कुछ दिनों से मन अपने ही भीतर बहुत धीमे चलता है,
लोग वही हैं, बातें वही हैं, बस उन्हें महसूस करने का ढंग बदल गया है।
किसी से कोई शिकायत नहीं,
फिर भी भीतर एक ऐसी कमी है जिसका नाम लेना आसान नहीं।
कभी कोई पुरानी बात अचानक याद आ जाती है,
और समझ नहीं आता कि वह बात आज भी इतनी करीब क्यों है।
शायद समय ने घटना को पीछे कर दिया,
पर उससे जुड़ा एहसास अब भी अपने हिस्से की जगह माँगता है।
मैंने अपने दुख को किसी से छीनकर नहीं रखा,
बस उसे शब्दों में बाँटना कभी सीख नहीं पाया।
इसलिए कई बार खामोश बैठा रहता हूँ,
जैसे मन खुद ही अपने सवाल पूछकर खुद ही जवाब तलाश रहा हो।
कुछ लोग चले जाते हैं,
पर उनके साथ बिताया समय हमारी आदतों में रह जाता है।
किसी खुशी पर वही पहला ख्याल आना,
फिर खुद को याद दिलाना कि अब उसे बताने वाला कोई और नहीं।
कभी-कभी अपनी ही मुस्कान अजनबी लगती है,
जब याद आता है कि यह सहजता कब कम हो गई।
जिंदगी चलती रही,
पर चलते-चलते मन ने कुछ भाव रास्ते में ही छोड़ दिए।
दर्द का एक हिस्सा यह भी है,
कि हम हर बार किसी को दोष देकर अपने मन को आसान जवाब नहीं दे सकते।
कुछ रिश्ते बस उस मोड़ तक साथ होते हैं,
जहाँ दोनों की राहें बिना किसी गलत इंसान के अलग हो जाती हैं।
अब बीती बातों को बदलने की कोशिश नहीं करता,
न खुद से हर दिन हिसाब माँगता हूँ।
जो हुआ, उसने दुख दिया,
पर उसी दुख ने मुझे अपने भीतर की आवाज़ सुनना भी सिखाया।
कभी किसी की जरूरत महसूस होती है,
तो उसे कमजोरी नहीं मानता।
इंसान को साथ की चाह हो सकती है,
और फिर भी वह अपने पैरों पर खड़ा रह सकता है।
कुछ खालीपन समय के साथ खत्म नहीं होते,
बस उनके साथ रहने की आदत हो जाती है।
पहले जो जगह दर्द देती थी,
अब वहीं बैठकर खुद को थोड़ा बेहतर समझ पाता हूँ।
आज भी मन कभी उदास होता है,
लेकिन उस उदासी से डर नहीं लगता।
शायद ठीक होने का अर्थ हर दुख को मिटा देना नहीं,
बल्कि उसके बीच भी अपने लिए थोड़ी शांति बचाए रखना है।
कभी-कभी मन बिना किसी साफ़ वजह के उदास हो जाता है,
जैसे भीतर कोई पुरानी बात चुपचाप अपनी जगह ढूँढ़ रही हो।
हम उसे नाम नहीं दे पाते,
बस दिन थोड़ा भारी और खुद से बातचीत थोड़ी कम हो जाती है।
कुछ कमी ऐसी होती है,
जिसका पता तब चलता है जब किसी खुशी को बाँटने का मन हो।
उसी पल समझ आता है,
कुछ लोग जिंदगी से जाने के बाद भी हमारी आदतों में रह जाते हैं।
मैंने कई बार खुद को समझाया कि अब सब बीत गया,
फिर किसी मामूली बात ने पुराना एहसास लौटा दिया।
शायद मन समय को घड़ी की तरह नहीं मापता,
कुछ यादों के लिए कल और आज के बीच बहुत कम दूरी होती है।
सबके साथ ठीक से पेश आता रहा,
क्योंकि अपने भीतर की उलझन किसी और पर रखना नहीं चाहता था।
