जिस दिन परिणाम मेरे खिलाफ आया,
उस दिन अपनी मेहनत पर भी शक होने लगा।
कुछ देर के लिए सब बेकार लगा,
फिर समझ आया कि नतीजा गलत हो सकता है, मेरी नीयत नहीं।
कभी-कभी असफलता सपने से ज्यादा,
अपने भीतर के भरोसे को चोट पहुँचाती है।
उसे फिर से जोड़ने में समय लगा,
पर इस बार मैंने खुद को जल्दी में ठीक करने की कोशिश नहीं की।
बहुत कोशिशों के बाद जब कुछ नहीं बदला,
तो मन ने कहा कि शायद यहीं रुक जाना चाहिए।
मैंने उस आवाज़ को दबाया नहीं,
बस इतना तय किया कि फैसला थकान में नहीं करूँगा।
कुछ लोग मेरी हार देखकर आगे बढ़ गए,
कुछ ने मेरी कोशिश का कारण भी नहीं पूछा।
मैंने किसी से शिकायत नहीं की,
हर व्यक्ति को पूरी कहानी बताना जरूरी नहीं होता।
जिस असफलता से मैं सबसे ज्यादा शर्मिंदा था,
समय बीतने पर वही मेरी सबसे बड़ी सीख बनी।
उसने बताया कि मैं कहाँ कमजोर था,
और यह भी कि कमजोरी पहचान लेना अंत नहीं होता।
कभी लगता था कि सब मुझसे आगे निकल रहे हैं,
और मैं वहीं खड़ा अपने अधूरे काम देख रहा हूँ।
फिर समझ आया,
दूसरों की गति देखकर अपनी कीमत तय करना सबसे बड़ी भूल थी।
एक सपना टूटने के बाद दूसरा सपना देखना आसान नहीं था,
क्योंकि पिछली उम्मीद का दर्द अभी बाकी था।
फिर भी मन ने धीरे से जगह बनाई,
इस बार उम्मीद कम थी, लेकिन समझ पहले से ज्यादा थी।
मैंने असफलता को जीत की कहानी बनाने की जल्दी नहीं की,
कुछ हारें बस हार होती हैं और उन्हें स्वीकारना पड़ता है।
लेकिन स्वीकार करने के बाद भी,
जीवन को वहीं रोक देना जरूरी नहीं होता।
जिस मेहनत का फल नहीं मिला,
उसका दुख आज भी कहीं भीतर मौजूद है।
बस अब मैं उसे अपनी कमी नहीं मानता,
हर कोशिश का परिणाम मिलना हमारे नियंत्रण में नहीं होता।
आज जब पीछे देखता हूँ,
तो उस असफलता पर गर्व नहीं, लेकिन उससे मिली समझ पर है।
मैं पहले जैसा नहीं रहा,
और शायद हर अधूरा प्रयास हमें थोड़ा अधिक सच्चा बना जाता है।
जिस कोशिश पर सबसे ज्यादा भरोसा था,
उसी ने सबसे पहले निराश किया।
कुछ समय तक समझ नहीं आया कि दुख नतीजे का है,
या उन उम्मीदों का जिन्हें मैंने उससे जोड़ दिया था।
हार के बाद कमरे में वही चीज़ें थीं,
वही लोग थे, वही दिनचर्या भी थी।
बस मेरे भीतर कुछ बदल गया था,
अब हर काम शुरू करने से पहले मन परिणाम पूछता था।
कई बार लगा कि शायद मुझसे ही नहीं होगा,
यह विचार सबसे ज्यादा थकाने वाला था।
फिर खुद से इतना ही कहा,
एक असफल प्रयास को अपनी पूरी क्षमता का फैसला मत बनने दो।
दूसरों की सफलता देखकर मैंने मुस्कुराना तो नहीं छोड़ा,
बस लौटकर अपनी खामोशी थोड़ी देर सुनता था।
हर किसी की कहानी अपनी गति से चलती है,
यह बात समझने में मुझे अपनी हार से गुजरना पड़ा।
