माँ,
जब मैं छोटा था,
मुझे लगता था कि तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी,
अब समझता हूँ,
कुछ लोग उम्रभर साथ रहें या नहीं,
उनका प्रेम हमेशा साथ रहता है।
तुम्हारी आदत थी
मेरी बात पूरी होने से पहले समझ जाना,
और मेरी आदत थी
इसे सामान्य मान लेना,
आज महसूस होता है,
समझे जाना कितना बड़ा सुख होता है।
माँ,
तुमने कभी मुझे यह नहीं बताया
कि तुम्हें कितनी परेशानियाँ थीं,
तुम बस इतना सुनिश्चित करती रहीं
कि मेरे चेहरे पर चिंता कम रहे।
जब मैं घर लौटता था,
तुम्हारी आँखों में जो राहत दिखती थी,
वह आज भी याद है,
जैसे मेरी सलामती ही
तुम्हारे दिन की सबसे अच्छी ख़बर हो।
तुम्हारा प्रेम किसी बड़े त्याग की कहानी नहीं,
हज़ारों छोटी-छोटी बातों का संग्रह था,
जिन्हें उस समय समझ नहीं पाया,
मगर आज वही सबसे अनमोल लगती हैं।
माँ,
तुमने मुझे बोलना सिखाया,
लेकिन उससे भी ज़्यादा
लोगों की बात सुनना सिखाया,
और यही सीख
कई रिश्तों को बचा गई।
जब कभी मैं खुद से निराश हुआ,
तुमने मुझे मेरी कमियाँ नहीं गिनाईं,
तुमने मुझे मेरी संभावनाएँ याद दिलाईं,
और यही बात मुझे आगे बढ़ाती रही।
तुम्हारी गोद में सिर रखना
शायद दुनिया की सबसे सरल बात थी,
लेकिन उस सादगी में जो सुकून था,
वह कहीं और नहीं मिला।
माँ,
तुम्हारे प्रेम में कोई तुलना नहीं थी,
तुम मुझे किसी से बेहतर नहीं बनाना चाहती थीं,
तुम बस चाहती थीं
कि मैं अपने सबसे अच्छे रूप तक पहुँचूँ।
अब जब किसी बच्चे को
अपनी माँ से लिपटते देखता हूँ,
तो मुस्कुरा भी देता हूँ
और थोड़ा भावुक भी हो जाता हूँ,
क्योंकि कुछ दृश्य
सीधे दिल तक पहुँच जाते हैं।
तुम्हारी परवाह का तरीका भी अलग था,
तुम मेरे भविष्य की चिंता करती थीं,
लेकिन वर्तमान की खुशियाँ भी नहीं छीनती थीं,
यही संतुलन तुम्हें विशेष बनाता था।
माँ,
तुमने कभी अपने प्रेम को
शब्दों में बाँधने की कोशिश नहीं की,
तुमने उसे रोज़ जिया,
और शायद इसलिए वह इतना सच्चा था।
जब जीवन में कुछ अच्छा होता है,
तो मन सबसे पहले तुम्हें याद करता है,
क्योंकि मेरी खुशी पर
सबसे निष्कलुष मुस्कान हमेशा तुम्हारी ही होती थी।
तुम्हारी सीखें अब भी साथ चलती हैं,
किसी नियम की तरह नहीं,
एक शांत मार्गदर्शन की तरह,
जो हर मोड़ पर सही दिशा दिखा देती हैं।
माँ,
अगर जीवन की सारी उपलब्धियाँ
एक तरफ़ रख दी जाएँ,
और दूसरी तरफ़ तुम्हारा प्रेम,
तो मेरे लिए तराज़ू आज भी
तुम्हारे प्रेम की ओर ही झुकता है।
माँ,
तुमने कभी मेरे लिए बड़े सपनों की बातें नहीं कीं,
तुम बस चाहती थीं
कि मैं चैन से रहूँ,