लेकिन हर बार मजबूत बने रहना भी आसान नहीं,
कभी इंसान को बस इतना चाहिए होता है कि वह कुछ देर बिना समझाए चुप रह सके।
कुछ बातें आज भी मन में वैसी ही रखी हैं,
न उन्हें किसी से कहना है, न पूरी तरह भूलना।
वे मेरे बीते समय का हिस्सा हैं,
और हर बीती चीज़ को मिटा देना ही आगे बढ़ना नहीं होता।
कभी अपने पुराने रूप की याद आती है,
जो छोटी-छोटी बातों पर सहजता से खुश हो जाता था।
जिंदगी ने बहुत कुछ सिखाया,
पर उसी सीख के बीच अपनी वह सहजता कहीं छूट गई, इसका दुख भी है।
दर्द हमेशा किसी के जाने से नहीं होता,
कभी अपने भीतर बदलते हुए इंसान को देखकर भी मन भर आता है।
जो पहले आसानी से कह देते थे,
अब वही बातें मन में कई बार सोचकर भी कह नहीं पाते।
कुछ दिनों में सब अच्छा लगता है,
और कुछ दिनों में वही जिंदगी थोड़ी दूर खड़ी दिखाई देती है।
अब इन दोनों अवस्थाओं से लड़ता नहीं,
मन जैसा है, उसे वैसा महसूस करने की थोड़ी मोहलत देता हूँ।
कभी किसी पुराने पल की याद अचानक लौटती है,
और कुछ देर के लिए वर्तमान से ज्यादा सच्ची लगने लगती है।
फिर धीरे से समझ आता है,
याद का खूबसूरत होना यह साबित नहीं करता कि हमें वहीं लौटना है।
मैंने अपने भीतर के खालीपन को जल्दी भरने की कोशिश छोड़ दी है,
क्योंकि हर खाली जगह किसी दूसरे इंसान की नहीं होती।
कुछ जगहों पर खुद को फिर से समझना पड़ता है,
तभी पता चलता है कि अकेलापन हमेशा अंत नहीं, कभी आत्ममंथन की शुरुआत भी होता है।
आज भी उदासी मेरे भीतर आती है,
पर अब मैं उसे अपनी पूरी पहचान नहीं बनने देता।
जो महसूस होता है, उसे महसूस करता हूँ,
फिर धीरे-धीरे उसी जीवन की ओर लौटता हूँ जिसे अभी भी मेरे साथ चलना है।
कुछ उदासियाँ किसी एक वजह से नहीं होतीं,
वे कई छोटी-छोटी बातों के धीरे-धीरे जमा होने से बनती हैं।
फिर कोई मामूली-सा क्षण उन्हें छू देता है,
और मन बिना शिकायत किए कुछ देर के लिए भारी हो जाता है।
दिनभर सब कुछ सामान्य दिखता है,
पर भीतर कई पुराने संवाद अब भी अधूरे पड़े हैं।
कभी लगता है उन्हें पूरा कर दूँ,
फिर समझ आता है कि कुछ बातें समय के साथ जवाब नहीं, स्वीकार माँगती हैं।
किसी अपने की कमी तब ज्यादा महसूस होती है,
जब कोई अच्छी बात बताने को मन अचानक उसकी ओर मुड़ता है।
फिर याद आता है कि अब वह सहजता नहीं रही,
और खुशी के बीच भी एक छोटा-सा खालीपन जगह बना लेता है।
मैंने बहुत दिनों तक अपने दर्द को व्यस्तता में छिपाए रखा,
हर खाली समय से बचता रहा।
फिर एक दिन समझ आया,
जिस भावना से भागते हैं, वह रास्ते में नहीं, भीतर ही हमारा इंतज़ार करती रहती है।
कुछ यादें दुख देती हैं,
फिर भी उन्हें मिटाने का मन नहीं करता।
