल खुद से बातें करने लगता है।