तुम्हारी अनदेखी पहले सवाल बनकर चुभती थी,
अब वह बस तुम्हारे बदलते व्यवहार की एक सच्चाई है।
मैंने बहुत देर तक वजहें ढूँढ़ीं,
फिर समझ आया कि हर दूरी का कारण जानना जरूरी नहीं।
मैंने अपनी बात तुम्हें कई बार समझाई,
पर जब सुनने की इच्छा ही न हो तो शब्द थक जाते हैं।
उस दिन से शिकायत कम हो गई,
जिस दिन मैंने अपनी चुप्पी को भी महत्व देना सीख लिया।
तुम्हारे पास मेरे लिए समय नहीं था,
और मेरे पास तुम्हारे इंतज़ार में खुद को खोने का वक्त नहीं बचा।
इसलिए मैंने कदम पीछे कर लिए,
किसी को सज़ा देने के लिए नहीं, खुद को बचाने के लिए।
कभी तुम्हारे एक जवाब से दिन अच्छा हो जाता था,
फिर वही जवाब मिलने की उम्मीद दिन भारी करने लगी।
तब जाना,
जिस रिश्ते में खुशी किसी के ध्यान पर टिकी हो, वहाँ खुद को संभालना भी जरूरी है।
तुमने मेरी परवाह को शायद कभी उस तरह नहीं देखा,
जिस तरह मैंने तुम्हारे छोटे-छोटे बदलाव महसूस किए थे।
अब न तुम्हें समझाने की इच्छा है,
न अपनी भावनाओं का प्रमाण देने की।
मैंने तुम्हारी बेरुखी को अपना दोष मान लिया था,
हर दूरी में खुद की कोई कमी खोजता रहा।
फिर एक दिन समझ आया,
किसी का मुझे कम महत्व देना मेरी कीमत कम नहीं करता।
अब तुम्हारी खामोशी सुनकर मन बेचैन नहीं होता,
क्योंकि मैंने उसके पीछे अर्थ तलाशना छोड़ दिया है।
कुछ लोग जवाब नहीं देते,
और कभी-कभी वही उनका सबसे स्पष्ट उत्तर होता है।
पहले डरता था कि कहीं तुम मुझसे दूर न हो जाओ,
अब डर इस बात का है कि कहीं खुद से दूर न हो जाऊँ।
इसीलिए तुम्हारी ओर बढ़ने से पहले,
अब अपने मन की आवाज़ सुनता हूँ।
तुम्हें मनाने की कोशिश में मैंने बहुत कुछ अनदेखा किया,
सबसे ज्यादा अपनी थकान।
अब अगर मैं शांत हूँ,
तो इसका मतलब यह नहीं कि दर्द नहीं हुआ, बस अब मैं उसे बढ़ाता नहीं।
तुम्हारी उपेक्षा ने रिश्ता तो नहीं समझाया,
पर मुझे अपनी सीमाएँ जरूर समझा दीं।
अब जहाँ अपनापन सहज मिले,
वहीं रहना चाहता हूँ—बिना अपनी अहमियत माँगे।
तुम्हारी बेरुखी को मैंने बहुत देर तक गलतफहमी समझा,
हर बार लगा, शायद आज बात पहले जैसी हो जाएगी।
फिर तुम्हारे व्यवहार ने धीरे से सच बता दिया,
कुछ दूरियाँ पूछकर नहीं, महसूस करके समझनी पड़ती हैं।
मैंने अपनी बात रखने की कोशिश कई बार की,
पर हर बार लगा जैसे शब्द तुम्हारे पास पहुँचकर लौट आते हैं।
एक समय बाद मन ने कहना छोड़ दिया,
क्योंकि लगातार अनसुना होना भी एक तरह का उत्तर होता है।
तुम्हारी अनदेखी ने मुझे यह नहीं सिखाया कि सब बदल जाते हैं,
बस इतना सिखाया कि हर रिश्ते में खुद को खोना जरूरी नहीं।
जहाँ मेरी भावनाओं के लिए जगह कम पड़ने लगे,
