मेरे पिता ने कभी ऊँची आवाज़ में
अपनी महानता साबित नहीं की,
उन्होंने बस अपना जीवन ऐसे जिया
कि सम्मान अपने आप उनके साथ चलता रहा।
जब मैं छोटा था,
मुझे लगता था वे हर समस्या का हल जानते हैं,
आज समझता हूँ,
वे भी चिंतित होते थे,
बस हमें डरने नहीं देते थे।
उन्होंने मुझे यह नहीं सिखाया
कि हमेशा जीतना ज़रूरी है,
उन्होंने सिखाया कि
हर हाल में ईमानदार रहना ज़रूरी है।
मेरी पहली साइकिल से लेकर
ज़िंदगी के बड़े फैसलों तक,
उनका हाथ भले पीछे हो गया,
पर उनका भरोसा हमेशा साथ रहा।
जब लोग मेरी समझदारी की बात करते हैं,
तो मुझे उनकी साधारण-सी बातें याद आती हैं,
जो उस समय सामान्य लगीं,
पर उम्र के साथ जीवन का आधार बन गईं।
उन्होंने कभी अपनी थकान को
घर की दीवारों तक नहीं आने दिया,
तभी हमारा बचपन
इतना बेफ़िक्र रह सका।
मैंने उनसे सीखा,
कि मज़बूत इंसान वह नहीं
जो कभी टूटे नहीं,
बल्कि वह है जो टूटकर भी
अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाता रहे।
मेरे सपनों को सबसे पहले
जिसने गंभीरता से लिया,
वह मेरे पिता थे,
वरना दुनिया तो अक्सर
उम्र देखकर विश्वास करती है।
जब मैं असफल हुआ,
उन्होंने कारण पूछे,
लेकिन मेरा आत्मविश्वास नहीं छीना,
यही बात मुझे फिर से खड़ा कर गई।
उन्होंने मुझे विरासत में
कोई आसान रास्ता नहीं दिया,
पर ऐसा चरित्र दिया
जो हर रास्ते पर काम आता है।
मैंने कई लोगों को
अपने नाम का गर्व करते देखा है,
मैं उस इंसान का बेटा होने पर गर्व करता हूँ
जिसने नाम से पहले कर्म को महत्व दिया।
जब घर में मुश्किल समय आया,
मैंने पहली बार समझा,
पिता सिर्फ़ कमाने वाले नहीं होते,
वे पूरे परिवार का हौसला भी होते हैं।
उन्होंने सिखाया कि
लोग तुम्हें कितना जानते हैं,
इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण है,
लोग तुम पर कितना भरोसा करते हैं।
मेरे हर बड़े फैसले में
उनकी कोई न कोई सीख शामिल होती है,
भले ही आज वह मेरे साथ बैठे न हों।
उन्होंने कभी मेरे सपनों का मज़ाक नहीं उड़ाया,
चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हों,
यही कारण है कि
मैंने ख़ुद पर विश्वास करना सीखा।
जब मैं पिता की उम्र के क़रीब पहुँच रहा हूँ,
तो उनकी कई बातें
अब जाकर समझ आने लगी हैं,
जिन्हें कभी मैं ज़रूरत से ज़्यादा सावधानी समझता था।
उन्होंने मुझे सफलता का अर्थ बताया,
कि सम्मान खोकर मिली जीत,
असल में हार होती है।
मेरे जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा
कोई संपत्ति नहीं,
बल्कि यह विश्वास है
कि मैं अच्छे संस्कारों के साथ बड़ा हुआ हूँ।
उन्होंने हमेशा कहा,
काम ऐसा करो कि
तुम्हें अपनी पहचान बतानी न पड़े,
तुम्हारा व्यवहार ही बता दे।
मैंने उनसे सीखा,
कि परिवार के लिए खड़े रहना
कमज़ोरी नहीं,
सबसे बड़ी ताक़त होती है।
जब मैं किसी कठिन परिस्थिति में शांत रहता हूँ,
तो समझ जाता हूँ,
यह आदत मेरी नहीं,
