तुम्हारे जाने के बाद सबसे पहले बातें नहीं बदलीं,
बदली तो वे छोटी आदतें, जिनमें तुम्हारी मौजूदगी रहती थी।
किसी बात पर तुम्हारी राय लेने को मन होता,
फिर याद आता कि अब वह अधिकार भी बीते दिनों का हिस्सा है।
मैंने बहुत समय तक तुम्हारे लौटने की उम्मीद नहीं की,
बस मन यह चाहता रहा कि जो हुआ उसका कोई साफ़ कारण मिल जाए।
शायद इसी इंतज़ार ने सबसे ज्यादा थकाया,
क्योंकि हर जवाब तुम्हारे पास था और हर सवाल मेरे पास।
तुमसे बिछड़ने का दुख अपनी जगह है,
लेकिन उससे बड़ा दुख यह था कि मैंने खुद को तुम्हारी मौजूदगी से जोड़ लिया था।
अब धीरे-धीरे समझ रहा हूँ,
किसी के साथ की आदत छूटने के बाद खुद के साथ रहना भी सीखा जा सकता है।
हमारे बीच जो अच्छा था, उसे नकार नहीं सकता,
क्योंकि अंत ने शुरुआत की सच्चाई नहीं बदली।
तुम मेरे जीवन का एक खूबसूरत हिस्सा थे,
बस पूरी कहानी बनना हमारे हिस्से में नहीं था।
कभी तुम्हारी याद किसी खास जगह से नहीं,
किसी बहुत साधारण-सी बात से लौटती है।
फिर कुछ पल मन पुराने दिनों में ठहरता है,
और बिना शिकायत किए वर्तमान में वापस आ जाता है।
मैंने खुद से कई बार पूछा,
क्या मुझे तुम्हें माफ़ करना चाहिए या खुद को?
फिर समझ आया,
हर बिछड़ने के बाद किसी को दोषी ठहराना जरूरी नहीं होता।
तुम्हारे बाद भरोसा करने का तरीका बदल गया,
अब किसी की बात से ज्यादा उसके व्यवहार को देखता हूँ।
दिल अभी भी सच्चा रहना चाहता है,
बस अब उसे अपनी समझ के साथ चलना आता है।
जो बातें तुमसे कहनी थीं,
उनका अब कोई सही समय नहीं बचा।
इसलिए उन्हें अपने भीतर दबाकर नहीं,
बल्कि एक बीते अध्याय की तरह स्वीकार करके रख दिया है।
कभी मन करता है तुम्हें अपनी जिंदगी की खबर दूँ,
फिर सोचता हूँ, मेरी आगे की राह तुम्हारी जानकारी की मोहताज नहीं।
तुम्हारी याद रहे तो रहे,
पर मेरी शांति अब तुम्हारी मौजूदगी पर निर्भर नहीं।
आज भी तुम्हें याद करके मन थोड़ा भर आता है,
पर उस दर्द में पहले जैसी घबराहट नहीं।
शायद ठीक होने का अर्थ भूल जाना नहीं,
बल्कि याद आने के बाद भी अपनी जिंदगी की ओर लौट पाना है।
तुम्हारे जाने के बाद घर वही रहा,
बस कुछ छोटी-छोटी आदतों का मतलब बदल गया।
अब कोई बात बताने से पहले रुक जाता हूँ,
क्योंकि हर खुशी साझा करने के लिए तुम्हारा होना जरूरी नहीं रहा।
मैंने बहुत दिनों तक उस आखिरी बातचीत को दोहराया,
शायद किसी एक वाक्य में बिछड़ने की वजह मिल जाए।
अब समझ आया,
कुछ रिश्ते किसी एक वाक्य से नहीं, धीरे-धीरे अपनी जगह खोते हैं।
तुम्हारी कमी से ज्यादा तुम्हारी आदत सताती थी,
किसी बात पर तुम्हारी राय लेने का मन,
किसी छोटी खुशी पर तुम्हें बताने की इच्छा।
इंसान चला जाए तो चलता है,
पर उसके साथ बनी दिनचर्या देर तक रहती है।
कभी तुम्हारी याद बिल्कुल सामान्य दिन में आती है,
जब कोई ऐसी चीज़ दिखती है जिसे देखकर तुम हँसा करते थे।
कुछ पल मन रुकता है,
फिर जिंदगी अपनी चाल से आगे बढ़ जाती है।
तुम्हें खोने के बाद मैंने खुद को बहुत कसौटियों पर रखा,
हर गलती को रिश्ते के अंत से जोड़ता रहा।
अब इतना समझ पाया हूँ,
