Father and Son Attitude Shayari
मेरे पिता ने मुझे ऊँचा उठने का सपना दिया,
पर साथ ही यह भी सिखाया,
कि जितना ऊपर जाओ,
उतना ही विनम्र बने रहना।
मैं मुश्किलों से भागता नहीं,
क्योंकि बचपन से देखा है,
घर का सबसे मज़बूत इंसान
हर चुनौती के सामने खड़ा रहता था।
उन्होंने मेरी हर जीत पर ख़ुशी जताई,
पर कभी घमंड नहीं आने दिया,
यही वजह है कि आज भी
मंज़िल से ज़्यादा सफ़र की क़द्र करता हूँ।
मेरी आवाज़ में जो भरोसा है,
वह किसी मंच से नहीं आया,
वह उन शब्दों से बना है,
जो पिता ने सही वक़्त पर कहे थे।
उन्होंने कहा था,
नाम कमाने से पहले विश्वास कमाना,
तभी से मैं लोगों की नज़रों में नहीं,
उनके भरोसे में जगह बनाने की कोशिश करता हूँ।
जब जेब खाली थी,
तब भी सपने छोटे नहीं हुए,
क्योंकि पिता ने सिखाया था,
कि कमी साधनों की होती है, इरादों की नहीं।
मैं अपनी पहचान पर गर्व करता हूँ,
क्योंकि उसके पीछे वर्षों की परवरिश है,
जिसे पिता ने अपने कर्मों से गढ़ा है।
उन्होंने मुझे यह नहीं बताया कि सफलता कैसी दिखती है,
उन्होंने दिखाया कि
सम्मान के साथ जीना कैसा होता है।
मेरे कदम डगमगाते हैं कभी-कभी,
पर रुकते नहीं,
क्योंकि पिता की सीख
अंदर एक अडिग विश्वास बनकर रहती है।
मैं दूसरों की चमक देखकर नहीं चलता,
मेरे पास अपना रास्ता है,
जो पिता के मूल्यों और
मेरी मेहनत से बना है।
उन्होंने हमेशा कहा,
अगर सही हो तो अकेले खड़े रहने से मत डरना,
यही बात आज मेरे चरित्र की सबसे बड़ी ताक़त है।
मेरी हर उपलब्धि में मेरा नाम लिखा है,
लेकिन उसके पीछे
पिता के त्याग और विश्वास की स्याही है।
मैं अपने सपनों के लिए मेहनत करता हूँ,
क्योंकि जानता हूँ,
मेरी सफलता सिर्फ़ मेरी नहीं,
मेरे पिता के विश्वास का सम्मान भी है।
उन्होंने मुझे कभी विरासत पर निर्भर रहना नहीं सिखाया,
बल्कि ऐसा बनना सिखाया,
कि आने वाली पीढ़ियाँ
मेहनत को अपनी विरासत मानें।
अगर मुझमें कुछ मज़बूत है,
तो वह मेरा आत्मसम्मान है,
और अगर उसका कोई स्रोत है,
तो वह मेरे पिता की परवरिश है।
मेरे पिता ने कभी ऊँचे सपनों से डरना नहीं सिखाया,
बस यह सिखाया कि
सपनों से पहले ख़ुद को उनके लायक बनाना पड़ता है।
मैं हालात का रोना नहीं रोता,
क्योंकि घर में एक आदमी था,
जो हर कठिनाई को काम की तरह लेता था,
मुसीबत की तरह नहीं।
उन्होंने मुझे विरासत में ज़मीन कम,
ज़मीर ज़्यादा दिया,
और यक़ीन मानिए,
यह सौदा हमेशा फ़ायदे का रहता है।
मेरी पहचान किसी परिचय की मोहताज नहीं,
क्योंकि पिता ने सिखाया है,
कि आदमी का चरित्र ही उसका सबसे सच्चा परिचय होता है।
जब रास्ते बंद दिखते हैं,
मैं घबराता नहीं,
मुझे याद आ जाता है कि
मेरे पिता ने भी कई दरवाज़े मेहनत से खोले थे।
उन्होंने कभी मुझे सबसे आगे रहने की सलाह नहीं दी,
बस इतना कहा,
जहाँ भी रहो, अपने काम में सच्चे रहना।
मेरी जीत पर लोग तालियाँ बजाते हैं,
पर मैं जानता हूँ,
उस जीत की नींव उन दिनों में रखी गई थी,
जब पिता चुपचाप संघर्ष कर रहे थे।
मैं किसी से बेहतर साबित होने नहीं निकला,
मैं तो बस उस भरोसे के लायक बनना चाहता हूँ,
जो मेरे पिता ने मुझ पर किया है।
उन्होंने मुझे यह नहीं सिखाया कि गिरना मत,
उन्होंने सिखाया कि
गिरकर उठने की आदत डालो,
ज़िंदगी लंबी है।
मेरे आत्मविश्वास की वजह मेरी सफलताएँ नहीं,
वो घर है,
जहाँ असफल होने पर भी
मुझे कम नहीं समझा गया।
जब लोग मेरे धैर्य की तारीफ़ करते हैं,
तो मुझे पिता की प्रतीक्षा याद आती है,
जिन्होंने कई साल मेहनत की,
बिना तुरंत परिणाम की उम्मीद किए।
मैं तेज़ चलना जानता हूँ,
पर जल्दबाज़ी नहीं करता,
यह फ़र्क़ पिता की समझ ने सिखाया है।
उन्होंने कहा था,
अपना वादा निभाने वाला इंसान बनो,
क्योंकि भरोसा टूट जाए,
तो शब्दों की कीमत भी घट जाती है।
मेरे सपनों में उड़ान है,
पर जड़ों से रिश्ता भी,
