Love Maa Shayari
माँ, जब मैं छोटा था, तुम मेरी उँगली पकड़कर चलती थीं, आज मैं अपने फैसले खुद लेता हूँ, लेकिन सच तो यह है, मेरे भीतर अब भी तुम्हारी ही दिशा चलती है।
तुमने कभी यह नहीं कहा कि तुमने मेरे लिए कितना किया, तुम बस करती रहीं, और शायद प्रेम की सबसे सच्ची पहचान भी यही है— जहाँ हिसाब नहीं होता।
मुझे याद है, जब मैं बीमार पड़ता था, तुम्हारी आँखों में नींद कम और चिंता ज़्यादा होती थी, तब समझ नहीं पाया, अब किसी अपने की फ़िक्र होती है तो तुम्हारा प्रेम याद आता है।
माँ, तुम्हारे लिए मेरी हर छोटी बात बड़ी थी, और दुनिया की कई बड़ी बातें तुम्हारे लिए छोटी, क्योंकि तुम्हारी दुनिया में मैं हमेशा सबसे पहले था।
जब कभी मन टूटने लगता है, मैं तुम्हारी कही बातें याद करता हूँ, और लगता है जैसे तुम दूर होकर भी मेरे भीतर कहीं पास बैठी हो।
तुमने मुझे यह नहीं सिखाया कि हमेशा सही कैसे रहना है, तुमने सिखाया कि गलती होने पर उसे स्वीकार कैसे करना है, और यही सीख इंसान को बेहतर बनाती है।
माँ, तुम्हारी चिंता कभी सवाल नहीं लगती, वह हमेशा प्रेम का दूसरा नाम लगती है, जो हर दिन किसी न किसी रूप में मेरा हाल पूछ लेती है।
समय ने तुम्हारे बालों में सफेदी भर दी, लेकिन मेरे लिए तुम्हारा अपनापन आज भी उतना ही नया है जितना बचपन की किसी सुबह हुआ करता था।
जब घर से दूर रहता हूँ, तो कई चीज़ों की कमी महसूस होती है, मगर सबसे ज़्यादा तुम्हारी मौजूदगी की, क्योंकि कुछ लोग जगह नहीं, पूरा माहौल होते हैं।
माँ, तुम्हारे हाथों का बना साधारण खाना भी किसी दावत से ज़्यादा याद आता है, शायद इसलिए कि उसमें स्वाद से पहले तुम्हारा स्नेह मिला होता था।
तुमने मुझे कभी ऊँची आवाज़ में अपने त्याग नहीं गिनाए, इसलिए बहुत देर से समझ पाया कि मेरी कितनी खुशियाँ तुम्हारी चुप्पियों से होकर गुज़री हैं।
जब मैं हारकर लौटता था, तुम मेरी हार को नहीं, मेरे चेहरे को देखती थीं, और यही एहसास दिलाती थीं कि परिणाम से पहले इंसान ज़रूरी है।
माँ, तुम्हारे पास बैठकर कभी-कभी कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती, क्योंकि कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, मौजूदगी से सुकून देते हैं।
आज जो भी अच्छा हूँ, उसमें मेरी मेहनत होगी, लेकिन उसकी बुनियाद तुम्हारे दिए संस्कार हैं, जो हर मोड़ पर मेरा मार्गदर्शन करते हैं।
माँ, अगर मुझे अपने जीवन की सबसे सुरक्षित जगह बतानी हो, तो मैं किसी घर का नाम नहीं लूँगा, मैं बस तुम्हारे पास बैठी हुई उन शांत घड़ियों का ज़िक्र करूँगा, जहाँ हर चिंता थोड़ी हल्की हो जाती थी।
माँ, तुमने कभी मेरे लिए बड़े-बड़े वादे नहीं किए, बस हर सुबह यह यक़ीन दिया कि चाहे दिन कैसा भी हो, शाम को लौटने के लिए एक अपनापन हमेशा रहेगा।
जब मैं छोटा था, तुम मेरे बिखरे हुए खिलौने समेटती थीं, आज समझता हूँ, तुम सिर्फ़ कमरा नहीं, मेरा बचपन सँभाल रही थीं।
तुम्हारे पास शायद बहुत फुर्सत कभी नहीं थी, फिर भी मेरे लिए समय हमेशा था, अब जाकर समझ आता है, प्रेम समय मिलने पर नहीं, समय निकालकर किया जाता है।
माँ, तुमने मेरी हर बात पर विश्वास नहीं किया, लेकिन हर मुश्किल में मेरा साथ ज़रूर दिया, और यही साथ मुझे सही राह पर रखता रहा।
तुम्हारी आवाज़ में एक अजीब-सी बात है, वह सलाह भी देती है, ढाँढस भी बँधाती है, और बिना कहे यह भी जता देती है कि मैं अकेला नहीं हूँ।
जब मैं पहली बार असफल हुआ, तो मुझे अपनी हार बड़ी लगी, लेकिन तुम्हें मेरी हिम्मत की चिंता थी, तुम्हें परिणाम से ज़्यादा मेरा टूटना डराता था।
माँ, तुम्हारे प्रेम में कभी कोई शर्त नहीं थी, न अच्छे अंकों की, न बड़ी उपलब्धियों की, मैं जैसा था, तुम्हारे लिए वैसा ही क़ीमती था।
