Akelapan Shayari
कई बार पूरा दिन लोगों के बीच गुज़रता है,
और रात को लगता है
जैसे आज भी किसी ने मुझे सच में नहीं देखा।
अब मैं अपनी ख़ुशियाँ भी धीरे से बताता हूँ,
क्योंकि हर बात सुन लेने वाले लोग,
हर बात महसूस कर लें, यह ज़रूरी नहीं।
कुछ रिश्ते टूटते नहीं,
बस उनमें बातचीत कम होती जाती है,
और एक दिन दूरी स्थायी हो जाती है।
मैं अक्सर खिड़की के पास नहीं बैठता,
फिर भी न जाने क्यों
इंतज़ार जैसी कोई चीज़ भीतर बनी रहती है।
अकेलापन शायद लोगों की कमी नहीं,
किसी अपनेपन की अनुपस्थिति है।
कभी-कभी मन करता है
बिना वजह किसी को फ़ोन करूँ,
फिर याद आता है कि वजह न होना
हर किसी के लिए पर्याप्त कारण नहीं होता।
मैंने कई बार हँसते हुए तस्वीरें खिंचवाई हैं,
मगर उनमें से बहुत कम दिनों में
मन सच में हल्का था।
कुछ बातें डायरी तक नहीं पहुँचतीं,
वे बस भीतर जमा रहती हैं,
जैसे किसी बंद कमरे में पुराना सामान।
सब मुझे समझदार कहते हैं,
शायद इसलिए कि मैंने
अपने दुखों को दूसरों पर रखना छोड़ दिया है।
कभी किसी महफ़िल से लौटकर देखा है?
शोर पीछे रह जाता है,
और भीतर का सन्नाटा साथ घर आता है।
मैंने महसूस किया है,
थकान हमेशा काम से नहीं होती,
कभी-कभी लगातार मज़बूत बने रहने से भी होती है।
लोग पूछते हैं क्या सोच रहे हो,
कैसे बताऊँ कि कई बार
सोचने के लिए भी कोई एक बात नहीं होती।
अब किसी के आने की उम्मीद कम है,
लेकिन दरवाज़ा भीतर का आज भी बंद नहीं किया।
कुछ दिन ऐसे होते हैं
जब कोई बुरी घटना नहीं होती,
फिर भी मन जैसे किसी अनुपस्थित चीज़ को ढूँढता रहता है।
मैंने अपनी तकलीफ़ों को शब्द देना कम कर दिया,
क्योंकि हर भावना को समझाने में
उसकी गर्मी कम हो जाती है।
कभी ध्यान दिया है,
सबसे ज़्यादा अकेलापन वहीं महसूस होता है
जहाँ सबसे ज़्यादा अपनापन मिलने की उम्मीद हो।
अब मैं देर तक जागता नहीं,
बस नींद आने से पहले
कुछ अनकहे ख़याल अपना समय माँग लेते हैं।
किसी ने मुझे छोड़ा नहीं,
फिर भी कभी-कभी लगता है
जैसे मैं कई लोगों की प्राथमिकताओं से उतर चुका हूँ।
कुछ खामोशियाँ दुख की नहीं होतीं,
वे बस इस बात का प्रमाण होती हैं
कि मन बहुत कुछ सोच चुका है।
मैंने अपने भीतर एक दुनिया बना ली है,
क्योंकि हर एहसास को बाहर जगह मिले,
यह हमेशा संभव नहीं होता।
अकेलेपन की सबसे अजीब बात यह है,
वह धीरे-धीरे आता है,
और फिर तुम्हारी आदतों में बस जाता है।
कभी कोई पुरानी बात याद आ जाए,
तो दुख नहीं होता,
बस यह महसूस होता है कि समय सच में बीत गया।
मैं अब कम शिकायत करता हूँ,
क्योंकि हर व्यक्ति अपनी लड़ाई में व्यस्त है,
और हर दर्द को श्रोता नहीं मिलते।
कई लोगों के पास मेरा नंबर है,
फिर भी कुछ दिनों में
एक भी बातचीत दिल तक नहीं पहुँचती।
कभी-कभी लगता है,
मैं लोगों से दूर नहीं हुआ,
बस अपने भीतर थोड़ा ज़्यादा रहने लगा हूँ।
जो बातें पहले तुरंत साझा कर देता था,
अब उन्हें कुछ देर अपने पास रखता हूँ,
जैसे मन को भी साथ की ज़रूरत हो।
अकेलापन हमेशा खाली कमरा नहीं होता,
कभी-कभी वह भरा हुआ जीवन होता है,
जिसमें अपनी जगह तय न लगे।
मैंने यह भी सीखा है,
हर समझदार व्यक्ति मज़बूत नहीं होता,
कई लोग बस अपनी टूटन छिपाना सीख जाते हैं।