यह संतुलन घर के संस्कारों से आया है।
मैं हर सफलता को सिर पर नहीं चढ़ाता,
क्योंकि मैंने पिता को देखा है,
जिनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी
उनकी विनम्रता से बड़ी नहीं हुई।
उन्होंने मुझे दूसरों को हराना नहीं सिखाया,
ख़ुद को बेहतर बनाना सिखाया,
और यही सीख सबसे दूर तक साथ जाती है।
मेरे पास जो हिम्मत है,
वह किसी किताब से नहीं आई,
वह उन दिनों से आई है,
जब पिता ने हार मानने से इनकार किया था।
मैं अपनी मंज़िल का मालिक बनना चाहता हूँ,
पर रास्ते में मिले मूल्यों को खोकर नहीं,
यह बात पिता ने बहुत पहले समझा दी थी।
उन्होंने कम बोलकर भी बहुत कुछ सिखाया,
क्योंकि कुछ सीखें शब्दों से नहीं,
जीवन जीने के ढंग से मिलती हैं।
जब कभी सफलता और सिद्धांत में चुनना पड़े,
तो मैं सिद्धांत चुनूँगा,
क्योंकि यही मेरे पिता की सबसे बड़ी विरासत है।
मेरे भीतर जो स्वाभिमान है,
वह किसी पद या पहचान से नहीं,
उस परवरिश से बना है
जहाँ सम्मान कमाया जाता था।
उन्होंने मुझे यह भरोसा दिया,
कि ईमानदार रास्ता लंबा हो सकता है,
लेकिन पछतावे से छोटा होता है।
मैं अपने पिता की परछाई नहीं बनना चाहता,
मैं ऐसा इंसान बनना चाहता हूँ,
जिसे देखकर उन्हें अपने संस्कार नज़र आएँ।
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि वह दिन होगी,
जब लोग कहेंगे,
इसने नाम नहीं,
नाम की गरिमा बढ़ाई है।
पिता ने मेरे हाथ में केवल उँगली नहीं दी,
ज़िम्मेदारी भी दी,
तभी तो आज हर निर्णय में
मैं सिर्फ़ अपना नहीं, अपने घर का भी सोचता हूँ।
मेरे नाम के आगे कोई पहचान यूँ ही नहीं जुड़ी,
घर में एक आदमी था,
जिसने हालात से झुकना नहीं,
सामना करना सिखाया था।
मैं ऊँची आवाज़ में नहीं,
अपने काम में जवाब देता हूँ,
ये आदत मेरी नहीं,
पिता की परवरिश की निशानी है।
उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि दुनिया आसान है,
बस इतना कहा कि हिम्मत कम मत होने देना,
तभी तो मुश्किल वक़्त में भी
मैं बहानों से ज़्यादा रास्ते तलाशता हूँ।
मेरी सबसे बड़ी पूँजी ज़मीन या दौलत नहीं,
वो सोच है जो विरासत में मिली,
जहाँ मेहनत को सम्मान
और ईमानदारी को ताक़त माना गया।
जब लोग पूछते हैं कि इतना भरोसा कहाँ से आता है,
मैं मुस्कुरा देता हूँ,
क्योंकि कुछ आत्मविश्वास किताबों से नहीं,
पिता को संघर्ष करते देखकर मिलता है।
उन्होंने मेरे लिए रास्ता नहीं बनाया,
मुझे चलना सिखाया,
इसीलिए मंज़िल मिलने पर भी
कदम ज़मीन पर ही रहते हैं।
मैं जीतूँ तो सिर ऊँचा रहता है,
हारूँ तो हौसला,
ये संतुलन यूँ ही नहीं आया,
घर में एक मज़बूत किरदार रोज़ सामने था।
पिता ने सिखाया कि सम्मान माँगा नहीं जाता,
कमाया जाता है,
तभी तो पहचान बनाने की जल्दी नहीं,
उसे योग्य बनाने की चिंता है।
मैं किसी से बड़ा बनने की कोशिश नहीं करता,
बस इतना चाहता हूँ,
कि जिस नाम को पिता ने ईमान से जिया,
मैं उसे और मज़बूत कर सकूँ।
मेरी सफलता की शुरुआत उस दिन नहीं हुई,
जब लोगों ने तारीफ़ की,
वो तब हुई थी,
जब पिता ने मुझ पर भरोसा करना शुरू किया।
घर की सादगी ने जो संस्कार दिए,
वही आज मेरी सबसे बड़ी ताक़त हैं,
वरना दिखावे की चमक
कई लोगों को भीतर से कमज़ोर कर देती है।
उन्होंने मुझे हर समस्या से बचाया नहीं,
कुछ से लड़ने भी दिया,
तभी तो आज मुश्किलें देखकर
घबराहट नहीं, तैयारी याद आती है।
मेरे फैसलों में जो ठहराव है,
वो उम्र का नहीं,
उन सीखों का असर है,
जो पिता ने अपने व्यवहार से दीं।
मैं जहाँ भी पहुँचूँ,
एक बात कभी नहीं भूल सकता,
मेरी उड़ान मेरी मेहनत की है,
पर पंखों का भरोसा पिता से मिला है।
अगर लोग मेरे व्यक्तित्व की तारीफ़ करते हैं,
तो उसका श्रेय मुझे नहीं,
उस इंसान को जाता है,
जिसने मुझे यह सिखाया कि
मज़बूत होना और अच्छा इंसान होना,
दो अलग बातें नहीं हैं।