क्योंकि उनमें केवल खोया हुआ नहीं,
हमारा वह रूप भी रहता है जो कभी बहुत सच्चाई से खुश हुआ था।
लोगों के बीच रहते हुए भी कभी-कभी मन अपने भीतर सिमट जाता है,
किसी से बात करने की इच्छा होती है, पर शब्द नहीं मिलते।
ऐसे समय में अकेलापन लोगों की कमी नहीं,
समझे जाने की जरूरत बन जाता है।
कभी खुद से पूछता हूँ कि इतना कुछ सहकर बदला क्या,
फिर देखता हूँ कि अब छोटी बातों पर खुद को दोष नहीं देता।
दर्द पूरी तरह गया नहीं,
लेकिन उसने मुझे अपने प्रति थोड़ा नरम जरूर बना दिया है।
कुछ रिश्ते चले जाते हैं,
पर उनसे जुड़ी आवाज़ें मन में बहुत देर तक रहती हैं।
उन्हें मिटाने की कोशिश अब नहीं करता,
बस यह सीख रहा हूँ कि स्मृति और वर्तमान को एक ही जगह नहीं रखना चाहिए।
आज भी कभी अचानक मन भर आता है,
पर अब उस एहसास से घबराहट नहीं होती।
मैं उसे पहचानता हूँ,
थोड़ी देर महसूस करता हूँ और फिर अपनी जिंदगी की ओर लौट आता हूँ।
शायद हर दर्द का अंत खुश होकर नहीं होता,
कुछ दर्द बस हमारे भीतर शांत होना सीखते हैं।
और शायद यही पर्याप्त है,
कि जो कभी हमें तोड़ता था, वह धीरे-धीरे हमें समझने की वजह बन जाए।
कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें किसी घटना का नाम नहीं दिया जा सकता,
बस इतना पता होता है कि पहले जैसा महसूस करना अब आसान नहीं रहा।
सब कुछ अपनी जगह चलता रहता है,
और भीतर कोई हिस्सा चुपचाप बीते हुए समय में बैठा रहता है।
दिनभर सामान्य रहने की आदत पड़ गई है,
पर कुछ सवाल अब भी भीतर वैसे ही रखे हैं।
किसी से शिकायत नहीं,
बस कभी-कभी मन चाहता है कि कोई बिना पूछे समझ ले कि आज चुप रहने की वजह क्या है।
किसी अपने की कमी हमेशा खाली कमरे में नहीं दिखती,
कभी वह किसी अच्छी खबर के समय महसूस होती है।
जिसे सबसे पहले बताने की आदत थी,
आज वही खबर अपने तक रखनी पड़ती है।
मैंने कई यादों को बहुत समझदारी से संभाला,
फिर भी कुछ यादें अचानक मन को कमजोर कर देती हैं।
शायद कमजोरी नहीं,
शायद यह उन चीज़ों की कीमत है जिन्हें हमने कभी सच्चा समझकर जिया था।
कभी-कभी मन किसी पुराने दिन में लौटना चाहता है,
वहाँ जहाँ सब कुछ अभी बिगड़ा नहीं था।
फिर खुद को वर्तमान में ले आता हूँ,
क्योंकि यादों में आराम मिल सकता है, जीवन वहीं रहकर नहीं जिया जा सकता।
लोगों ने मेरी चुप्पी को शांति समझा,
मैंने भी उसे यही नाम दे दिया।
पर सच यह था,
कुछ बातें इतनी भीतर चली गई थीं कि उन्हें बाहर लाने के लिए शब्द कम पड़ रहे थे।
दर्द का सबसे थका देने वाला हिस्सा,
उसका होना नहीं बल्कि उसे सामान्य दिखाने की कोशिश है।
हर दिन खुद को संभालते-संभालते,
कभी मन चाहता है कि एक दिन कुछ भी संभालना न पड़े।
अब अपने दुख से लड़ता नहीं,