कुछ शामें ऐसी होती हैं
जहाँ कोई याद नहीं आती,
फिर भी मन भारी रहता है,
जैसे भीतर कोई मौसम बदले बिना गुज़र रहा हो।
अब मुझे चुप्पी से डर नहीं लगता,
डर तो तब लगता है
जब मन की बात कहने का मन हो और नाम कोई न सूझे।
कभी-कभी लगता है,
दुनिया मुझे जानती बहुत है,
समझती बहुत कम है।
भीड़ में बैठे हुए भी कई बार ऐसा लगा,
जैसे मेरी बातों का अनुवाद किसी के पास नहीं था।
अब मैं कम बोलता हूँ,
क्योंकि हर बात समझाने की कोशिश
थकान बनकर लौट आती है।
घर में सब मौजूद होते हैं,
फिर भी कभी-कभी अपना हाल पूछने के लिए
मन को खुद के पास बैठना पड़ता है।
अकेलापन तब नहीं चुभता जब कोई साथ न हो,
वह तब महसूस होता है
जब बहुत लोग हों और कोई समझने वाला न हो।
कई दिनों से किसी से शिकायत नहीं की,
शायद इसलिए नहीं कि सब ठीक है,
बल्कि इसलिए कि सुनने वाला कोई तय नहीं है।
मैंने खुद से बातें करना सीख लिया है,
लोग अक्सर इसे आदत समझते हैं,
मगर यह कई अनकही बातों का ठिकाना है।
कुछ ख़ामोशियाँ शांति नहीं होतीं,
वे बस उन सवालों का घर होती हैं
जिन्हें हम किसी से पूछ नहीं पाते।
अजीब है,
दूसरों की ज़िन्दगी में मेरी जगह साफ़ दिखाई देती है,
बस अपनी ज़िन्दगी में ही खुद को ढूँढता रहता हूँ।
अब फ़ोन कम बजता है,
और मैंने इंतज़ार करना भी छोड़ दिया है,
मगर हर सूचना पर नज़र आज भी चली जाती है।
कभी-कभी पूरा दिन निकल जाता है,
और शाम को महसूस होता है
कि मैंने किसी से सच में बात ही नहीं की।
कुछ लोग दूर नहीं गए,
बस धीरे-धीरे हमारी दुनिया से उनका रिश्ता कम हो गया।
मैं ठीक हूँ कहने की आदत पड़ गई है,
क्योंकि हर बार सच बताने की ताक़त नहीं होती।
सबके पास अपनी-अपनी व्यस्तताएँ हैं,
और मेरे पास कुछ ऐसे विचार,
जो किसी बातचीत तक पहुँच ही नहीं पाते।
अकेलापन हमेशा शोर नहीं करता,
कई बार वह चुपचाप कुर्सी खींचकर
तुम्हारे पास बैठ जाता है।
मैंने महसूस किया है,
कुछ दर्द आँकड़ों में नहीं आते,
वे बस दिन भर सामान्य दिखने के बाद
रात को थकान बन जाते हैं।
किसी ने पूछा नहीं,
और मैंने बताया नहीं,
कई रिश्ते इसी संतुलन में फीके पड़ जाते हैं।
अब मैं भीड़ से नहीं भागता,
बस वहाँ खुद को ढूँढने की उम्मीद नहीं रखता।
कभी-कभी आईने में देखकर लगता है,
यह चेहरा सबको दिखता है,
मगर इसके भीतर का मौसम किसी को नहीं।
सब कुछ बुरा नहीं है ज़िन्दगी में,
फिर भी एक खाली जगह है,
जो किसी कमी का नाम नहीं बताती।
कुछ शामें ऐसी होती हैं,
जहाँ कोई दुख नहीं होता,
फिर भी मन भारी रहता है।
अकेले रहने और अकेला महसूस करने में फ़र्क है,
पहला चुनाव हो सकता है,
दूसरा अक्सर एक अनुभव होता है जिसे समझाना मुश्किल है।
मैंने लोगों को खोया कम है,
बस धीरे-धीरे यह महसूस किया है
कि हर साथ भीतर तक नहीं पहुँचता।
कभी किसी ने पूछा था,
"तुम इतने चुप क्यों रहते हो?"
मैंने मुस्कुरा दिया,
कुछ जवाब शब्दों से ज़्यादा लंबे होते हैं।
अब ख़ुद को समझना सीख रहा हूँ,
क्योंकि हर सफ़र में हमसफ़र मिल जाए,
यह ज़रूरी नहीं होता।
अंदर का खालीपन हमेशा किसी व्यक्ति की वजह से नहीं होता,
कभी-कभी वह उन हिस्सों से बनता है
जिन्हें हम खुद भी पूरी तरह नहीं समझते।