जिस सपने के लिए बहुत कुछ छोड़ा था,
उसका अधूरा रह जाना आसानी से स्वीकार नहीं हुआ।
कई दिनों तक मन उसी जगह अटका रहा,
फिर जाना कि छोड़ देना और हार मान लेना हमेशा एक जैसा नहीं होता।
मैंने अपनी गलतियों को छिपाया नहीं,
उनके सामने बैठकर यह समझने की कोशिश की कि कहाँ चूका।
हर जवाब सुखद नहीं था,
लेकिन सच जानना खुद को बहलाने से बेहतर लगा।
कुछ असफलताएँ आवाज़ नहीं करतीं,
बस इंसान पहले से थोड़ा कम बोलने लगता है।
मैं भी ऐसा ही हो गया था,
फिर धीरे-धीरे शब्द लौटे और उनके साथ खुद पर भरोसा भी।
कभी लगा कि मेरी सारी मेहनत किसी ने देखी ही नहीं,
फिर सोचा, शायद सबसे पहले मुझे ही उसे देखना चाहिए।
दुनिया परिणाम गिन सकती है,
मैं उन दिनों की गिनती जानता हूँ जब हार के बावजूद काम किया था।
अधूरी कोशिश का दुख इसलिए भी रहता है,
क्योंकि उसमें केवल समय नहीं, अपना एक हिस्सा लगा होता है।
फिर भी मैंने उसे खोया हुआ समय नहीं कहा,
क्योंकि उसी अनुभव ने अगली बार मुझे खुद को बेहतर समझने दिया।
अब असफलता आती है तो चोट लगती है,
मैंने इतना मजबूत होने का दावा कभी नहीं किया।
फर्क बस इतना है कि पहले चोट के साथ खुद को खो देता था,
अब चोट को जगह देता हूँ और फिर अपने लिए खड़ा होता हूँ।
जिस नतीजे के लिए इतने दिनों तक खुद को रोके रखा,
वही नतीजा मेरे पक्ष में नहीं आया।
कुछ देर तक लगा जैसे सारी मेहनत व्यर्थ चली गई,
फिर समझ आया कि व्यर्थ और अधूरा एक बात नहीं होते।
कई बार असफलता से ज्यादा मुश्किल,
अपने भीतर उठते सवालों को शांत करना होता है।
क्या मुझमें कमी थी, क्या मैंने देर कर दी,
या बस इस बार चीज़ें मेरे हिसाब से नहीं हुईं।
दूसरों की उपलब्धियाँ देखकर बुरा नहीं लगता,
बस अपनी अधूरी कोशिश थोड़ी और याद आती है।
वे जहाँ पहुँच गए, उसके लिए उन्हें बधाई है,
मैं बस अपने रुक गए कदमों को फिर से समझ रहा हूँ।
कुछ सपने पूरे होने से पहले ही बदल गए,
कुछ को छोड़ना पड़ा क्योंकि परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं।
हर अधूरा सपना हार नहीं होता,
कभी-कभी इंसान को यह भी चुनना पड़ता है कि अब क्या बचाना है।
मैंने असफलता के बाद खुद को बहुत दोष दिया,
जैसे हर गलती केवल मेरी ही वजह से हुई हो।
फिर जाना,
कोशिश करने वाले इंसान से गलती हो सकती है, उससे उसकी कीमत तय नहीं होती।
जिस दिन सब बिगड़ा,
उस दिन किसी बड़ी सीख की तलाश नहीं थी।
बस मन चाहता था कि कोई इतना कह दे,
तुम्हारी कोशिश कम नहीं थी, बस परिणाम तुम्हारे साथ नहीं था।
कुछ हारें बाहर से छोटी दिखाई देती हैं,
पर उन्हें झेलने वाला जानता है कि भीतर क्या टूटा था।
मैंने भी कई दिनों तक खुद को समेटा,