वहाँ अपनी जगह बचा लेना भी जरूरी है।
पहले तुम्हारी चुप्पी में अपना दोष ढूँढ़ता था,
अब तुम्हारी चुप्पी को तुम्हारा चुनाव समझता हूँ।
हर व्यवहार की वजह जानना जरूरी नहीं,
कुछ सच्चाइयाँ स्वीकार करने के बाद मन शांत हो जाता है।
मैंने तुम्हें मनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी,
पर खुद को मनाते-मनाते बहुत थक गया।
अब तुम्हारी तरफ कदम बढ़ाने से पहले,
अपने भीतर की थकान को सुनना सीख गया हूँ।
तुमने मुझे अनदेखा किया,
और मैंने धीरे-धीरे अपनी उम्मीदों को देखना शुरू किया।
पता चला, चोट तुम्हारे दूर होने से कम थी,
जितनी इस बात से कि मैं अपनी खुशी तुम्हारे ध्यान से जोड़ बैठा था।
अब तुम्हारे बदलते व्यवहार पर सवाल नहीं करता,
न हर खामोशी के पीछे कोई कहानी खोजता हूँ।
जिसे जितना अपनापन देना था, दे चुका,
अब अपनी शांति को बार-बार उसी जगह नहीं ले जाता।
तुम्हें मेरी परवाह है या नहीं,
यह जानने की इच्छा कभी बहुत गहरी थी।
अब बस इतना जानना काफी है,
कि मुझे अपनी भावनाओं की परवाह करनी चाहिए।
मैंने दूरी तुम्हें सबक सिखाने के लिए नहीं चुनी,
न तुम्हें अपनी कमी महसूस कराने के लिए।
बस उस जगह से हट आया,
जहाँ बने रहने के लिए मुझे खुद को बार-बार छोटा करना पड़ता था।
तुम्हारी उपेक्षा आज भी कभी-कभी याद आती है,
पर अब उसके साथ खुद पर शक नहीं आता।
मैं वही हूँ जिसने सच्चे मन से रिश्ता निभाया था,
बस अब इतना जानता हूँ कि सच्चाई के साथ आत्मसम्मान भी जरूरी है।
तुम्हारी उपेक्षा ने दुख तो दिया,
पर उससे भी ज्यादा थका दिया तुम्हें समझाने की कोशिश ने।
एक समय तक मैं तुम्हारे व्यवहार में कारण खोजता रहा,
फिर समझ आया कि हर सवाल का जवाब पूछना जरूरी नहीं होता।
मैंने अपनी मौजूदगी को हल्का होते देखा,
फिर भी कुछ समय तक वहीं रुका रहा।
शायद अपनापन हमें बहुत देर तक रोकता है,
जब तक आत्मसम्मान धीरे से यह न कह दे कि अब लौट चलो।
तुम्हारी चुप्पी पहले बेचैन करती थी,
अब वह बस एक दूरी का हिस्सा लगती है।
मैंने उम्मीद कम नहीं की,
बस अपनी शांति को उम्मीद से बड़ा कर लिया।
किसी के पास समय न होना समझ आता है,
पर बार-बार तुम्हें याद दिलाना कि मैं भी इस रिश्ते का हिस्सा हूँ,
वह बात भीतर कहीं चोट करती थी।
इसलिए अब पीछे हटना शिकायत नहीं,
अपने मन को अनावश्यक चोट से बचाना है।
मैंने तुम्हें कभी अपनी परवाह का हिसाब नहीं दिया,
फिर तुम्हारी तरफ से भी कोई हिसाब माँगना ठीक नहीं समझा।
रिश्ते में अपनापन स्वाभाविक होना चाहिए,
उसे बार-बार साबित करना पड़े तो शायद कुछ बदल चुका है।
तुम्हारी अनदेखी से एक बात साफ़ हुई,
मैं जितना तुम्हारे व्यवहार को समझने में लगा था,
