मेज़ पर पड़ी चाबी को उंगलियों से घुमा रहा हूँ,
बस ध्यान भटकाने की एक नाकाम कोशिश चल रही है,
हर बार जब कैफ़े का दरवाज़ा थोड़ा सा खटकता है,
दिल एक पल के लिए ठहर कर फिर ज़ोर से धड़कता है।
यह उत्सुकता भी कितनी अचरज भरी होती है,
कि बिना मिले ही किसी का इंतज़ार इतना सगा हो जाता है,
कोई दावा नहीं है कि हम उम्र भर साथ चलेंगे,
पर आज की इस शाम को जीने का इरादा पक्का है।
सोच रहा हूँ तुम्हारे सामने आने पर सीधे बैठूँ या सहज रहूँ,
हाथों को कहाँ रखूँ कि मेरी घबराहट साफ़ न दिखे,
पहली मुलाक़ात का यह भोलापन भी कितना हसीन है,
जहाँ हर छोटी सी हरकत पर ख़ुद को ही जाँचना पड़ता है।
तुम्हारी पसंद की वो जगह मैंने बहुत सोच-समझकर चुनी है,
जहाँ का माहौल थोड़ा शांत और थोड़ा रूमानी सा है,
चाहता हूँ कि जब तुम आओ तो यहाँ तुम्हें सुकून मिले,
और हमारे बीच की बातचीत बिना किसी झिझक के बह सके।
शायद तुम भी इस वक़्त आईने के सामने खड़ी होगी,
बालों की लट को सँवारते हुए कुछ सोच रही होगी,
यह ख़्याल ही दिल में एक अजीब सी गुदगुदी कर जाता है,
कि हम दोनों एक ही समय पर एक ही बात सोच रहे हैं।
बातें करने के लिए कोई लंबा-चौड़ा विषय नहीं सोचा है,
बस तुम्हारी हँसी को सुनना और अपनी बातें कहना है,
एक-दूसरे के संसार को छूने की यह पहली सीढ़ी है,
जहाँ सिर्फ़ उम्मीदें हैं और कोई भारी उम्मीदों का बोझ नहीं।
रास्ते की ट्रैफ़िक को आज पहली बार दिल से कोसा है,
कि कहीं इस भीड़ की वजह से तुम थोड़े लेट न हो जाओ,
पर फिर सोचता हूँ कि इस धीरे-धीरे बढ़ते इंतज़ार में भी,
एक अलग ही तरह का नशा और एक अलग ही मज़ा है।
काँच की खिड़की से बाहर सड़क पर नज़रें टिकी हैं,
हर आती हुई गाड़ी में बस तुम्हारा ही चेहरा ढूँढता हूँ,
यह पहली डेट का रोमांच भी कितना अजीब होता है,
कि हर अजनबी इंसान में बस एक ही शख़्स की तलाश होती है।
दिल में एक हल्की सी कँपकँपी है जो रुकती ही नहीं,
जैसे कोई नया इम्तिहान हो और तैयारियाँ पूरी न हों,
पर इस डर में भी एक छुपा हुआ सा मुस्कुराता हुआ सच है,
कि आज का यह दिन हमेशा के लिए याद रहने वाला है।
लो, आख़िरकार वो साया खिड़की के पास आकर रुका है,
तुम्हारे हाथों का वो धीमे से कैफ़े का हैंडल दबाना,
सारे इंतज़ार का हिसाब बस इसी एक पल में चुकता हो गया,
अब धड़कनें शांत हैं और चेहरे पर एक सच्ची मुस्कान है।
मेज़ की बत्ती को ज़रा सा धीमा कर दिया है,
ताकि तुम्हारी आँखों की चमक साफ़ देख सकूँ,
दिल की इस अजीब सी उलझन पर हँसी आती है,
कि अभी मिले भी नहीं और तुम्हें खोने का डर कैसा है।
चाय का ऑर्डर पहले ही दे दूँ या तुम्हारे आने का इंतज़ार करूँ,
इसी कशमकश में न जाने कितने मिनट गुज़र गए,
यह पहली मुलाक़ात इंसान को कितना संजीदा बना देती है,
कि छोटी सी बात भी एक बड़ा फ़ैसला लगने लगती है।