सही रास्ते पर चलूँ,
और शायद यही चाह
सबसे सच्चा प्रेम होती है।
जब मैं छोटा था,
तुम मेरे गिरने पर दौड़कर आती थीं,
आज ज़िंदगी की ठोकरें लगती हैं,
तो तुम्हारी याद आ जाती है,
क्योंकि संभालने का पहला एहसास
तुम्हीं से मिला था।
माँ,
तुम्हारा प्रेम हमेशा उपस्थित रहा,
बिना अपनी मौजूदगी जताए,
ठीक वैसे ही
जैसे घर की नींव दिखाई नहीं देती,
पर पूरा घर उसी पर टिका होता है।
तुमने कभी यह नहीं पूछा
कि मैं दुनिया में कितना आगे हूँ,
तुम्हें बस यह जानना होता था
कि मैं भीतर से ठीक हूँ या नहीं,
और यही बात तुम्हें सबसे अलग बनाती है।
जब मैं किसी परेशानी में उलझता था,
तुम्हारे पास हर जवाब नहीं होता था,
लेकिन तुम्हारे पास बैठते ही
सवालों का बोझ हल्का हो जाता था।
माँ,
तुम्हारी डाँट में भी अपनापन था,
तुम्हारी नाराज़गी में भी चिंता,
और तुम्हारी ख़ामोशी में भी
मेरे लिए बहुत सारी दुआएँ छुपी रहती थीं।
आज जब जीवन तेज़ी से भागता है,
तो सबसे सुंदर यादें
वे साधारण दिन लगते हैं
जो तुम्हारे साथ बिना किसी वजह के गुज़रे थे।
तुम्हारे हाथों ने सिर्फ़ मुझे नहीं थामा,
उन्होंने मेरे डर,
मेरी गलतियाँ,
और मेरे टूटते हुए विश्वास को भी संभाला है।
माँ,
तुमने मुझे कभी पूर्ण बनने को नहीं कहा,
तुम बस चाहती थीं
कि मैं अच्छा बना रहूँ,
और यही सीख
जीवन की सबसे बड़ी दिशा बन गई।
जब कोई मेरी प्रशंसा करता है,
तो मन तुम्हारी ओर चला जाता है,
क्योंकि मेरे व्यक्तित्व की हर अच्छी बात में
तुम्हारी परवरिश की छाप है।
तुम्हारा प्रेम किसी अवसर का मोहताज नहीं था,
न जन्मदिन का,
न किसी विशेष दिन का,
वह हर सुबह,
हर शाम,
हर चिंता और हर मुस्कान में मौजूद था।
माँ,
अगर मैं बहुत देर तक चुप रहूँ,
तो भी तुम समझ जाती थीं
कि कुछ ठीक नहीं है,
और यह समझ
किसी भी शब्द से ज़्यादा कीमती थी।
तुम्हारे होने से
जीवन आसान नहीं हुआ था,
लेकिन जीवन का सामना करना आसान हो गया था,
और यही तुम्हारे प्रेम का सबसे बड़ा असर है।
कई लोग साथ चलते हैं,
कई लोग समय के साथ बदल जाते हैं,
लेकिन तुम्हारा स्नेह
मेरी उम्र के हर पड़ाव पर
एक जैसा बना रहा।
माँ,
अगर कभी मुझसे पूछा जाए
कि निस्वार्थ प्रेम कैसा दिखता है,
तो मैं कोई उदाहरण नहीं दूँगा,
मैं बस तुम्हें याद करूँगा,
क्योंकि मैंने प्रेम को
सबसे सच्चे रूप में
तुम्हारे व्यवहार में ही देखा है।
माँ,
जब मैं बहुत छोटा था,
मुझे लगता था कि तुम सब कुछ जानती हो,
अब बड़ा होकर समझा हूँ,
तुम्हें सब कुछ नहीं पता था,
फिर भी तुम हर बार मेरा सहारा बन जाती थीं।