उसे हर बार किसी निष्कर्ष तक पहुँचाना भी जरूरी नहीं लगता।
कुछ भावों को बस रहने देना पड़ता है,
ताकि वे धीरे-धीरे अपनी तीव्रता खो सकें।
जो खो गया, उसकी जगह कोई और आए,
यह जरूरी नहीं।
कभी-कभी मन खाली जगह के साथ ही सहज होना सीखता है,
और उसी जगह से अपनी नई शांति की शुरुआत करता है।
आज भी भीतर थोड़ी उदासी है,
पर उसके साथ खुद को समझने की क्षमता भी बढ़ी है।
शायद ठीक होना यही है,
कि दर्द मौजूद रहे, फिर भी वह हमारी पूरी जिंदगी तय न करे।
दिनभर सबके बीच रहा,
फिर भी शाम होते ही अपने भीतर लौटना भारी लगा।
शायद भीड़ से नहीं,
उन बातों से थक गया था जिन्हें हर बार खुद से ही छिपाना पड़ा।
कुछ लोगों की कमी उनकी गैरमौजूदगी से नहीं,
उनसे जुड़ी छोटी आदतों के अचानक रुक जाने से महसूस होती है।
कोई बात होती है और हाथ अपने आप उसी ओर बढ़ता है,
फिर याद आता है कि अब वह जगह खाली है।
मैंने अपने दुख को कभी बहुत बड़ा नाम नहीं दिया,
बस उसे रोज़ की तरह साथ लेकर चलता रहा।
लेकिन कभी-कभी कोई साधारण-सी बात उसे छू जाती है,
और पता चलता है कि जिसे बीत चुका समझा था, वह भीतर अब भी मौजूद है।
सब पूछते रहे, “कैसे हो?”
मैंने हर बार मुस्कुराकर कहा, “ठीक हूँ।”
किसी ने यह नहीं पूछा कि ठीक रहने की कोशिश में
मैंने अपने भीतर कितनी बातें चुप कर दी हैं।
कुछ रिश्ते खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं लगते,
उनकी बातचीत बंद होती है, पर असर नहीं।
कभी कोई पुरानी बात याद आती है,
और मन कुछ पल के लिए उसी व्यक्ति के पास चला जाता है जिससे लौटना अब संभव नहीं।
सबसे अजीब दर्द वह है,
जिसे किसी एक घटना से जोड़कर समझाया नहीं जा सकता।
बस धीरे-धीरे मन में जगह बनती रहती है,
और एक दिन महसूस होता है कि हम पहले जैसे सहज नहीं रहे।
कभी अपने ही फैसलों पर संदेह होने लगता है,
क्या सच में सब कुछ अलग तरह से हो सकता था?
फिर मन थककर चुप हो जाता है,
क्योंकि बीते हुए समय को बदलने से ज्यादा जरूरी उसके साथ जीना सीखना है।
आज भी कुछ बातें कहने का मन करता है,
लेकिन हर बात के लिए सही इंसान और सही समय नहीं मिलता।
इसलिए शब्द भीतर ही रह जाते हैं,
और मन उन्हें समझते-समझते थोड़ा और शांत होना सीखता है।
दर्द हमेशा शोर नहीं करता,
कभी वह बस इतना करता है कि जिन चीज़ों से पहले खुशी मिलती थी,
उनके सामने मन कुछ पल रुक जाता है,
जैसे खुशी तक पहुँचने के रास्ते में कोई पुरानी याद खड़ी हो।
मैंने अपने भीतर के इस खालीपन को भरने की जल्दी छोड़ दी है,
हर कमी का कोई विकल्प होना जरूरी नहीं।
कुछ जगहें समय के साथ खाली ही रहती हैं,
पर उनके साथ जीना सीखते-सीखते इंसान खुद के थोड़ा और करीब आ जाता है।