तुम्हारे आने की दिशा में ही मुख करके बैठा हूँ,
कि जैसे ही तुम आओ, मेरी पहली नज़र सिर्फ़ तुम पर पड़े,
एक घबराहट ज़रूर है पर उसमें एक असीम तसल्ली भी है,
कि आज आख़िरकार वो ख़्वाब हक़ीक़त बनने जा रहा है।
रास्ते भर जो बातें मैंने ख़ुद से दोहराई थीं,
अब वो सारी बातें हवा में उड़ती हुई सी लग रही हैं,
तुम्हारी एक आहट ही सब कुछ भुला देने के लिए काफ़ी है,
यह नयापन सच में दिल को एक अलग ही सुकूँ देता है।
बार-बार अपनी आस्तीन को सही करना और घड़ी देखना,
वक़्त को काटने का इससे बेहतर बहाना और क्या होगा,
आस-पास के लोग शायद मेरी इस बेताबी को समझ रहे हैं,
पर आज मुझे किसी की परवाह नहीं, बस तुम्हारा इंतज़ार है।
सोच रहा हूँ जब तुम बैठोगे तो सबसे पहले क्या कहूँगा,
तुम्हारी तारीफ़ करूँ या सीधे अपनी घबराहट कुबूल कर लूँ,
सादगी से अपनी बात रख देना ही शायद सबसे बेहतर होगा,
इस पहली मुलाक़ात को बनावटीपन से दूर ही रखना है।
बाहर बारिश की हल्की सी बूंदे गिरने लगी हैं,
मौसम ने भी जैसे हमारी इस मुलाक़ात का साथ दिया है,
एक भीगी सी शाम और सामने तुम्हारा होना,
इससे ख़ूबसूरत शुरुआत भला और क्या हो सकती है।
दिल का एक कोना कह रहा है कि तुम भी डरे हुए हो,
कि पहली बार किसी से मिलना सबके लिए एक पहेली ही होता है,
यह सोचकर थोड़ी सी हिम्मत बढ़ जाती है अंदर,
कि इस सफ़र में हम दोनों ही बराबरी के मुसाफ़िर हैं।
ज़हन में बस एक ही ख़्वाहिश बार-बार करवट लेती है,
कि जब यह मुलाक़ात ख़त्म हो, तो कोई पछतावा न हो,
बस एक उम्मीद बची रहे कि हम दोबारा जल्द मिलेंगे,
और यही उम्मीद इस शाम का सबसे हसीन तोहफ़ा होगी।
लो, कैफ़े का दरवाज़ा खुला और एक ताज़ा हवा अंदर आई,
तुम्हारी वही जानी-पहचानी मुस्कान अब मेरी तरफ़ बढ़ रही है,
सारे सवाल, सारी घबराहट बस इसी पल में थम गई,
अब हमारी कहानी का यह पहला पन्ना शुरू हो रहा है।
शाम के साए गहरे हो रहे हैं और दिल की हलचल तेज़,
बार-बार घड़ी देखना अब एक आदत सी बन गई है,
कैफ़े के दरवाज़े पर टिक गई हैं आँखें मेरी,
कि हर आने वाले साए में बस तुम्हारा ही अक्स दिखता है।
यह जो मिलने से पहले का थोड़ा सा अधूरापन है,
इसी में तो इस मुलाक़ात का असली सुकून छुपा है,
सोच रहा हूँ जब तुम बैठोगे मेरे ठीक सामने,
तो वो पहला लम्हा हम दोनों कैसे संभालेंगे।
इत्र की ख़ुशबू हवा में बिखेर कर बैठा हूँ,
पर डर है कहीं मेरी घबराहट इसे दबा न दे,
तुम्हारे आने का ख़्याल ही इतना मुकम्मल है,
कि यह लंबा इंतज़ार भी अब बुरा नहीं लगता।
ज़हन में एक पूरी बातचीत का नक़्शा बना लिया है,
कहाँ रुकना है और कहाँ मुस्कुराना है, सब सोच लिया है,
पर जानता हूँ जब तुम सामने आकर बैठोगे,
तो ये सारी तरकीबें धरी की धरी रह जाएँगी।
मेज़ पर रखे पानी के ग्लास को यूँ ही छू रहा हूँ,
उंगलियों की कँपकँपी छुपाने का ये बहाना अच्छा है,