कभी दो अच्छे लोग भी एक-दूसरे के लिए सही जगह नहीं बन पाते।
तुमसे अब कोई शिकायत नहीं करनी,
क्योंकि शिकायत में भी किसी उम्मीद का बचा रहना होता है।
अब जो बचा है,
वह बस एक शांत स्वीकार है कि हमारा साथ यहीं तक था।
तुम्हारे साथ बिताया समय मिटाना नहीं चाहता,
उसमें मेरी जिंदगी का एक सच्चा हिस्सा है।
अंत ने शुरुआत को झूठा नहीं किया,
बस यह बता दिया कि हर सच्ची चीज़ हमेशा के लिए नहीं होती।
अब किसी नए रिश्ते की जल्दी नहीं,
पहले उन हिस्सों को फिर से अपना बनाना है जिन्हें तुम्हारे साथ बाँट दिया था।
मैं फिर किसी को चाहूँगा,
पर इस बार खुद को खोकर नहीं।
कभी-कभी मन चाहता है कि तुम पूछो,
मैं अब कैसा हूँ।
फिर सोचता हूँ,
जिस शांति तक पहुँचने में इतना समय लगा, उसे किसी पुराने सवाल के हवाले क्यों करूँ।
तुम मेरी जिंदगी से चले गए,
पर तुम्हारे बाद जो मैं बना, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
दर्द ने मुझे कठोर नहीं बनाया,
बस इतना सिखाया कि प्रेम करते हुए अपने अस्तित्व को भी संभालकर रखना चाहिए।
तुमसे बिछड़ना एक दिन में हुआ,
पर तुम्हारे बिना जीने की आदत बहुत धीरे बनी।
रिश्ता खत्म होने की खबर आसान थी,
मुश्किल तो यह मानना था कि अब हर बात तुम्हें बतानी नहीं।
कुछ यादें आज भी अचानक सामने आ जाती हैं,
जैसे मन ने उन्हें कहीं सुरक्षित रख छोड़ा हो।
मैं उन्हें मिटाता नहीं,
बस अब उनके साथ पूरा दिन बिताता भी नहीं।
तुम्हारे जाने के बाद बहुत बार खुद को दोष दिया,
सोचा शायद थोड़ा और समझता तो सब बच जाता।
फिर समझ आया,
हर रिश्ता केवल कोशिश से नहीं बचता, दोनों का साथ भी जरूरी होता है।
तुमसे जुड़ी चीज़ें अब भी कहीं-कहीं मिल जाती हैं,
पर उनमें पहले जैसी बेचैनी नहीं रहती।
शायद समय ने तुम्हें मुझसे नहीं मिटाया,
बस तुम्हारी याद के साथ जीना थोड़ा सिखा दिया।
कभी मन पूछता है, क्या तुम्हें मेरी याद आती होगी,
फिर खुद ही उस सवाल को वहीं रोक देता हूँ।
हर अनजान जवाब के पीछे भागना छोड़ दिया,
अब अपनी शांति को किसी की प्रतिक्रिया पर निर्भर नहीं करता।
हमने जो अच्छा जिया था,
उसे सिर्फ इसलिए झूठा नहीं कह सकता कि अंत अच्छा नहीं हुआ।
कुछ रिश्ते साथ नहीं रहते,
फिर भी वे हमारे भीतर एक सच्चा अध्याय छोड़ जाते हैं।
तुम्हारे बाद किसी को चाहने से डर नहीं लगता,
डर बस इतना है कि कहीं फिर खुद को पीछे न कर दूँ।
अब प्रेम में दिल भी रखूँगा,
और अपने लिए थोड़ी जगह भी बचाकर रखूँगा।
तुम्हारी कमी कभी-कभी महसूस होती है,
लेकिन अब हर खाली जगह तुम्हारे नाम नहीं करता।
कुछ जगहें खाली रहकर भी ठीक लगती हैं,
क्योंकि उनमें पहली बार खुद से मिलने की जगह बनी है।
कभी तुम्हारी तस्वीर सामने आ जाए,
तो मन पहले जैसा टूटता नहीं।
बस कुछ पल रुकता है,
और फिर याद आता है कि जिंदगी उस तस्वीर से आगे भी चल रही है।
अब तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा नहीं,
न तुम्हारे खिलाफ कोई शिकायत बची है।
बस इतना समझ आया,
कुछ प्रेम हमारे साथ रहने के लिए नहीं, हमें बदलकर जाने के लिए आते हैं।
तुम्हारे बाद सबसे ज्यादा तुम्हारी कमी नहीं,
