“तुम इतने अलग क्यों हो?”
“क्योंकि मैंने भीड़ से दिशा नहीं, अपने अनुभवों से रास्ता चुना है।”
“तुम्हें नज़रअंदाज़ किया जाए तो?”
“मैं शोर नहीं बढ़ाता,
अपनी काबिलियत बढ़ा लेता हूँ।”
“इतना आत्मविश्वास कहाँ से लाते हो?”
“हर उस दिन से,
जब हालात मेरे खिलाफ़ थे और मैं फिर भी खड़ा रहा।”
“तुम्हें हर बात पर सफ़ाई देनी चाहिए।”
“जिसे समझना हो, उसे सफ़ाई नहीं चाहिए होती।”
“तुम्हारी पहचान क्या है?”
“जो मैं अकेले में हूँ, वही मेरी असली पहचान है।”
“अगर लोग तुम्हारे खिलाफ़ हो जाएँ तो?”
“रास्ते नहीं बदलता,
बस साथ चलने वालों की गिनती कम हो जाती है।”
“तुम्हें सबसे आगे रहना पसंद है?”
“मुझे सबसे सच्चा रहना पसंद है, आगे रहना उसका परिणाम है।”
“तुम्हें क्या खास बनाता है?”
“मैं मौके का इंतज़ार कम, तैयारी ज़्यादा करता हूँ।”
“तुम्हारी सबसे महंगी चीज़ क्या है?”
“मेरा आत्मसम्मान,
जिसे मैं किसी भी सौदे में शामिल नहीं करता।”
“अगर कोई तुम्हारी कदर न करे?”
“मैं अपनी कीमत कम नहीं करता, बस दूरी बढ़ा देता हूँ।”
“इतनी शांति कैसे रख लेते हो?”
“क्योंकि हर लड़ाई लड़ना बहादुरी नहीं, कुछ छोड़ना भी समझदारी है।”
“तुम्हें हार पसंद नहीं?”
“हार से शिकायत नहीं,
बिना कोशिश के हारना पसंद नहीं।”
“तुम पर भरोसा क्यों किया जाए?”
“क्योंकि मैं वादों से ज़्यादा आदतों पर काम करता हूँ।”
“तुम्हारी सबसे बड़ी जीत?”
“जब मैंने दूसरों से तुलना करना छोड़ दिया।”
“अगर रास्ता कठिन हो तो?”
“तो समझ लेता हूँ कि कुछ मूल्यवान सामने है।”
“तुम्हें पहचान चाहिए या सम्मान?”
“पहचान समय दे देता है, सम्मान चरित्र देता है।”
“तुम इतना कम बोलते क्यों हो?”
“क्योंकि हर बात सुनाई दे, यह ज़रूरी नहीं; कुछ बातें दिखाई देनी चाहिए।”
“तुम्हारी सबसे बड़ी सीख?”
“जो खुद पर नियंत्रण नहीं रखता, वह किसी उपलब्धि को भी नहीं संभाल सकता।”
“लोग तुम्हें घमंडी कहते हैं।”
“सीमाएँ तय करने वाले लोगों को अक्सर गलत समझा जाता है।”
“तुम किससे प्रेरित हो?”
“उस इंसान से, जो मैं पाँच साल पहले था और हार नहीं माना।”
“अगर कोई तुम्हें चुनौती दे?”
“मैं उसे विरोधी नहीं मानता, सीखने का एक और मौका मानता हूँ।”
“तुम्हें किस बात का गर्व है?”
“इस बात का कि मुश्किल समय ने मुझे कड़वा नहीं, मज़बूत बनाया।”
“तुम्हारी चुप्पी क्या कहती है?”
“कि मुझे हर बहस में शामिल होने की ज़रूरत नहीं।”
“तुम्हें सफलता की जल्दी नहीं?”
“मुझे जल्दी नहीं, स्थिरता चाहिए।”
“तुम्हारा जवाब क्या है आलोचना को?”
“सुधार जहाँ ज़रूरी हो, और अनदेखा जहाँ ज़रूरी हो।”
“तुम इतनी आसानी से टूटते क्यों नहीं?”
“क्योंकि मैं उम्मीदों पर नहीं, मूल्यों पर खड़ा हूँ।”
“अगर कोई तुमसे आगे निकल जाए?”
