सड़क किनारे उस चाय की टपरी पर जब भी रुकता हूँ,
तुम्हारी वो मीठी सी डाँट अचानक याद आती है।
"ज़्यादा चाय मत पिया करो", तुम्हारा यह कहना,
आज भी मेरे हाथ को प्याला उठाने से रोक जाती है।
तुम्हारी डायरी का वो एक सादा सा पन्ना,
जिस पर तुमने अनजाने में अपना नाम लिखा था।
वह महज़ एक काग़ज़ नहीं, मेरी अमानत है,
जिसमें हमारी ख़ामोश चाहत का पैग़ाम लिखा था।
मुझे अब रास्तों की लंबाई से डर नहीं लगता,
क्योंकि हर रास्ता तुम्हारी यादों की तरफ मुड़ता है।
तुम चाहे कितनी भी दूर बैठे हो इस दुनिया में,
मेरा हर ख़याल तुम्हारी ही चौखट पर जाकर जुड़ता है।
आज शहर में सुबह से ही घनी धुंध छाई है,
जैसे वक़्त ने यादों की कोई चादर ओढ़ाई है।
इस धुंधलके में भी तुम्हारी सूरत साफ़ दिखती है,
तुमने मेरे दिल में ऐसी गहरी जगह बनाई है।
अपनी मेज़ पर रक्खी उस अधूरी किताब को देखता हूँ,
जिसके पन्ने तुमने आख़िरी बार पलटे थे।
वो निशान आज भी वैसा ही महफ़ूज़ है यहाँ,
जहाँ हमारे हँसते हुए लम्हे आकर सिमटे थे।
लोग पूछते हैं कि तुम इतने शांत क्यों रहते हो,
उन्हें क्या पता कि भीतर तुम्हारी यादों का संगीत बजता है।
दूरी ने हमें और ज़्यादा संजीदा बना दिया,
अब हर लफ़्ज़ बस तुम्हारी सलामती के लिए सजता है।
तुम्हारी दी हुई वह पुरानी हाथ की घड़ी,
वक़्त भले ही अलग बताए, पर ठहराव वही देती है।
जब भी उसकी सुइयों की टिक-टिक सुनता हूँ,
ऐसा लगता है वो तुम्हारे आने की आहट देती है।
गले में अटका वो एक आख़िरी अलविदा का लम्हा,
आज एक ख़ूबसूरत से भरोसे में बदल गया है।
तुम दूर रहकर भी मुझे बिखरने नहीं देते,
मेरा इश्क़ अब पहले से कहीं ज़्यादा संभल गया है।
कभी जो उदासी मुझे घेरने की कोशिश करती है,
मैं तुम्हारी उस प्यारी सी मुस्कान को याद कर लेता हूँ।
तुमने जितने पल दिए थे अपनी मौजूदगी के,
उन्हीं को समेटकर मैं अपना हर दिन बसर कर लेता हूँ।
यह दूरियाँ तो बस एक ज़रिया हैं आज़माने का,
कि हम एक-दूसरे के बिना कितने मुकम्मल हैं।
तुम वहाँ रहकर भी मेरे वजूद की ढाल हो,
हम दूर होकर भी रूह से बिल्कुल अव्वल हैं।
बरसात की पहली बूँद जब मिट्टी को छूती है,
मुझे तुम्हारी बातें और वो मुस्कान याद आती है।
तुम दूर रहकर भी इस मौसम की तरह हो,
जिसकी सिर्फ एक छुअन पूरे बदन को महका जाती है।
रास्ते में चलते हुए जब भी कोई तुम्हारे जैसा दिखता है,
यह दिल एक पल के लिए वहीं ठिठक जाता है।
फिर मुस्कुराकर सोचता हूँ कि तुम सबसे अलग हो,
तुम्हारा अक्स तो सिर्फ मेरी आँखों में ही सजता है।