अपने पुराने स्वभाव की कमी महसूस हुई।
जो हर बात पर भरोसा कर लेता था,
वह अब किसी को करीब आने देने से पहले बहुत कुछ सोचता है।
हम दोनों ने शायद अपनी तरफ से कोशिश की थी,
फिर भी रिश्ता उस जगह नहीं पहुँच सका जहाँ हमने सोचा था।
इसका दुख आज भी है,
पर अब उसे किसी एक की हार मानकर जीना नहीं चाहता।
कभी तुम्हारी कोई पुरानी बात अचानक याद आ जाती है,
और कुछ पल के लिए सब वैसा ही लगता है।
फिर वर्तमान धीरे से याद दिलाता है,
कुछ दरवाज़े यादों में खुलते हैं, जिंदगी में नहीं।
तुम्हारे जाने के बाद समझ आया,
अधूरापन हमेशा दूसरे इंसान के चले जाने से नहीं होता।
कभी हम अपनी दिनचर्या, अपनी आदतें,
और अपने ही कुछ हिस्से किसी रिश्ते के साथ छोड़ आते हैं।
मैंने बहुत दिनों तक सोचा कि कहाँ गलती हुई,
हर छोटी बात को अपने खिलाफ तौलता रहा।
फिर एक दिन समझ आया,
हर टूटे रिश्ते में दोषी ढूँढ़ना जरूरी नहीं, कभी बस दूरी बढ़ जाती है।
तुम्हें भूलने की कोशिश अब नहीं करता,
क्योंकि भूलना और आगे बढ़ना एक बात नहीं।
तुम्हारी याद अपनी जगह है,
और मेरी जिंदगी अब अपनी जगह धीरे-धीरे बन रही है।
कुछ सवाल आज भी अनुत्तरित हैं,
क्यों ऐसा हुआ, कहाँ से सब बदल गया।
शायद हर कहानी को आखिरी जवाब नहीं मिलता,
कभी मन को उत्तर से ज्यादा स्वीकार की जरूरत होती है।
तुमसे प्रेम करना मेरी गलती नहीं थी,
बस उसके बाद खुद को भूलते रहना मेरी भूल होती।
अब किसी को चाहूँगा तो पूरी सच्चाई से,
पर अपने हिस्से का सम्मान अपने पास रखकर।
कभी लगता है तुम्हें सब बता दूँ,
कि तुम्हारे बाद मैंने खुद को कितना बदला।
फिर रुक जाता हूँ,
क्योंकि मेरी आगे की जिंदगी को तुम्हारी समझ की जरूरत नहीं।
आज भी तुम्हारी याद आती है,
पर अब वह मेरे दिन का रास्ता तय नहीं करती।
शायद यही धीरे-धीरे ठीक होने जैसा है,
कि पुराना दर्द मौजूद हो, फिर भी जिंदगी उसके साथ आगे बढ़ती रहे।
तुम्हारे जाने का दुख उतना नहीं था,
जितना यह समझने में लगा कि तुम्हें अपना समझना अब मेरा अधिकार नहीं।
रिश्ता खत्म होने की बात तो एक दिन समझ आ गई,
पर मन को यह समझाने में बहुत वक्त लगा कि अपनापन भी कभी लौटकर नहीं आता।
हमने जो भविष्य सोचा था, वह झूठ नहीं था,
बस उसे साथ जीने का समय हमारे हिस्से में कम निकला।
इसी बात का दुख आज भी है,
कि कुछ सपने टूटे नहीं थे, बस उन्हें जीने वाला साथ छूट गया।
तुम्हारी याद अब पहले जैसी नहीं चुभती,
पर अचानक कोई पुरानी आदत सामने आ जाए तो मन ठहर जाता है।
तब समझ आता है,
इंसान से ज्यादा मुश्किल उन छोटी चीज़ों को छोड़ना होता है जिनमें वह बसता था।
मैंने तुम्हें खोने के बाद खुद से बहुत सवाल किए,
कहाँ कम पड़ा, कहाँ ज्यादा उम्मीद कर ली।
फिर धीरे-धीरे समझ आया,
हर रिश्ते का अंत किसी एक की गलती का प्रमाण नहीं होता।
तुमसे शिकायत आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई,
लेकिन अब उस शिकायत में तुम्हें वापस पाने की इच्छा नहीं।
बस इतना स्वीकार करना बाकी है,
कि जिस जगह कभी तुम्हारा नाम था, वहाँ अब मेरी अपनी पहचान लौट रही है।
कुछ बातें तुमसे कहनी थीं,
