दिन भर की उलझनों को जब एक तरफ रख देता हूँ,
तब जाकर इस अंधेरे में अपनी असली कीमत देखता हूँ।
कोई शिकायत नहीं कि किसी ने हमें समझा क्यों नहीं,
शिकायत तो खुद से है कि हम सबको समझाने में लगे रहे।
यह जो रात का आखिरी पहर है ना,
यह पूरी दुनिया से दूर, खुद के सबसे पास होने का वक्त है।
वक्त के थपेड़ों ने चेहरे की रंगत भले ही बदल दी हो,
पर मन का वो मासूम कोना आज भी इस सन्नाटे में जिंदा है।
जो उम्मीदें दूसरों से थीं, वो कब की टूट चुकी हैं,
अब तो बस खुद से बेहतर बनने का एक मौन वादा है।
सब कुछ ठीक होने का इंतजार करना छोड़ दिया है मैंने,
अब तो जैसी भी है जिंदगी, उसे गले लगाना सीख लिया है।
खिड़की के बाहर पसरा हुआ यह गहरा सन्नाटा,
जैसे मेरे भीतर के हर सवाल को चुपचाप सुन रहा हो।
कल की नाकामियों पर अब मलाल नहीं होता,
यह रात हौसला देती है कि सुबह फिर एक नई शुरुआत होगी।
दुनिया की नजरों में खुद को साबित करते-करते,
ना जाने कब हम अपनी ही नजरों में कर्जदार हो गए।
इस खामोशी का अपना एक अलग ही सुकूँ है,
यहाँ न कोई परखने वाला है और न किसी को सफाई देनी है।
चेहरों पर हँसी सजाकर जो दिन भर घूमते रहे,
रात ने चुपके से उनसे उनका असली नाम पूछ लिया।
कोई गिला नहीं अब उन रास्तों से जो बीच में ही छूट गए,
शायद भटकना भी जरूरी था सही मंजिल को पहचानने के लिए।
ये तन्हाई किसी की कमी का अहसास नहीं कराती,
यह तो बस खुद की मौजूदगी का जश्न मनाती है।
दुनिया को मुकम्मल जवाब देने की चाहत में,
हम भूल ही गए थे कि खुद को भी एक सुकूँ देना है।
पुरानी डायरी के पन्ने पलटने की जरूरत नहीं पड़ती,
यह रात पुरानी हर एक सीख को जुबानी दोहरा देती है।
जो बात दिल में चुभती थी कभी काँटों की तरह,
वक्त ने उसे एक खूबसूरत तजुर्बे में बदल दिया।
सब कुछ पा लेने की दौड़ से जब थक्कर बैठता हूँ,
तब समझ आता है कि थम जाना ही सबसे बड़ी अमानत है।
खामोशियाँ भी कभी-कभी बातें करने लगती हैं,
बस सुनने के लिए दिल का शांत होना बेहद जरूरी है।
जिंदगी का यह सफर अकेले ही तय करना है,
यह बात रात का यह गहरा सन्नाटा बखूबी समझा जाता है।
कल सुबह फिर एक नया मुखौटा पहनना होगा,
चलो इस अंधेरे में थोड़ी देर सच के साथ जी लेते हैं।
जिम्मेदारी की चादर तानकर जो दिन भर थके रहते हैं,
रात को वही लोग सिरहाने उम्मीद का एक दीया रखते हैं।
कुछ बातें जो महफ़िल में अधूरी रह गई थीं,
उन्हें पूरा करने के लिए यह तन्हाई बहुत जरूरी थी।
यह रात कोई सजा नहीं, एक ठहराव है,
जहाँ जिंदगी अपनी ही रफ़्तार से सवाल करती है।
भागते-भागते थक चुका था जब मैं ज़माने के पीछे,
तब इस अंधेरे ने गले लगाकर कहा कि थोड़ा ठहर जाओ।
जो लोग अब जिंदगी का हिस्सा नहीं रहे,
उनकी सीख आज भी फैसलों में शामिल रहती है।
ख्वाहिशों के शोर में जो कभी सुनाई नहीं दी,
आज उस दबी हुई धड़कन को साफ़ सुना है मैंने।
वक्त की इस नदी में बहुत कुछ बह गया,
पर खुद को बचाए रखने का हुनर यहीं आकर सीखा।
कमरे का सन्नाटा अब डराता नहीं है मुझे,
यह तो एक आईना है जिसमें कोई झूठ नहीं होता।
कल की फिक्र में आज की रात क्यों जाया करें,
जो बीत गया वो सबक था, जो है वो सुकूँ है।
खिड़की से आती यह ठंडी हवा सिखाती है,
कि बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ बदला जा सकता है।
दिन भर की भागदौड़ में जो बातें पीछे छूट जाती हैं,
रात की खामोशी में वही सबसे पहले गले मिलती हैं।
कमरे का सन्नाटा सवाल नहीं करता, बस गवाह बन जाता है,
कि खुद से सच बोलने में कितनी हिम्मत लगती है।
कुछ फैसले जिन्हें सही मानकर हम आगे बढ़ गए थे,
यह रात ठहरकर पूछती है कि क्या वाकई हम खुश हैं।
नींद का न आना अब कोई शिकायत नहीं रही,
यह तो एक जरिया है खुद से मुलाकात करने का।
वक्त के साथ बहुत कुछ बदला है मुझमें,
यह बात आईने से ज्यादा देर रात की दीवारें जानती हैं।
शोर में तो हम सिर्फ दूसरों की सुनते हैं,
अपनी आवाज सुनने के लिए इस तन्हाई की जरूरत थी।
गलतियां भी याद आती हैं और उनके पीछे की मासूमियत भी,
अंधेरा खिड़की से झांककर कहता है कि तुम इंसान ही तो हो।
जो रिश्ते वक्त के साथ धुंधले हो गए,
उनकी यादें आज भी इस खामोश कमरे में साफ नजर आती हैं।
खुद को समझने की कोशिश में कई रातें गुजरी हैं,
शायद अधूरा होना ही जिंदगी का सबसे खूबसूरत सच है।
खामोशी कभी खाली नहीं होती,
इसमें वो सब कुछ होता है जो हम कह नहीं पाते।
बीते हुए कल को सुधारने की चाहत अब नहीं रही,
बस आने वाले कल में खुद को खोने का डर न हो।
दुनिया की नजरों में समझदार होना एक अलग बात है,
पर अपनी नजरों में सुकूँ पाना सबसे मुश्किल काम है।
रात का यह पहर किसी का इंतजार नहीं करता,
यह बस हमें हमारे ही करीब ले आता है।
कितने मुखौटे उतारकर रख देता हूँ सिरहाने,
तब जाकर कहीं खुद को अपने असली रूप में पाता हूँ।
पुरानी बातें जब बिना दस्तक दिए चली आती हैं,
तो समझ आता है कि कुछ जख्मों का भरना जरूरी नहीं होता।
ख्वाब और हकीकत के बीच का जो फासला है,
उसी खाली जगह में यह रात चुपचाप सांस लेती है।
हम हमेशा दूसरों को माफ करने की जल्दी में रहते हैं,
पर खुद को माफ करने में जिंदगी गुजर जाती है।
इस सन्नाटे में एक अजीब सी तसल्ली है,
न कुछ खोने का डर है और न कुछ पाने की जल्दी।
बचपन के वो सीधे रास्ते और आज के ये उलझे हुए मोड़,
रात की इस तन्हाई में सब एक साथ दिखाई देते हैं।
जिंदगी जैसी भी है, अब उससे कोई गिला नहीं,
कम से कम खुद को जानने का यह वक्त तो मिला।