तुम्हारी कलाई की वो खाली चूड़ियाँ जो यहाँ रह गई थीं,
उन्हें आज भी मैंने बहुत सहेजकर रक्खा है।
वो महज़ काँच के टुकड़े नहीं हैं मेरे लिए,
उनमें मैंने अपने मिलन का हर ख़वाब चक्खा है।
लोग कहते हैं कि दूर रहने से मोहब्बत कम होती है,
शायद उन्हें इस पाक रिश्ते की गहराई का अंदाज़ा नहीं।
हम जितने दूर हैं, उतने ही एक-दूसरे के भीतर हैं,
इस पाकीज़ा इश्क़ की सरहद का कोई दरवाज़ा नहीं।
कभी फुर्सत मिले तो अपनी छत पर आकर बैठना,
हवा का जो झोंका तुम्हें छुए, उसे मेरा सलाम कहना।
मैं यहाँ से बस यही दुआ भेजता हूँ रोज़,
तुम जहाँ भी रहो, बस हमेशा खुशहाल रहना।
अलमारी में रक्खी तुम्हारी वो पसंदीदा कमीज़,
आज भी तुम्हारी मौजूदगी का अहसास दिलाती है।
मैं जब भी उसे छूता हूँ, ऐसा लगता है,
तुम्हारी बाहें मुझे चुपके से गले लगाती हैं।
यह वक़्त भी गुज़र जाएगा, मुझे पूरा यक़ीन है,
फासले तो बस हमारी मोहब्बत को और निखारते हैं।
तुम दूर हो तो क्या हुआ, इस दिल के आईने में,
हम हर सुबह सबसे पहले तुम्हीं को निहारते हैं।
तुम्हारी आवाज़ की वो पुरानी रिकॉर्डिंग आज भी सुनी,
दिल को एक अजब सा सुकून और करार मिल गया।
लगा जैसे तुम अभी-अभी पुकार कर कहोगे,
कि देखो राज, तुम्हारे इंतज़ार का फल मिल गया।
दूरी ने हमें सिर्फ जिस्मानी तौर पर जुदा किया है,
हमारी रूहें तो एक ही धागे से बंधी हैं।
तुम वहाँ रहकर भी मेरे हर ख़याल का हिस्सा हो,
हमारी मोहब्बत की इमारत बहुत मज़बूत संधी है।
चलो आज इस तन्हाई को एक नया नाम देते हैं,
इसे हमारे मिलन की ख़ूबसूरत तैयारी कहते हैं।
तुम मुस्कुराते रहना अपनी दुनिया में हमेशा,
हम यहाँ तुम्हारी यादों को ही अपनी जागीर कहते हैं।
रात की ख़ामोशी जब भी मुझसे बात करती है,
तुम्हारी सादगी भरी बातें याद आती हैं।
तुमने कहा था कि वक़्त ठहरता नहीं कभी,
पर तुम्हारी याद में हर घड़ी ठहर सी जाती है।
आज फिर हवाओं में एक अजीब सी नमी है,
जैसे इन्हें भी तुम्हारी मौजूदगी की कमी है।
पर यह कमी मुझे तोड़ती नहीं, हौसला देती है,
कि हमारे दरमियां मोहब्बत आज भी उतनी ही जमी है।
काग़ज़ पर जब भी कलम कुछ लिखना चाहती है,
वह सबसे पहले तुम्हारा नाम सजाती है।
तुमसे दूर रहना एक ख़ामोश सबक़ है मेरे लिए,
जो हर पल मुझे तुम्हारे और करीब लाती है।
दुआओं में अब अपने लिए कुछ नहीं मांगते,
बस तुम्हारी हँसी और सुकून की आरज़ू रहती है।
तुम दूर रहकर भी मेरे हिस्से की ख़ुशी हो,
यह बात मेरे दिल की हर धड़कन कहती है।
घर की खिड़की से दूर तक सन्नाटा दिखता है,