तुम्हारे प्रेम की सबसे सुंदर बात यह थी
कि उसमें कोई प्रदर्शन नहीं था,
वह मेरे लिए रखी गई आख़िरी रोटी में था,
मेरी प्रतीक्षा करती हुई आँखों में था,
और मेरे लौटने तक जागती हुई रातों में था।
माँ,
दुनिया ने मुझे बहुत लोगों से मिलवाया,
लेकिन तुम्हारे जैसा कोई नहीं मिला,
क्योंकि बहुत लोग मुझे समझने की कोशिश करते थे,
और तुम मुझे महसूस कर लेती थीं।
जब मैं किसी बात पर निराश हो जाता था,
तुम तुरंत समाधान नहीं देती थीं,
बस यह एहसास दिलाती थीं
कि मैं अकेला नहीं हूँ,
और कई बार यही सबसे बड़ा सहारा होता था।
तुम्हारा प्रेम कभी मेरी सफलताओं से नहीं जुड़ा,
वह मेरी असफलताओं में भी उतना ही साथ था,
शायद इसी वजह से
मैं हारकर भी खुद से नफ़रत करना नहीं सीख पाया।
माँ,
तुमने मुझे उड़ना सिखाया,
लेकिन यह भी सिखाया
कि लौटकर अपने लोगों के पास आना कभी मत भूलना,
और यही सीख रिश्तों को जीवित रखती है।
आज भी जब कोई मेरी चिंता करता है,
तो तुम्हारी याद आ जाती है,
क्योंकि दुनिया का ख़याल और माँ का ख़याल
एक जैसे दिख सकते हैं,
मगर महसूस अलग होते हैं।
तुम्हारे हाथों की बनी साधारण-सी रोटी
आज किसी दावत से ज़्यादा याद आती है,
क्योंकि भूख सिर्फ़ पेट की नहीं होती,
कभी-कभी मन भी अपनापन चाहता है।
माँ,
तुमने मेरे हर रूप को स्वीकार किया,
ज़िद्दी भी,
कमज़ोर भी,
उलझा हुआ भी,
और शायद यही प्रेम का सबसे दुर्लभ रूप है।
जब मैं देर से घर लौटता था,
तुम्हारा पहला सवाल डाँट नहीं होता था,
तुम बस यह देखती थीं
कि मैं ठीक हूँ या नहीं,
और उस पल समझ आता था
कि प्रेम की प्राथमिकताएँ अलग होती हैं।
तुमने मुझे कभी अमीर बनने की सीख नहीं दी,
तुमने सिखाया
कि दिल इतना बड़ा रखो
कि किसी को तुम्हारे कारण चोट न पहुँचे,
और यही सीख आज सबसे मूल्यवान लगती है।
माँ,
तुम्हारा प्रेम किसी उत्सव जैसा नहीं था
जो कभी-कभी दिखाई दे,
वह तो धूप की तरह था,
जो हर दिन मौजूद रहती है,
चाहे हम ध्यान दें या नहीं।
जब जीवन बहुत कठिन हो जाता है,
तो मैं अक्सर उन दिनों को याद करता हूँ
जब तुम्हारा हाथ सिर पर होता था,
और सच कहूँ,
आज भी वही याद मुझे मज़बूत कर देती है।
तुम्हारी मुस्कान में एक अजीब-सी राहत थी,
जैसे घर की सारी थकान
वहीं जाकर उतर जाती हो,
और शायद इसलिए
तुम्हें याद करना हमेशा सुकून भी देता है।
माँ,
अगर मुझे अपने जीवन की सबसे बड़ी पूँजी चुननी हो,
तो मैं कोई वस्तु नहीं चुनूँगा,
मैं तुम्हारा प्रेम चुनूँगा,
क्योंकि वही एक चीज़ है
जो समय बीतने के बाद भी
मेरे भीतर वैसी ही सुरक्षित है।
माँ,
तुम्हारा प्रेम कभी शब्दों का मोहताज नहीं रहा,