पिता की दी हुई सीख है।
उन्होंने मेरे लिए सब कुछ आसान नहीं किया,
क्योंकि वे चाहते थे
कि मैं मज़बूत बनूँ,
सिर्फ़ सुरक्षित नहीं।
मेरे जीवन की बहुत-सी सफलताएँ
उन दिनों से शुरू हुईं,
जब उन्होंने मुझसे कहा था,
"कोशिश जारी रखो, अभी समय बाकी है।"
मैंने उन्हें कभी अपने संघर्षों का
हिसाब रखते नहीं देखा,
वे बस आगे बढ़ते रहे,
और यही उनका सबसे बड़ा सबक था।
आज अगर मैं ज़िम्मेदार हूँ,
तो इसलिए नहीं कि मैं बड़ा हो गया हूँ,
बल्कि इसलिए कि मैंने
एक ज़िम्मेदार पिता को करीब से देखा है।
अगर मुझसे पूछा जाए
कि मेरी सबसे बड़ी विरासत क्या है,
तो मैं किसी चीज़ का नाम नहीं लूँगा,
मैं कहूँगा —
मेरे पिता की सोच,
जो आज भी मेरे हर निर्णय में जीवित है।
जब मैं छोटा था,
तो लगता था पिता सिर्फ़ नियम बनाते हैं,
बड़ा हुआ तो समझ आया,
वे मुझे जीवन के लिए तैयार कर रहे थे।
मेरी पहली जीत पर जितनी ख़ुशी मुझे हुई थी,
उससे ज़्यादा चमक उनके चेहरे पर थी,
तभी जाना,
कुछ सपने दो लोग मिलकर पूरे करते हैं।
उन्होंने मुझे कभी आसान रास्तों का लालच नहीं दिया,
बस मेहनत पर भरोसा करना सिखाया,
यही वजह है कि आज भी
शॉर्टकट से ज़्यादा सफ़र पर विश्वास है।
जब जेब में कम और ज़िम्मेदारियाँ ज़्यादा थीं,
तब भी उन्होंने हौसला कम नहीं होने दिया,
उनकी यही आदत
आज मेरी सबसे बड़ी ताक़त है।
मैंने उनसे बोलकर कम,
उन्हें देखकर ज़्यादा सीखा है,
क्योंकि कुछ लोग किताब नहीं होते,
फिर भी पूरी ज़िंदगी सिखा जाते हैं।
उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि
मैं तुम्हारे लिए सब कर दूँगा,
उन्होंने कहा,
मैं तुम्हें इतना मज़बूत बनाऊँगा कि तुम ख़ुद कर सको।
मेरी गलतियों पर उन्होंने नाराज़गी दिखाई,
पर मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा,
यही बात मुझे आज भी
रिश्तों की असली परिभाषा लगती है।
जब दुनिया परिणाम देख रही थी,
वह मेरी कोशिश देख रहे थे,
शायद इसी वजह से
मैं हारकर भी पूरी तरह नहीं टूटा।
उन्होंने सिखाया कि
इंसान की पहचान उसके शब्दों से नहीं,
उसके निभाए हुए वादों से बनती है।
मेरे आत्मविश्वास की जड़ें
किसी उपलब्धि में नहीं,
उस भरोसे में हैं
जो पिता ने हमेशा मुझ पर रखा।
अब जब ज़िम्मेदारियाँ समझ आने लगी हैं,
तो उनके मौन का अर्थ भी समझ आता है,
वे कम बोलते थे,
पर हर चिंता सबसे पहले उनकी होती थी।
उन्होंने मुझे प्रतिस्पर्धा नहीं,
योग्यता सिखाई,
दूसरों से आगे निकलना नहीं,
अपने कल से बेहतर बनना सिखाया।
जब भी कोई कठिन निर्णय सामने आता है,
मैं सोचता हूँ,
ऐसी स्थिति में पिता क्या करते,
और अक्सर जवाब मिल जाता है।
मेरे व्यक्तित्व में जो भी स्थिरता है,
वह संयोग नहीं,
वह उन वर्षों की परवरिश है
जो उन्होंने धैर्य से की।
अगर मेरी पहचान में ईमानदारी,
मेहनत और सम्मान दिखाई देता है,
तो उसका श्रेय मुझे नहीं,
उस इंसान को जाता है
जिसे मैं पिता कहता हूँ।