पर मन के भीतर एक मेला सा लगा रहता है।
उस मेले में सिर्फ तुम और तुम्हारी यादें हैं,
जहाँ ये फासला पल भर में मिटा सा रहता है।
तुम्हारी पसंद का वो गीत जब भी बजता है,
ऐसा लगता है तुम मेरे पहलू में बैठे हो।
दूरी ने हमारे बीच कोई दीवार नहीं चुनी,
तुम तो मेरी रूह के गहरे लिबास में लिपटे हो।
कभी-कभी तुम्हारी पुरानी चिट्ठियां पढ़ लेता हूँ,
उनमें छुपा तुम्हारा लहज़ा आज भी ताज़ा है।
तुमने दूर रहकर भी मुझे कभी तन्हा नहीं होने दिया,
यह तुम्हारी वफ़ा का सबसे बड़ा अंदाज़ा है।
यह जो हमारे बीच मीलों का सन्नाटा पसरा है,
इसे मैं अपनी मोहब्बत का इम्तिहान मानता हूँ।
जीत हमारी ही होगी इस वक़्त की बंदिशों से,
क्योंकि मैं तुम्हारे दिल का हर कोना जानता हूँ।
शाम के साए जब ज़मीन पर लंबे होते हैं,
दिल में एक धीमा सा दीया जल उठता है।
वो दीया उम्मीद का है, तुम्हारे लौट आने का,
जिसकी रोशनी में मेरा हर दिन संभल उठता है।
तुम अपनी व्यस्तताओं में भी मेरा ख़याल रखना,
मैं तुम्हारी यादों के सहारे हर दिन गुज़ार लूँगा।
ये दूरियाँ तो बस हमारे सब्र की आज़माइश हैं,
जब तुम आओगे, मैं तुम्हें पलकों में उतार लूँगा।
तुम्हारी आवाज़ का ज़हन में गूँजना,
जैसे ठहरे हुए पानी में कोई कंकड़ गिरा दे।
तुम दूर होकर भी इस कदर पास हो,
जैसे कोई ख़ामोश दुआ दिल से रास्ता बना ले।
सुबह की चाय का आधा कप आज भी उदास रहता है,
सामने वाली कुर्सी पर तुम्हारा न होना अखरता है।
ये दूरी बस ज़मीन की लकीरों तक ही तो है,
वरना हर धड़कन में तुम्हारा ही नाम धड़कता है।
हम दूर हैं मगर जुदा तो नहीं,
वक़्त का ये फ़ासला कोई ख़ुदा तो नहीं।
सहेज कर रखी हैं तुम्हारी दी हुई सब बातें,
तुम लौट आओगे, मुझे कोई गिला तो नहीं।
कमरे की दीवार पर टँगी वह तस्वीर बोलती है,
जब भी तन्हाई मुझे घेरकर कुछ टटोलती है।
तुम्हारी मुस्कान में छुपा है मेरा सारा सुकूँ,
यह याद हर शाम मेरे दिल का दरवाज़ा खोलती है।
रास्ते बदल गए पर मंज़िल तो तुम ही हो,
इस भटके हुए मुसाफ़िर का साहिल तो तुम ही हो।
लोग पूछते हैं मेरी ख़ामोशी का सबब अक्सर,
उन्हें क्या पता कि मेरी हर बातचीत में शामिल तो तुम ही हो।
कुछ आदतें तुम्हारी मुझमें इस कदर घर कर गईं,
कि आईने में भी अब अक्स तुम्हारा दिखता है।
मैं बोलना कुछ चाहूँ तो लफ़्ज़ तुम्हारे निकलते हैं,
यह फासला भी हमारे बीच का रिश्ता लिखता है।
चुपके से आकर सिरहाने बैठ जाती है याद तुम्हारी,
लोरी गाकर सुलाती है, यह दूरी तुम्हारी।
दर्द तो है तुम्हें पास न पाने का इस पल में,