उतना ही खुद को समझने से दूर होता जा रहा था।
अब थोड़ा समय अपनी आवाज़ के लिए भी रखता हूँ।
पहले लगता था, एक दिन तुम खुद समझोगे,
अब उस दिन की प्रतीक्षा नहीं।
जो महसूस किया, वह सच्चा था,
और सच्ची भावना को किसी की स्वीकृति की जरूरत नहीं होती।
तुम्हें मेरी कमी महसूस हो या न हो,
अब यह सवाल मेरी रातों का हिस्सा नहीं।
किसी के जीवन में अपनी जगह जानने से ज्यादा जरूरी,
अपने जीवन में अपनी जगह बचाए रखना है।
मैं नाराज़ होकर दूर नहीं हुआ,
बस बार-बार अनदेखा होने के बाद शांत हो गया।
कुछ दूरियाँ गुस्से से नहीं बनतीं,
वे तब बनती हैं जब मन थककर अपनी उम्मीदें समेट लेता है।
अब भी तुम्हारे लिए मन में बुरा कुछ नहीं,
बस पहले जैसा अधिकार भी नहीं।
तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी है,
और मेरी भावनाओं की देखभाल अब मेरी जिम्मेदारी है।
कभी तुम्हारी उपेक्षा मेरी कमी लगती थी,
आज वही अनुभव मुझे अपनी कीमत याद दिलाता है।
जिस रिश्ते में खुद को साबित करते-करते थक जाओ,
वहाँ थोड़ा पीछे हटना हार नहीं, आत्मसम्मान होता है।
तुम्हारी खामोशी को समझने में वक्त लगा,
क्योंकि मैं हर बार उसमें कोई वजह ढूँढ़ता रहा।
फिर समझ आया,
जिसे बात करनी होती है, उसे बहानों की जरूरत नहीं पड़ती।
शुरुआत में तुम्हारे दूर होने से दुख हुआ,
फिर अपने ही प्रयासों पर थकान होने लगी।
रिश्ता बचाने की कोशिश अच्छी थी,
पर खुद को लगातार मनाना मेरी जिम्मेदारी नहीं थी।
मैंने कई बार सोचा, शायद मुझसे कोई गलती हुई होगी,
इसीलिए तुम मेरी बातों को इतना हल्का लेने लगे।
फिर जाना,
हर दूरी हमारी कमी से पैदा नहीं होती, कभी सामने वाले की प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं।
तुम्हें मेरी परवाह है या नहीं,
इस सवाल ने मुझसे बहुत समय लिया।
अब सवाल बदल गया है—
क्या मैं ऐसी जगह रहना चाहता हूँ जहाँ अपनी अहमियत महसूस करने के लिए मुझे पूछना पड़े?
तुम्हारे जवाब का इंतज़ार करते-करते,
मैंने अपने ही मन की आवाज़ सुनना शुरू किया।
वह कहती थी,
जहाँ प्रयास बार-बार एक तरफ से हो, वहाँ थोड़ा ठहर जाना जरूरी है।
मैंने तुम्हें दोष देकर खुद को हल्का नहीं किया,
बस तुम्हारे व्यवहार को समझकर अपनी अपेक्षाएँ बदल लीं।
कभी-कभी रिश्ता खत्म नहीं होता,
बस उसमें हमारी उम्मीदों की जगह खत्म हो जाती है।
अब तुम्हारी बेरुखी देखकर गुस्सा नहीं आता,
बस भीतर एक शांत दूरी बन जाती है।
शायद यही वह पल है,
जब मन किसी को मनाने से ज्यादा खुद को संभालना सीखता है।
तुम्हारी अनदेखी ने मुझे छोटा नहीं किया,
उसने बस यह दिखाया कि मेरी भावनाओं की जगह कहाँ तक थी।