तुमने मुझे यह नहीं सिखाया कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं, तुमने सिखाया कि मुझे अपने बारे में क्या सोचना चाहिए, और यही बात जीवन भर काम आई।
कई बार मैं तुम्हारी बातों से सहमत नहीं था, कई बार अपनी ज़िद में भी रहा, लेकिन समय ने अक्सर साबित किया कि तुम्हारा अनुभव मेरी जल्दबाज़ी से ज़्यादा समझदार था।
माँ, तुम्हारी मुस्कान हमेशा घर की सबसे सुकून भरी चीज़ रही, उसे देखकर लगता था कि सब कुछ ठीक है।
जब कभी देर रात तक जागता हूँ, तो सोचता हूँ, तुमने भी कितनी रातें यूँ ही बिताई होंगी, बस फ़र्क इतना था कि तुम्हारी जागने की वजह मैं था।
तुम्हारे हाथों का स्पर्श अब भी वैसा ही लगता है, जैसे सारी थकान को यह भरोसा मिल गया हो कि अब सब ठीक हो जाएगा।
माँ, दुनिया में बहुत जगहें देखीं, बहुत लोगों से मिला, लेकिन जो अपनापन तुम्हारे पास बैठकर मिलता है, वह कहीं और नहीं मिला।
तुमने मेरी कमियों को देखा, मगर मुझे उनसे परिभाषित नहीं किया, तुम्हें हमेशा मेरे भीतर उस इंसान पर भरोसा रहा जो मैं बन सकता था।
माँ, अगर जीवन की सबसे सुंदर स्मृतियों को चुनना पड़े, तो उनमें कोई बड़ी घटना नहीं होगी, बस वे साधारण दिन होंगे जब तुम पास थीं, और मुझे किसी बात की चिंता नहीं थी।
माँ, तुम्हारे प्रेम की सबसे ख़ास बात यह है कि उसे कभी जताने की ज़रूरत नहीं पड़ती, वह सुबह की उस आवाज़ में मिल जाता है जो पूछती है, "नींद ठीक से आई थी ना?"
जब मैं छोटा था, तुम मेरा हाथ पकड़कर बाज़ार ले जाती थीं, आज मैं दुनिया की भीड़ में अकेला चलता हूँ, मगर भरोसा अब भी उसी हाथ की याद से मिलता है।
तुमने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि तुम्हारे अपने भी कुछ दुःख होंगे, तुम हर बार मुस्कुराकर मिलीं, और मैं लंबे समय तक यही समझता रहा कि माँएँ शायद उदास नहीं होतीं।
माँ, तुम्हारे पास बैठना हमेशा किसी सलाह लेने के लिए ज़रूरी नहीं था, कई बार सिर्फ़ तुम्हारे पास होना ही मन को हल्का कर देता था।
तुम्हारी याद अक्सर किसी बड़े कारण से नहीं आती, कभी किसी पुराने गीत से, कभी रसोई की किसी ख़ुशबू से, और कभी यूँ ही अचानक दिन के बीचोंबीच।
जब मैं पहली बार घर से दूर रहा, तब समझ आया कि घर की कमी नहीं खलती, माँ की कमी खलती है, क्योंकि घर तो वहीं होता है जहाँ कोई तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हो।
माँ, तुमने मुझे सिर्फ़ बोलना नहीं सिखाया, तुमने सिखाया कि कब चुप रहना चाहिए, सिर्फ़ चलना नहीं सिखाया, यह भी सिखाया कि किस राह पर चलना चाहिए।
तुम्हारी चिंता कभी थकती नहीं, वह मेरी उम्र के साथ कम नहीं हुई, बस उसके सवाल बदल गए, पहले पूछती थीं "गिर तो नहीं गए?" अब पूछती हो "थके तो नहीं हो?"
जब दुनिया की बातें मन को उलझा देती हैं, तब तुम्हारी एक साधारण-सी बात सब कुछ साफ़ कर देती है, शायद प्रेम में वह स्पष्टता होती है जो तर्क में नहीं मिलती।
माँ, तुमने मेरी हर गलती को छुपाया नहीं, मगर मुझे गलती से बड़ा भी नहीं होने दिया, यही वजह है कि तुम्हारी डाँट भी आज याद बनकर मुस्कुरा देती है।
तुम्हारी आँखों में मेरे लिए हमेशा एक अलग-सी चमक रही, जैसे मेरी छोटी-सी खुशी भी तुम्हारे दिन का सबसे सुंदर हिस्सा हो।
कई लोग जीवन में साथ देते हैं, लेकिन तुम्हारा साथ अलग है, क्योंकि वह मेरे अच्छे दिनों का नहीं, मेरे हर दिन का साथी रहा है।
माँ, तुम्हारे प्रेम को शब्दों में बाँधना कठिन है, क्योंकि वह किसी एक घटना में नहीं, मेरे पूरे जीवन में फैला हुआ है।
आज भी जब कोई सफलता मिलती है, मन सबसे पहले तुम्हें याद करता है, क्योंकि मेरी हर उड़ान के पीछे तुम्हारा भरोसा खड़ा दिखाई देता है।
माँ, अगर कोई मुझसे पूछे कि निस्वार्थ प्रेम कैसा होता है, तो मैं कोई परिभाषा नहीं दूँगा, मैं बस तुम्हारा नाम लूँगा, क्योंकि मैंने उसे सबसे पहले तुम्हारे व्यवहार में देखा है।