Gulzar Zindagi Shayari
सुबह की चाय अक्सर ठंडी हो जाती है, ज़िंदगी भी कई बार सोचते-सोचते निकल जाती है।
पुरानी छत पर अब कम लोग जाते हैं, मगर हवा आज भी वही पुरानी बातें करती है।
धूप खिड़की से रोज़ अंदर आती है, बस उसे देखने की फ़ुर्सत हर दिन नहीं होती।
कभी-कभी मेज़ पर रखा एक ख़ाली कप, पूरी बातचीत की कमी बता देता है।
पुराने घरों की दीवारें अजीब होती हैं, रंग बदल लेती हैं, यादें नहीं।
शाम को लौटते परिंदों को देखकर लगा, हर किसी के पास लौटने की कोई जगह होनी चाहिए।
बरसों पुराने रास्ते पर चला तो महसूस हुआ, कदम आगे बढ़ जाते हैं, कुछ एहसास नहीं।
पेड़ के नीचे पड़ी छाँव चुपचाप सरकती रही, वक़्त शायद ऐसे ही अपना सफ़र तय करता है।
एक टूटी हुई पेंसिल दराज़ में मिली, कुछ अधूरे ख़्वाब भी शायद वहीं कहीं रखे थे।
खिड़की पर रखा पौधा धीरे-धीरे बड़ा हो गया, घर के लोग उसकी तरह नज़र नहीं आए।
किताब के बीच दबा टिकट मिला, कुछ सफ़र मंज़िल से नहीं, यादों से पहचाने जाते हैं।
कमरे की ख़ामोशी में घड़ी की आवाज़ साफ़ सुनाई दी, कुछ बातें भीड़ में नहीं समझ आतीं।
पुरानी रज़ाई से अब भी वही ख़ुशबू आती है, जैसे सर्दियाँ कहीं संभाल कर रखी हों।
रात की आख़िरी बत्ती बुझाते हुए लगा, दिन भर की थकान भी उजाले के साथ चली गई।
बारिश के बाद आँगन में पानी ठहरा रहा, कुछ लम्हे भी दिल में ऐसे ही ठहर जाते हैं।
बचपन की गली अब छोटी लगती है, शायद क़दम नहीं, फ़िक्रें बड़ी हो गई हैं।
एक चिड़िया रोज़ आकर मुंडेर पर बैठती है, कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते।
धूल जमी थी आईने पर, चेहरा नहीं, नज़र साफ़ करने की ज़रूरत थी।
पुराना स्वेटर अब कम पहना जाता है, मगर उससे जुड़ी गर्माहट अभी तक नई है।
सूरज ढला तो पेड़ों की परछाइयाँ लंबी हो गईं, उम्र भी शायद ऐसे ही अपनी मौजूदगी दिखाती है।
रास्ते में पड़ा पत्थर वही था, बस इस बार ठोकर की जगह मुस्कान दे गया।
दराज़ में रखी चिट्ठियाँ पीली पड़ गईं, कुछ बातें वक़्त से पुरानी नहीं होतीं।
दोपहर की धूप में सूखते कपड़े हिल रहे थे, जैसे हवा उनसे दिनभर की बातें कर रही हो।
कभी-कभी एक साधारण दिन भी, सालों बाद सबसे ख़ास याद बन जाता है।
ज़िंदगी शायद किसी बड़ी तलाश का नाम नहीं, बल्कि गुज़रते हुए पलों को पहचान लेने का हुनर है।
बरामदे में रखी पुरानी कुर्सी आज भी वहीं है, बस उस पर बैठकर शाम देखने वाले बदल गए हैं।
दीवार की घड़ी हर रोज़ वही वक़्त बताती है, फिर भी घर का समय हर साल थोड़ा बदल जाता है।
खिड़की पर रखी धूप शाम तक फीकी पड़ गई, शायद दिन भी ऐसे ही उम्र ओढ़ लेते हैं।
कुछ यादें अलमारी में रखे कपड़ों जैसी होती हैं, बरसों बाद भी उनकी तह में कोई मौसम बचा रहता है।
आँगन में गिरा पत्ता देर तक वहीं पड़ा रहा, जैसे उसे भी शाख़ से बिछड़ने का यक़ीन न आया हो।
ज़िंदगी कभी-कभी चाय की आख़िरी घूँट जैसी लगती है, कम होती जाती है, मगर स्वाद गहरा छोड़ जाती है।
पुरानी किताब से एक सूखा फूल मिला, कुछ रिश्ते शायद ऐसे ही पन्नों के बीच महफ़ूज़ रहते हैं।
छत पर टँगा बल्ब हर रात जलता है, मगर कुछ उजाले सिर्फ़ लोगों के साथ आते थे।
बारिश रुक गई थी काफ़ी देर पहले, मगर मिट्टी अभी तक भीगी हुई थी।
कितनी अजीब बात है, घर वही रहता है, लौटने वाले बदल जाते हैं।
दरवाज़े की कुंडी अब कम ही बजती है, मगर इंतज़ार ने अभी तक घर नहीं छोड़ा।
पुराने रास्ते आज भी कहीं नहीं गए, बस हमारे क़दम दूसरी तरफ़ मुड़ गए हैं।
रसोई से आती खुशबू ने अचानक रोक लिया, कुछ यादें नाम लेकर नहीं बुलातीं।
दोपहर की ख़ामोशी में कभी-कभी लगता है, जैसे वक़्त भी थोड़ी देर आराम करना चाहता हो।
पेड़ हर साल नए पत्ते उगा लेता है, इंसान को अपनी बहारें लौटाने में थोड़ा वक़्त लगता है।
एक पुराना गीत दूर कहीं बज रहा था, और पूरा बचपन बिना बताए कमरे में आ बैठा।
काँच पर जमी धूल पोंछी तो बाहर का मंज़र साफ़ हुआ, कुछ धुंध शायद आँखों में थी।
शाम रोज़ ढलती है, फिर भी हर शाम का रंग थोड़ा अलग होता है।
पुरानी चाबियाँ अब किसी ताले में नहीं लगतीं, मगर उन्हें फेंकने का मन भी नहीं करता।
वक़्त ने कभी आवाज़ ऊँची नहीं की, फिर भी उसकी हर बात माननी पड़ी।
कुछ लोग बिछड़ते नहीं, बस बातचीत से निकलकर आदतों में बस जाते हैं।
सूखते हुए पौधे में एक नई कोंपल निकली, ज़िंदगी उम्मीद लिखने का तरीका जानती है।
कमरे में रखी ख़ाली फ़्रेम मुस्कुरा रही थी, शायद हर तस्वीर दीवार पर नहीं लगती।
रात की मेज़ पर खुली हुई डायरी पड़ी थी, कुछ बातें लिखी नहीं गईं, फिर भी पढ़ी जा सकती थीं।
ज़िंदगी शायद बड़ी घटनाओं में कम, और इन छोटी-छोटी बची हुई चीज़ों में ज़्यादा रहती है।