Father and Daughter Shayari
जब भी किसी कागज़ पर अपना नाम लिखती हूँ,
तो याद आता है,
लिखना तो मैंने स्कूल में सीखा था,
पर ख़ुद पर भरोसा करना आपसे।
मेरी हर गलती पर आपने रोक ज़रूर लगाई,
पर मेरे सपनों पर कभी नहीं,
शायद इसी वजह से मैं आज भी
डर से ज़्यादा उम्मीद के साथ आगे बढ़ती हूँ।
बचपन में लगता था कि आपको सब कुछ आता है,
बड़े होकर समझ आया,
कि बहुत-सी बातें आपको भी नहीं मालूम थीं,
फिर भी मेरे लिए हर जवाब ढूँढ़ लाते थे।
जब जेब में पैसे कम होते होंगे,
तब भी मेरी ख़्वाहिशों की कमी नहीं होने दी,
अब समझ आता है,
कुछ त्याग आवाज़ नहीं करते,
बस ज़िंदगी आसान बना देते हैं।
आपके साथ बाज़ार जाना
सिर्फ़ सामान खरीदना नहीं था,
वह यह सीखना भी था कि
ज़रूरत और चाहत में फ़र्क़ कैसे किया जाता है।
मैंने कई बार ऊँची आवाज़ में अपनी बात कही,
आपने कई बार चुप रहकर सुना,
आज समझती हूँ,
हर बहस जीतना समझदारी नहीं होती।
मेरे बचपन की सबसे सुरक्षित जगह
कोई कमरा नहीं था,
वह आपके पास बैठकर
बिना किसी डर के बातें करना था।
जब मैंने पहली बार हार का स्वाद चखा,
दुनिया ने नतीजा देखा,
आपने मेरी कोशिश देखी,
और वही मुझे फिर से शुरू करने की ताक़त दे गया।
आपने कभी मेरे लिए रास्ते नहीं चुने,
बस इतना किया कि
गलत मोड़ पर भी लौटने का साहस बना रहे।
मेरे लिए नई किताबें लाने वाले हाथ,
शायद अपनी कई इच्छाएँ टालते रहे होंगे,
मैंने देर से जाना,
कि शिक्षा सिर्फ़ स्कूल नहीं देता।
आपकी डाँट में भी एक अजीब-सी राहत थी,
क्योंकि उसके पीछे नाराज़गी कम,
फ़िक्र ज़्यादा हुआ करती थी।
जब दुनिया ने मेरी तुलना दूसरों से की,
आपने मुझे मेरी ही पिछली कोशिश से तुलना करना सिखाया,
तभी से सफ़र बोझ नहीं,
बेहतर बनने की आदत बन गया।
मेरी छोटी-सी उपलब्धि पर भी
आप जिस गर्व से मुस्कुराते थे,
उसे देखकर लगता था,
जैसे मैंने नहीं,
आपने कोई सपना पूरा किया हो।
अब जब ज़िम्मेदारियाँ समझ आने लगी हैं,
तो आपकी थकान भी दिखने लगी है,
वरना बचपन में तो लगता था,
पिता कभी नहीं थकते।
कुछ रिश्ते रोज़ शब्द नहीं माँगते,
पिता और बेटी का रिश्ता भी वैसा ही है,
सालों की समझ कई बार
एक नज़र में पूरी हो जाती है।
अगर ज़िंदगी मुझे फिर से बचपन दे,
तो मैं खिलौने नहीं माँगूँगी,
बस उतना समय माँगूँगी,
जितना आपके साथ बिना किसी जल्दी के बिताया था।
जब स्कूल के पहले दिन मैं डरकर पीछे मुड़ी थी,
भीड़ में आपका मुस्कुराता चेहरा दिखा था,
उस दिन समझ नहीं पाई,
पर अब जानती हूँ कि हौसला अक्सर पिता के रूप में खड़ा होता है।
मेरी हर ज़िद पूरी नहीं की आपने,
पर हर बार वजह समझाई,
आज दुनिया की हर ठोकर पर एहसास होता है,
कि आपने मुझे मनमर्ज़ी नहीं, समझदारी दी थी।
घर में सबसे कम बोलने वाले वही थे,
जो मेरी हर ख़ामोशी पढ़ लेते थे,
मैंने कई बार कुछ कहा ही नहीं,
और आपने फिर भी मेरा मन जान लिया।
मेरी तस्वीरें देखकर लोग कहते हैं मैं बदल गई हूँ,
पर आपको देखते ही मैं फिर वही बच्ची बन जाती हूँ,