तुम्हारी एक झलक पाने की चाहत इस कदर है,
कि आस-पास की सारी रौनक़ें आज धुंधली लग रही हैं।
कोई जल्दबाज़ी नहीं है मुझे इस मुलाक़ात में,
मैं तो बस तुम्हारी सादगी को ठहरकर देखना चाहता हूँ,
बिना किसी मुखौटे के, बिना किसी बनावट के,
तुम्हारे साथ इस नए सफ़र की ज़मीन तैयार करना चाहता हूँ।
रास्तों की भीड़ से निकलकर जब तुम यहाँ आओगे,
तो इस शोर-शराबे के बीच एक ठहराव सा आ जाएगा,
एक ऐसा ठहराव जहाँ सिर्फ़ दो अजनबी होंगे,
जो एक-दूसरे की दुनिया में धीरे से क़दम रख रहे होंगे।
फ़ोन की स्क्रीन पर बार-बार नाम चमकता है तुम्हारा,
शायद तुम बस पहुँचने ही वाले हो यह बताने के लिए,
दिल की रफ़्तार ने एक नई करवट ली है इस पल,
यह पहली मुलाक़ात सच में होश उड़ाने के लिए काफ़ी है।
चाहता हूँ कि बातें बेहद आम और ज़मीनी हों,
तुम्हारी हँसी और मेरी उलझनों के कुछ सीधे क़िस्से हों,
कोई भारी भरकम वादे नहीं, बस एक सहज शुरुआत हो,
जिसकी मिठास देर तक दोनों के साथ बनी रहे।
लो, दूर से एक परिचित सी आहट सुनाई दी है,
एक धीमा सा क़दम जो इस मेज़ की तरफ़ बढ़ रहा है,
घबराहट अब ख़त्म हुई और उम्मीद सामने खड़ी है,
आज की शाम अब हमारे नाम होने जा रही है।
घड़ी की सुइयां जैसे थम सी गई हैं,
तैयारियों में आज कुछ ज़्यादा ही वक़्त लगा है,
आईने से आज बार-बार एक ही सवाल पूछा है,
कि पहली मुलाक़ात में सादगी अच्छी लगेगी या थोड़ा सँवरना।
बातें जो सोच रखी हैं वो याद रहेंगी या नहीं,
तुम्हारे सामने आते ही कहीं सब भूल न जाऊँ,
एक अजीब सी धड़कन है जो ठहरने का नाम नहीं लेती,
ये पहली बार मिलने का सफ़र भी कितना ख़ूबसूरत होता है।
अलमारी के सारे कपड़े आज बाहर आ गए,
हर रंग में बस यही देखा कि तुम्हें क्या भाएगा,
मुस्कुराहट का एक टुकड़ा होंठों पर सजाकर रखा है,
तय करना है कि तुम्हें देखते ही कैसे मुस्कुराना है।
कुछ अनकही सी बातें हैं जो दिल में तैर रही हैं,
एक अजनबी से ख़ास बनने का ये मोड़ कितना हसीन है,
अभी मिले भी नहीं और ज़हन में एक अक्स सा बन गया है,
उम्मीद और घबराहट का ये मेल सच में कमाल का है।
रास्ते आज लंबे लग रहे हैं और वक़्त सुस्त हो गया है,
तुम्हारे शहर की हवाओं में भी एक नयापन सा महसूस हो रहा है,
सोच रहा हूँ जब तुम सामने आओगे तो पहला लफ़्ज़ क्या होगा,
क्या बस हाथ मिलाकर हाल पूछना ही काफ़ी होगा।
चाय की दो प्यालियाँ और ढेरों अनकही बातें,
मेज़ के उस पार तुम्हें देखने की ख़्वाहिश गहरी है,
कोई दावा नहीं, कोई उम्र भर का वादा नहीं,
बस इस शाम को एक ख़ूबसूरत शुरुआत बनाने की चाहत है।
दिल में एक मीठी सी हलचल सी मची हुई है,
जैसे पतझड़ के बाद पहली बारिश की दस्तक हो,
तुम्हें जानने की उत्सुकता इस कदर बढ़ी है आज,
कि पहली मुलाक़ात का ये डर भी अब प्यारा लगने लगा है।
काँच के सामने खड़े होकर ख़ुद से ही बातें की हैं,