अब मैं किसी के दिल में अपनी जगह माँगने के बजाय,
जहाँ अपनापन मिले, वहीं सहज रहना पसंद करता हूँ।
कभी मैं सोचता था, एक दिन तुम मेरी कोशिश समझोगे,
अब उस समझ की प्रतीक्षा भी नहीं रही।
मेरी नीयत सच्ची थी,
इतना जानना मेरे लिए अब काफी है।
तुम्हारे बदलते व्यवहार के पीछे कारण जो भी हो,
हर कारण जानना मेरे लिए जरूरी नहीं।
कुछ जवाब सामने वाले से नहीं मिलते,
वे तब मिलते हैं जब हम खुद से सही सवाल पूछना शुरू करते हैं।
अब तुम्हें अनदेखा करने की बात नहीं,
बस अपनी भावनाओं को हर बार वहीं ले जाना बंद किया है।
दूरी तुम्हें सज़ा देने के लिए नहीं,
खुद को फिर से सुनने के लिए रखी है।
तुम्हारी बेरुखी ने मुझे सबसे ज्यादा यह सिखाया,
हर रिश्ते को बचाने की जिम्मेदारी अकेले मेरी नहीं।
मैंने अपनी तरफ से बहुत दरवाज़े खुले रखे,
अब अपनी इज़्ज़त के लिए कुछ रास्ते बंद करना सीख रहा हूँ।
जब मेरी बात तुम्हारे लिए जरूरी नहीं रही,
तो मैंने खुद को बार-बार समझाना छोड़ दिया।
हर बार अपनी अहमियत साबित करने से बेहतर लगा,
कि तुम्हारे व्यवहार को जैसा है, वैसा ही समझ लिया जाए।
शुरू में तुम्हारी खामोशी सवाल लगती थी,
फिर वही खामोशी जवाब जैसी लगने लगी।
तब समझ आया,
कभी-कभी सामने वाला कुछ कहता नहीं, फिर भी बहुत कुछ बता देता है।
मैंने तुम्हारा ध्यान पाने के लिए खुद को नहीं बदला,
बस धीरे-धीरे अपनी उम्मीदें कम कर लीं।
अब तुम्हारी बेरुखी उतनी नहीं चुभती,
क्योंकि मैंने अपनी शांति को किसी की परवाह पर निर्भर करना छोड़ दिया है।
उपेक्षा की चोट इसलिए गहरी थी,
क्योंकि मैंने तुम्हें हमेशा अपनेपन से जगह दी थी।
दर्द इस बात का नहीं कि तुम दूर हुए,
दर्द यह था कि मुझे देर से समझ आया कि दूरी पहले ही आ चुकी थी।
अब तुम्हारे हर व्यवहार का अर्थ खोजने की कोशिश नहीं करता,
न यह सोचता हूँ कि कहाँ कमी रह गई।
किसी का मुझे महत्व न देना,
मेरी कीमत का प्रमाण नहीं हो सकता।
बहुत बार मन हुआ कि पूछूँ, “आखिर बदल क्या गया?”
फिर लगा, जवाब मिल भी गया तो क्या बदलेगा।
कुछ रिश्तों में सबसे जरूरी उत्तर,
वही होता है जो सामने वाले के व्यवहार से मिल चुका हो।
मैंने पीछे हटना इसलिए नहीं सीखा कि तुम्हें मेरी कमी महसूस हो,
बस इसलिए कि मुझे अपनी थकान महसूस होने लगी थी।
जहाँ अपनापन माँगना पड़े,
वहाँ थोड़ी दूरी आत्मसम्मान बचा लेती है।
तुम्हें अनदेखा करने की कोई इच्छा नहीं,
बस अब खुद को अनदेखा नहीं करूँगा।
तुम्हारे लिए जगह रहेगी,
मगर अपनी जगह छोड़कर नहीं।
कभी तुम्हारी उपेक्षा बहुत भारी लगती थी,
आज भी उसका असर कहीं-कहीं महसूस होता है।
फर्क बस इतना है,
अब मैं उस दर्द को अपनी पहचान नहीं बनने देता।