फिर धीरे-धीरे उसी जगह से जीवन को देखना शुरू किया।
असफल होने के बाद सबसे पहले उम्मीद नहीं लौटती,
पहले अपने ऊपर से नाराज़गी कम होती है।
फिर एक दिन लगता है,
शायद दोबारा कोशिश करने से पहले खुद को माफ़ करना जरूरी था।
मैंने उस हार को मिटाने की कोशिश नहीं की,
क्योंकि अब वह मुझे मेरी सीमाएँ याद दिलाती है।
जहाँ मैं गलत था, वहाँ सुधरना है,
और जहाँ बस परिस्थितियाँ भारी थीं, वहाँ खुद को दोष नहीं देना है।
आज भी कुछ अधूरे सपने याद आते हैं,
तो मन में कसक उठती है, यह सच है।
लेकिन अब उस कसक के साथ एक भरोसा भी है,
कि मेरा बीता हुआ परिणाम मेरे आने वाले निर्णयों की सज़ा नहीं है।
जिस चीज़ के लिए खुद को बहुत दिनों तक तैयार किया था,
वही हाथ आते-आते छूट गई।
दर्द इस बात का नहीं कि मैं हार गया,
दर्द इस बात का था कि इस बार मैंने सच में अपना सब कुछ दिया था।
कभी-कभी मेहनत कम नहीं पड़ती,
बस परिणाम हमारी उम्मीद जितना नहीं होता।
ऐसे समय में खुद को समझाना कठिन लगता है,
कि अधूरा रह जाना हमेशा गलत होना नहीं होता।
दूसरों को आगे बढ़ते देखकर खुशी भी होती है,
बस अपने हिस्से की चुप्पी थोड़ी ज्यादा महसूस होती है।
किसी से शिकायत नहीं,
बस कभी-कभी मन पूछता है कि मेरी बारी इतनी दूर क्यों है।
मैंने अपनी असफलता को कई दिनों तक समझने की कोशिश की,
कहाँ कमी थी, कहाँ जल्दबाज़ी हुई, कहाँ कुछ छूट गया।
हर सवाल का जवाब नहीं मिला,
पर इतना समझ आया कि एक हार से मेरी पूरी कोशिश झूठी नहीं हो जाती।
कुछ सपने टूटे तो लगा जैसे भीतर की आवाज़ भी धीमी हो गई,
कई दिनों तक किसी नई उम्मीद पर भरोसा नहीं हुआ।
फिर धीरे-धीरे खुद से यह कहना सीखा,
जो सपना पूरा नहीं हुआ, वह मेरी क्षमता का पूरा सच भी नहीं था।
सबसे मुश्किल वह पल था,
जब दूसरों ने परिणाम देखा और मुझे असफल कह दिया।
उन्हें केवल आखिरी दिन दिखाई दिया,
मुझे वे सारे दिन याद थे जिनमें मैंने हार मानने से पहले कोशिश की थी।
कभी अपने ही फैसलों पर इतना शक हुआ,
कि आईने में खुद से नज़र मिलाना कठिन लगा।
फिर समझ आया,
गलत निर्णय लेना और गलत इंसान होना एक बात नहीं है।
जिस उम्मीद को बचाने में इतना समय लगाया था,
वही एक नतीजे के साथ टूटती हुई लगी।
लेकिन कुछ समय बाद जाना,
उम्मीद का खत्म होना और उसका रूप बदल जाना अलग बातें हैं।
मैं अपनी हार को छिपा सकता था,
पर उससे मिलने वाली सीख कहाँ छिपाता।
इसलिए उसे स्वीकार किया,
बिना खुद को दोषी ठहराए और बिना उसे अपनी पहचान बनाए।
आज भी उस असफलता की याद आती है,
तो खुशी नहीं होती, दर्द अब भी कहीं बाकी है।
बस फर्क इतना है,
अब मैं उस दर्द को अपने खिलाफ इस्तेमाल नहीं करता।