“तो मैं उसकी गति नहीं, अपनी दिशा देखता हूँ।”
“तुम्हारा नियम क्या है?”
“सम्मान दो, सम्मान लो; बाकी सब अतिरिक्त है।”
“तुम्हें क्या साबित करना है?”
“कुछ नहीं,
मैं अपना जीवन जी रहा हूँ, बहस नहीं।”
“आख़िर तुम्हारा असली रवैया क्या है?”
“मैं किसी पर असर छोड़ने नहीं निकलता,
बस इतना ध्यान रखता हूँ कि अपने सिद्धांत पीछे न छोड़ दूँ।”
“इतना शांत क्यों रहते हो?”
मैंने मुस्कुराकर कहा,
“जो अपनी दिशा जानता हो, उसे हर मोड़ पर बोलना नहीं पड़ता।”
“तुम्हें फ़र्क नहीं पड़ता क्या?”
“पड़ता है, मगर उतना ही,
जितना रास्ते को राहगीरों की राय से पड़ता है।”
“सबको जवाब क्यों नहीं देते?”
“क्योंकि हर आवाज़ सवाल नहीं होती,
कुछ सिर्फ़ ध्यान खींचने की कोशिश होती हैं।”
“तुम बदल गए हो।”
“नहीं, अब बस हर किसी की उम्मीदों के हिसाब से नहीं जीता।”
“अकेले नहीं लगते?”
“लगता है, मगर गलत लोगों के साथ होने से कम।”
“तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत क्या है?”
“जो खो गया, उसके बाद भी ख़ुद को न खोना।”
“इतना यक़ीन कहाँ से आया?”
“उन दिनों से, जब साथ कोई नहीं था और हार मानना सबसे आसान था।”
“तुम्हें पहचान मिल गई?”
“पहचान नहीं ढूँढ़ी,
बस काम ऐसा किया कि नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया।”
“लोग क्या सोचेंगे?”
“जो लोग ख़ुद नहीं जीते,
अक्सर वही दूसरों की ज़िंदगी पर सबसे ज़्यादा सोचते हैं।”
“तुम्हें रोकना आसान नहीं होगा।”
“रोक सकते हो,
लेकिन मुझे मेरी वजहों से अलग नहीं कर सकते।”
“इतनी ऊँची सोच क्यों रखते हो?”
“क्योंकि सपनों की ऊँचाई से पहले, नज़र की ऊँचाई ज़रूरी होती है।”
“तुम हर बार संभल कैसे जाते हो?”
“मैं गिरने से नहीं डरता,
मैं वही गलती दोहराने से डरता हूँ।”
“तुम्हें साबित क्या करना है?”
“कुछ नहीं,
मैं प्रतियोगिता में नहीं, निर्माण में लगा हूँ।”
“सबकी तरह क्यों नहीं बन जाते?”
“क्योंकि नकल से जगह मिल सकती है, पहचान नहीं।”
“तुम्हें सम्मान कैसे मिला?”
“माँगा नहीं,
हर दिन थोड़ा-थोड़ा कमाया है।”
“अगर कोई तुम्हें कम आँके तो?”
“मैं उसकी राय नहीं बदलता,
बस अपना सफ़र जारी रखता हूँ।”
“इतना धैर्य कहाँ से लाते हो?”
“समय ने सिखाया है,
जल्दी खिलने वाली चीज़ें अक्सर जल्दी मुरझा भी जाती हैं।”
“तुम्हारी खामोशी में इतना वज़न क्यों है?”
“क्योंकि उसमें अधूरे बहाने नहीं, पूरे अनुभव रहते हैं।”
“तुम्हें डर किस बात का है?”
“उस दिन का,
जब मैं अपने ही उसूलों से समझौता कर लूँ।”
“तुम्हारी जीत का राज़?”
“मैं हर दिन जीतने नहीं निकलता,
बस हर दिन हार मानने से इंकार करता हूँ।”
“आख़िर तुम हो कौन?”
“एक ऐसा इंसान,
जिसने हालात से लड़कर यह सीखा है कि सम्मान आवाज़ से नहीं, व्यक्तित्व से मिलता है।”