वह तो उस तरह साथ रहा
जैसे साँसें रहती हैं,
हर पल महसूस होती हैं,
पर अक्सर उनका महत्व देर से समझ आता है।
जब मैं छोटा था,
तुम मेरा हाथ पकड़कर चलती थीं,
आज मैं अपने रास्तों पर अकेला चलता हूँ,
मगर हिम्मत अब भी
तुम्हारे विश्वास से ही मिलती है।
माँ,
तुमने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया
कि दुनिया कितनी कठिन हो सकती है,
तुम अपने हिस्से की चिंताएँ छुपाकर
मेरे हिस्से की मुस्कान बचाती रहीं।
तुम्हारा प्रेम अजीब था,
उसमें कोई शर्त नहीं थी,
न उपलब्धियों की,
न सफलताओं की,
मैं जैसा था,
तुम्हारे लिए वैसा ही क़ीमती था।
जब कभी मैं हारकर लौटा,
तुमने परिणाम नहीं पूछा,
तुमने बस मेरा चेहरा देखा,
और उस एक नज़र में
इतना अपनापन था
कि मन फिर से खड़ा हो गया।
माँ,
तुम्हारी गोद में सिर रखकर
समस्याएँ समाप्त नहीं होती थीं,
लेकिन उनका बोझ ज़रूर कम हो जाता था,
और यही तुम्हारे प्रेम की सबसे बड़ी ताक़त थी।
तुमने मुझे जीवन की बड़ी सीखें
किताबों से नहीं दीं,
तुम्हारे व्यवहार ने सिखाया
कि अच्छा इंसान होना
हर सफलता से बड़ा होता है।
कई लोग मेरी खुशियों में शामिल हुए,
कई लोग मेरे साथ चले,
लेकिन तुम्हारी खुशी अलग थी,
क्योंकि उसमें मेरा सुख
तुम्हारे अपने सुख से भी बड़ा था।
माँ,
तुम्हारी चिंता कभी बोझ नहीं लगी,
क्योंकि उसमें रोकने की ज़िद नहीं,
संभालने की चाह होती थी,
और यही प्रेम को इतना सुंदर बनाती है।
जब मैं घर से दूर होता हूँ,
तो सबसे ज़्यादा किसी जगह की नहीं,
तुम्हारी आवाज़ की कमी महसूस होती है,
जो हर दिन यह पूछती थी,
"सब ठीक है ना?"
तुमने कभी अपने प्रेम का बखान नहीं किया,
तुमने उसे जिया,
रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में,
और शायद इसी वजह से
वह इतना सच्चा लगता है।
माँ,
आज जो मेरे भीतर
थोड़ी-सी भी अच्छाई है,
उसकी जड़ें तुम्हारी परवरिश में हैं,
तुमने मुझे सिर्फ़ बड़ा नहीं किया,
मुझे इंसान बनाया।
तुम्हारे प्रेम की सबसे सुंदर बात यह है
कि समय उसे कम नहीं कर पाया,
बचपन में वह मेरी उँगली पकड़ता था,
आज वह मेरी आत्मा को संभाले हुए है।
कभी सोचता हूँ,
दुनिया में सबसे सुरक्षित जगह कौन-सी है,
और हर बार उत्तर तुम्हारे पास आकर रुक जाता है,
क्योंकि तुम्हारे प्रेम जैसा सुकून
कहीं और नहीं मिला।
माँ,
अगर मुझे प्रेम की परिभाषा लिखनी हो,
तो मैं कोई बड़ा शब्द नहीं चुनूँगा,
मैं बस तुम्हारा नाम लिखूँगा,
क्योंकि मैंने निस्वार्थ प्रेम को
सबसे पहले और सबसे सच्चे रूप में
तुम्हारे भीतर ही देखा है।