जिसकी छोटी-सी उँगली में
पूरा भरोसा समाया हुआ था।
आपने कभी यह नहीं कहा कि रास्ता आसान होगा,
बस इतना कहा कि चलती रहना,
आज मेरी हिम्मत में जो स्थिरता है,
वह आपकी आवाज़ की देन है।
जब मैं गिरती थी तो माँ संभाल लेती थीं,
पर जब मैं हार मानने लगती थी,
तब आपके दो शब्द मुझे फिर खड़ा कर देते थे,
जैसे भरोसे को कोई नया सहारा मिल गया हो।
मेरी मुस्कान पर आपकी आँखों की चमक,
हमेशा मुझे हैरान करती है,
लगता है जैसे मेरी खुशियाँ
आपके हिस्से की सबसे बड़ी कमाई हों।
बचपन में कंधों पर बैठाकर मेले दिखाए,
बड़े होकर नज़रिए इतने ऊँचे दिए,
कि मुश्किलें आज भी छोटी लगती हैं,
और सपने थोड़े बड़े।
आपने मुझे बचाकर नहीं रखा,
बल्कि मज़बूत बनाया,
ताकि दुनिया का सामना करते हुए
मुझे हर पल किसी सहारे की ज़रूरत न पड़े।
घर की बहुत-सी चिंताएँ
आपने दरवाज़े पर ही छोड़ दीं,
तभी तो हमारा बचपन
इतना निश्चिंत और उजला था।
विदाई के दिन सबकी आँखें नम थीं,
पर आपकी ख़ामोशी सबसे ज़्यादा बोल रही थी,
उस दिन पहली बार समझ आया,
कि पिता अपने आँसू भी ज़िम्मेदारी से छिपाते हैं।
मेरी असफलताओं पर आपने डाँटा कम,
साथ ज़्यादा दिया,
इसीलिए आज जीत से पहले भी
मुझे हार का डर नहीं लगता।
आपके हाथों की पुरानी घड़ी,
आज भी समय से ज़्यादा सिखाती है,
कि ज़िंदगी में मूल्य चीज़ों का नहीं,
उनके पीछे लगे वर्षों का होता है।
दुनिया मुझे मेरे नाम से जानती है,
पर मेरी पहचान की नींव कहीं और है,
वह उन अनगिनत त्यागों पर टिकी है,
जिनका ज़िक्र आपने कभी नहीं किया।
मैं चाहे कितनी भी दूर चली जाऊँ,
एक बात कभी नहीं बदलती,
मेरे लिए घर वह जगह नहीं,
जहाँ मैं रहती हूँ,
घर वह एहसास है जहाँ आप रहते हैं।
जब भी मुझे किसी मुश्किल बात का जवाब नहीं मिलता,
मैं आज भी आपकी तरफ देखती हूँ,
बचपन में उँगली पकड़कर सड़क पार कराते थे,
अब आपकी सीख मुझे ज़िंदगी पार कराती है।
मेरी हर छोटी जीत पर जो सबसे पहले मुस्कुराते हैं,
वो आप हैं,
दुनिया मेरी कामयाबी देखती है,
आप उसके पीछे की मेरी थकान भी समझ लेते हैं।
आपने कभी अपने संघर्षों का हिसाब नहीं सुनाया,
बस इतना किया कि मेरी ज़रूरतें अधूरी न रहें,
मैंने बड़े होकर जाना,
कुछ लोग सपने पूरे करते हैं,
और कुछ अपने सपने रोककर किसी और के सपने पूरे करते हैं।
जब मैं घर से दूर होती हूँ,
तो समझ आता है कि सुरक्षा ताले से नहीं मिलती,
वो उस भरोसे से मिलती है,
कि किसी शहर, किसी दूरी, किसी परेशानी में,
एक व्यक्ति है जो कहेगा —
“घबराना मत, मैं हूँ।”
आपने मुझे उड़ना भी सिखाया
और यह यक़ीन भी दिया कि लौटने के लिए एक आँगन हमेशा रहेगा,
शायद इसी का नाम पिता होना है,
जहाँ बेटी उम्र में बड़ी हो जाती है,
पर उनके मन में हमेशा वही छोटी-सी बच्ची रहती है।
मेरे नाम से पहले जो सबसे ख़ामोश गर्व जुड़ा है,
वो आपका है,
मैं चाहे जहाँ पहुँच जाऊँ,
मेरी सबसे बड़ी पहचान यही रहेगी —
कि मैं उस इंसान की बेटी हूँ,
जिसने बिना शोर किए मुझे मज़बूत बनाया।