माँ ने कभी यह नहीं कहा कि उन्हें मेरी फ़िक्र है,
लेकिन रात को देर होने पर
दरवाज़े की हल्की सी आहट पर उनका उठ जाना
हर बार यह बात कह देता था।
जब दुनिया ने मुझे मेरी कमियाँ गिनाईं,
माँ ने मेरी कोशिशें गिनीं।
शायद इसी वजह से
मैं खुद से हारकर भी पूरी तरह नहीं टूटा।
बचपन में मैं उनका हाथ पकड़कर चलता था,
फिर एक उम्र आई जब उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया।
मगर भरोसा कभी नहीं छोड़ा,
और वही भरोसा आज भी साथ चलता है।
माँ से बात करके हर समस्या हल नहीं होती,
लेकिन मन का बोझ हल्का ज़रूर हो जाता है।
कुछ रिश्ते समाधान नहीं देते,
सिर्फ़ इतना देते हैं कि तुम अकेले नहीं हो।
घर में सब सो जाते थे,
मगर माँ का ध्यान आख़िरी बत्ती बुझने तक जागता रहता था।
उनकी नींद से ज़्यादा अहम
हमारी सलामती हुआ करती थी।
मैंने अक्सर देखा है,
माँ अपने लिए नई चीज़ लेने से पहले
घर के बाकी लोगों की ज़रूरतें पूरी करती हैं।
उनका प्रेम शब्दों में नहीं,
चुनावों में दिखाई देता है।
जब मैं छोटा था,
मुझे लगता था माँ हर सवाल का जवाब जानती हैं।
बड़ा होने पर समझ आया,
वे हर जवाब नहीं जानती थीं,
फिर भी मुझे कभी डरने नहीं देती थीं।
माँ की सबसे बड़ी खूबी यह नहीं कि वे हमेशा सही होती हैं,
बल्कि यह है कि
वे हमारी गलतियों के बाद भी
हमारा साथ सही तरह से निभाती हैं।
कई यादें धुंधली हो गईं,
कई चेहरे भी वक़्त के साथ बदल गए,
मगर माँ के साथ बिताई हुई शामों का सुकून
आज भी उतना ही साफ़ याद है।
ज़िंदगी जितनी तेज़ होती गई,
माँ उतनी ही बार पूछती रहीं,
"थोड़ा आराम भी कर लिया करो।"
उस एक वाक्य में
आज भी पूरा अपनापन बसता है।
जब जेब में सपनों से ज़्यादा डर हुआ करता था,
माँ मेरी आँखों में देखकर कहती थीं,
"कोशिश करने वालों के हाथ खाली नहीं रहते,"
तब समझ नहीं आता था,
आज हर छोटी जीत में उनकी आवाज़ सुनाई देती है।
बचपन में मैं दरवाज़े तक भागकर उनका इंतज़ार करता था,
आज समझ आया कि वे पूरी उम्र
मेरे लौट आने का इंतज़ार करती रहीं,
चाहे मैं स्कूल से आऊँ या किसी मुश्किल से।
माँ को कभी अपने लिए कुछ माँगते नहीं देखा,
मगर मेरी हर ज़रूरत उन्हें याद रहती थी।
जैसे उनकी याददाश्त में
अपना हिस्सा सबसे आख़िर में लिखा गया हो।
जब घर में बिजली चली जाती थी,
माँ मोमबत्ती जलाकर कहती थीं,
"चलो, अब बातें करते हैं।"
आज लगता है,
रोशनी तो मोमबत्ती नहीं,
उनका साथ किया करता था।
मेरी गलतियों पर दुनिया ने फैसला सुनाया,
माँ ने कारण पूछा।
शायद यही फ़र्क़ है,
कुछ लोग तुम्हें परखते हैं,
और कुछ लोग तुम्हें समझते हैं।
कई बार मैं उनसे कहता था कि मैं ठीक हूँ,
और वे मुस्कुरा देती थीं।
आज समझ आया,
उन्हें मेरे शब्दों से ज़्यादा
मेरी खामोशी पढ़नी आती थी।
माँ के कमरे में रखा पुराना बक्सा
सिर्फ़ सामान नहीं रखता,
उसमें मेरी छोटी-छोटी जीतें,
पुरानी तस्वीरें और उनका गर्व भी रखा होता है।
जब पहली बार घर से दूर गया,
तब महसूस हुआ कि घर एक जगह नहीं होता।
घर वह एहसास है
जो माँ की आवाज़ सुनते ही लौट आता है।
मैंने उन्हें कभी अपनी थकान गिनाते नहीं देखा,
हालाँकि पूरे घर की थकान
अक्सर उन्हीं के हिस्से में आती थी।
फिर भी शाम को उनका चेहरा