ज़रा सा बालों को सँवारा, फिर ज़रा सा बिगाड़ दिया,
चाहता हूँ कि जैसी भी हो, बस हमारी बात जम जाए,
ये सोचकर ही दिल की रफ़्तार थोड़ी तेज़ हो जाती है।
वक़्त से थोड़ा पहले ही पहुँच जाने की आदत नहीं मेरी,
पर आज न जाने क्यों वक़्त से पहले ही निकल पड़ा हूँ,
कैफ़े के उस कोने की सीट शायद हमारे लिए ही ख़ाली है,
जहाँ आज एक नई कहानी का पहला पन्ना लिखा जाना है।
तुम्हारे मुस्कुराने का अंदाज़ कैसा होगा,
क्या तुम भी इस मुलाक़ात को लेकर कुछ सहमे से हो,
यह सोचना भी अपने आप में एक सुकून देता है,
कि कहीं न कहीं तुम भी इसी पल का इंतज़ार कर रहे हो।
कोई बड़ी ख़्वाहिश नहीं है इस पहली मुलाक़ात से,
बस जब हम विदा लें तो दोनों के चेहरे पर एक तसल्ली हो,
एक ऐसी याद जो घर लौटते हुए रास्ते भर साथ चले,
और हम दोनों फिर से मिलने का दिन गिनने लगें।
पॉकेट में रखा हाथ बार-बार फ़ोन को छूता है,
शायद तुम्हारा कोई संदेश आया हो कि तुम कहाँ पहुँचे,
बेचैनी और ख़ुशी का ऐसा संगम पहले कभी नहीं देखा,
यह पहली मुलाक़ात सच में दिल को कितना बच्चा बना देती है।
सब कुछ नया है, ये अहसास भी और ये रास्ता भी,
ज़हन में सवालों का एक सैलाब सा उमड़ रहा है,
पर इन सबमें एक मीठी सी उम्मीद छुपी हुई है,
कि जो भी होगा, आज की ये शाम बहुत ख़ास होगी।
तुम्हारी आँखों में झाँकने की हिम्मत जुटा रहा हूँ,
सोच रहा हूँ जब नज़रें मिलेंगी तो कैसे संभलूँगा,
बातें तो बहुत सी हैं पर आवाज़ साथ देगी या नहीं,
इस नए सफ़र की पहली दहलीज़ पर पाँव भारी से लग रहे हैं।
एक अजनबी के साथ बैठना और फिर धीरे-धीरे खुलना,
पसंद और नापसंद के छोटे-छोटे क़िस्सों को बुनना,
इसी सादगी में तो पहली मुलाक़ात का असली मज़ा है,
जहाँ कोई मुखौटा नहीं होता, बस दो दिल होते हैं।
हवा में आज एक अजीब सा नशा है जो बहका रहा है,
शायद तुम्हारी मौजूदगी का असर वक़्त से पहले आ गया है,
तैयार हूँ मैं हर उस बात के लिए जो तुम कहोगे,
बस एक बार सामने आकर इस धड़कन को थाम लो।
आईने ने आज मुस्कुराकर कहा कि तुम तैयार हो,
पर दिल ने कहा कि थोड़ी कसर अभी और बाक़ी है,
जब तक तुम्हारी नज़रों की मंज़ूरी न मिल जाए,
तब तक यह सँवरना अधूरा सा ही रहेगा।
बातें शुरू कहाँ से करनी है, यह तय नहीं हो पाया,
मौसम का हाल पूछूँ या तुम्हारी इस ख़ूबसूरत सी चाल का,
ख़ैर, जो भी होगा वो वक़्त ही तय करेगा,
अभी तो बस तुम्हारे आने की आहट का इंतज़ार है।
एक घबराहट है जो चेहरे पर साफ़ दिखाई देती है,
पर इस घबराहट के पीछे एक छुपने वाली ख़ुशी भी है,
चाहता हूँ कि हमारी ये पहली मुलाक़ात इतनी सहज हो,
कि अगली बार मिलने के लिए बहाने न ढूँढने पड़ें।
शाम ढलने को है और दिल की धड़कनें बढ़ने लगी हैं,
दूर से एक साया तुम्हारी तरह आता हुआ दिख रहा है,
अब बस कुछ पलों का फ़ासला है हमारे बीच,
लो, आज एक नए ख़्वाब की शुरुआत होने जा रही है।