पर इस दर्द में भी छुपी है इक मोहब्बत हमारी।
यह जो वक़्त का पहिया घूम रहा है धीरे-धीरे,
मुझे यकीन है यह तुम्हें मेरे करीब ला रहा है।
हर गुज़रता हुआ दिन भले ही तन्हाई देता हो,
पर मिलने की उमीद को और गहरा कर जा रहा है।
तुम्हारे हिस्से की धूप आज मेरे आँगन में उतरी है,
ऐसा लगा जैसे तुम्हारी छुअन हवा में बिखरी है।
तुम जहाँ भी हो, बस अपना ख़याल रखना,
तुम्हारी सलामती से ही मेरी यह दुनिया निखरी है।
कभी-कभी सोचता हूँ कि कितनी बातें अधूरी हैं,
जो सिर्फ आमने-सामने बैठकर ही पूरी होनी हैं।
पर तुम्हारी यादों की थाती जो मेरे पास है,
उसने कभी इन दूरियों को भारी होने नहीं दिया।
शाम ढलते ही दिल परिंदा बन जाता है,
उड़कर उसी मुक़ाम पर ठहर जाता है।
जहाँ तुमने आखिरी बार हाथ थामा था मेरा,
वह पल आज भी जीने का बहाना बन जाता है।
कोई शिकवा नहीं कि तुम आज पास नहीं हो,
तुम मेरे अहसास का सबसे ख़ास हिस्सा हो।
दूरी तो बस जिस्मों की पैमाइश करती है,
रूूह से रूूह के जुड़ने का तुम ही तो किस्सा हो।
तेरी ग़ैर-मौजूदगी में भी तुझे महसूस करना,
शायद इसी को इबादत कहते हैं।
तुम मिलोगे ज़रूर, इसी आस में जीना,
इसी को तो मोहब्बत की आदत कहते हैं।
दराज़ में रक्खा वह सूखा हुआ गुलाब,
आज भी तुम्हारी खुशबू से महकता है।
वक़्त बदल गया, साल बदल गए मगर,
यह दिल आज भी उसी शिद्दत से धड़कता है।
मुझे इंतज़ार करना अच्छा लगता है,
क्योंकि इसमें सिर्फ तुम्हारा ख़याल होता है।
दूरी भले ही तड़पाती हो इस दिल को,
पर मिलन का वो लम्हा भी तो बेमिसाल होता है।
जब भी हवा का कोई झोंका गुज़रता है पास से,
मैं आँखें मूँदकर बस तुम्हारा नाम लेता हूँ।
ऐसा लगता है तुम संदेशा भेज रहे हो अपना,
और मैं चुपके से उसे अपने दिल में थाम लेता हूँ।
बातें तो रोज़ होती हैं ज़माने भर से मेरी,
पर जो सुकून तुमसे बात करके मिलता था, वह कहीं नहीं।
तुम्हारी याद का एक कतरा ही काफ़ी है मेरे लिए,
तुम दूर हो तो क्या हुआ, मेरे दिल से जुदा तो नहीं।
इस सन्नाटे में भी एक अजब सी गूँज है तुम्हारी,
जैसे तुम यहीं कहीं बैठकर मुस्कुरा रहे हो।
मेरी हर सोच को तुम्हारी ही फिक्र रहती है,
तुम दूर रहकर भी मुझे जीना सिखा रहे हो।
वो जो एक ख़ास हँसी थी तुम्हारी,
उसी के सहारे काट लेता हूँ ये लंबे दिन।
तुम बोझ मत समझना इस दूरी को कभी,
हम और निखर रहे हैं एक-दूसरे के बिन।
चलो आज फिर एक वादा करते हैं,
इस फासले को मोहब्बत से छोटा करते हैं।
तुम वहाँ खुश रहो, मैं यहाँ संभल जाता हूँ,
मिलने की आस को और थोड़ा गहरा करते हैं।