सबका हाल पूछने के लिए तैयार रहता था।
माँ की डाँट में भी अजीब सा अपनापन था,
उसमें नाराज़गी कम
और मेरी फिक्र ज़्यादा होती थी।
वक़्त ने सिखाया कि हर ऊँची आवाज़
बुरी नीयत से नहीं निकलती।
जब मैं हारकर बैठ जाता था,
माँ जीत की बातें नहीं करती थीं,
वे बस अगली सुबह की बात करती थीं।
शायद उन्हें मालूम था
कि उम्मीद हमेशा कल के रास्ते से आती है।
कुछ लोग रिश्ते निभाने के लिए समय निकालते हैं,
माँ समय के भीतर ही रिश्ता बसाकर रखती हैं।
इसलिए चाहे दिन कितना भी व्यस्त हो,
उनकी चिंता कभी छुट्टी नहीं लेती।
माँ के हाथ सिर पर रखे हों,
तो समस्याएँ खत्म नहीं होतीं,
लेकिन उनसे लड़ने का हौसला बढ़ जाता है।
और कई बार हौसला ही सबसे बड़ी राहत होता है।
मैंने दुनिया की बहुत सी जगहें देखीं,
मगर सबसे सुरक्षित जगह आज भी वही लगती है,
जहाँ माँ बिना पूछे कह दें,
"पहले कुछ खा लो, फिर बात करना।"
उम्र बढ़ने के साथ समझ आया,
माँ हमें सिर्फ़ चलना नहीं सिखातीं,
वे यह भी सिखाती हैं कि
गिर जाने के बाद उठना कैसे है।
उनके साथ बिताए हुए साधारण दिन ही
सबसे कीमती यादें बन गए।
क्योंकि जीवन की असली खुशियाँ
अक्सर उन्हीं पलों में छिपी होती हैं
जिन्हें हम उस समय सामान्य समझ लेते हैं।
जब भी ज़िंदगी ने मुझे जल्दी बड़ा होने पर मजबूर किया,
माँ ने बिना कुछ कहे मेरे हिस्से का बचपन संभालकर रखा।
मैं बाहर की दुनिया से लड़ता रहा,
और घर लौटते ही उनकी आवाज़ ने मुझे फिर से अपना बना लिया।
कई बार रास्ता समझ नहीं आता था,
कदम रुक जाते थे, हिम्मत साथ छोड़ने लगती थी।
तब माँ ने कोई लंबा उपदेश नहीं दिया,
बस इतना पूछा — "थक गए हो क्या?"
और उसी सवाल में आगे बढ़ने की ताकत मिल गई।
माँ के साथ बैठकर हर बार बातें करना ज़रूरी नहीं होता,
कभी-कभी उनका पास होना ही काफी होता है।
जैसे आँधी के बीच खिड़की से आती एक शांत रोशनी,
जो कहती है कि सब ठीक हो जाएगा।
बचपन में गिरने पर घुटने छिलते थे तो माँ दौड़ आती थीं,
आज ज़िंदगी चोट पहुँचाती है तो उनकी बातें याद आती हैं।
वक़्त बदल गया, परेशानियाँ बदल गईं,
पर मेरा सहारा बनने का उनका तरीका नहीं बदला।
घर की पहचान दीवारों से नहीं होती,
कुछ आवाज़ों से होती है।
और उनमें सबसे सुकून देने वाली आवाज़,
आज भी माँ के रसोई से पुकारने की है।
मैंने दुनिया में बहुत लोगों को सलाह देते देखा,
बहुत लोगों को साथ निभाने का वादा करते देखा,
मगर माँ उन लोगों में हैं
जो बिना वादा किए पूरी उम्र साथ खड़ी रहती हैं।
जब अपने ऊपर भरोसा कम पड़ने लगता है,
तो माँ का भरोसा याद आता है।
अजीब बात है,
उन्होंने हमेशा मुझमें वह देखा
जो मैं खुद भी नहीं देख पाया था।
उनके हाथों की बनाई साधारण सी रोटी में भी
एक ऐसा अपनापन था,
जो बड़े से बड़े उत्सव की दावतों में कभी नहीं मिला।
शायद स्वाद खाने में नहीं,
किसी के मन से तुम्हारी चिंता करने में होता है।
माँ की मौजूदगी कोई चमत्कार नहीं,
बल्कि रोज़ मिलने वाली वह सहज ताकत है
जिसकी आदत हमें इतनी हो जाती है
कि उसकी कीमत समझने में उम्र लग जाती है।
अगर जीवन की सारी उपलब्धियाँ एक तरफ रख दूँ,
और दूसरी तरफ माँ की मुस्कान,
तो फैसला करना मुश्किल नहीं होगा—
कुछ रिश्ते सफलता से नहीं,
सुकून से बड़े होते हैं।