पर रिश्ता खत्म होने के बाद वे बातें भी अपना अर्थ खो बैठीं।
अब उन्हें अपने पास ही रखता हूँ,
हर अधूरी बात का जवाब मिलना जरूरी नहीं होता।
कभी तुम्हारी याद बहुत करीब आ जाती है,
फिर मैं खुद को याद दिलाता हूँ कि याद और वापसी एक बात नहीं।
जो बीत गया उसे प्यार से याद किया जा सकता है,
बिना अपनी आज की जिंदगी को फिर उसी मोड़ पर ले जाए।
तुम्हारे बाद भरोसा करना मुश्किल जरूर हुआ,
पर मैंने भरोसा करना छोड़ा नहीं।
बस अब इतना सीखा है,
कि किसी को चाहने से पहले खुद की आवाज़ सुनना भी जरूरी है।
हमारे बीच जो अच्छा था,
उसे मैं बुरा साबित करके खुद को राहत नहीं देना चाहता।
वह रिश्ता खत्म हुआ, यह सच है,
पर उसमें कभी सच्चा प्रेम था, यह भी उतना ही सच है।
अब दर्द रोज़ का मेहमान नहीं,
कभी-कभी बस किसी पुराने मौसम की तरह लौट आता है।
मैं उसे आने देता हूँ,
फिर अपनी जिंदगी की ओर लौट जाता हूँ—थोड़ा बदला हुआ, पर पहले से अधिक अपना।
तुम्हारे जाने के बाद सबसे ज्यादा जो बदला,
वह मेरा अकेलापन नहीं, लोगों पर किया जाने वाला भरोसा था।
अब कोई करीब आता है तो मन पहले पूछता है,
क्या यह रिश्ता भी एक दिन बिना बताए अपना अर्थ खो देगा?
हमने अलग होने का फैसला शायद समझदारी से लिया था,
फिर भी दिल ने उसे सही मानने में बहुत समय लगाया।
कुछ रिश्ते गलत नहीं होते,
बस दो लोगों की मंज़िलें एक जगह तक साथ चल पाती हैं।
तुम्हारी याद अब हर दिन नहीं आती,
लेकिन कुछ साधारण पल आज भी तुम्हारा पता पूछ लेते हैं।
किसी पुराने ढंग की हँसी सुनाई दे,
तो लगता है जैसे बीता हुआ समय थोड़ी देर के लिए सामने आ गया।
तुमसे मिले दुख को मैंने लंबे समय तक अपना दोष समझा,
हर बातचीत को पीछे जाकर दोबारा परखा।
फिर जाना,
किसी रिश्ते को बचाने की पूरी कोशिश करना और उसे बचा न पाना अलग बातें हैं।
कभी मन करता है तुम्हें बता दूँ कि अब मैं ठीक हूँ,
फिर सोचता हूँ, यह खबर तुम्हें देना भी क्यों जरूरी है।
शायद ठीक होना वही दिन है,
जब अपनी खुशी के लिए पुराने रिश्ते की स्वीकृति की जरूरत न रहे।
तुम्हारे साथ बहुत कुछ अधूरा छूटा,
कुछ बातें, कुछ योजनाएँ और कुछ साधारण-से दिन।
पर अब उन अधूरेपन को अपनी कमी नहीं मानता,
हर कहानी का पूरा होना उसके सुंदर होने की शर्त नहीं।
सबसे कठिन था तुम्हें भूलना नहीं,
बल्कि तुम्हारे बिना अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी फिर से पहचानना।
कौन-सी चीज़ मुझे सच में पसंद है,
यह भी कुछ समय बाद जाकर खुद से पूछना पड़ा।
तुम्हें दोष देना आसान होता,
पर उससे बीते हुए समय का अर्थ छोटा हो जाता।
इसलिए जो गलत था उसे गलत ही मानता हूँ,
और जो सच्चा था, उसे बिना लौटे भी सम्मान देता हूँ।
अब किसी नए रिश्ते से डरता नहीं,
बस जल्दी में किसी खाली जगह को किसी इंसान से भरना नहीं चाहता।
पहले खुद के साथ सहज होना है,
ताकि अगली बार प्रेम में खुद को खोना न पड़े।
हमारे बीच अब कुछ नहीं बचा,
सिवाय उन यादों के जिन्हें मैं मिटाना भी नहीं चाहता।
कभी तुम मेरी जिंदगी का जरूरी हिस्सा थे,
और आज मेरी जिंदगी तुम्हारे बिना भी धीरे-धीरे अपनी पूरी कहानी लिख रही है।