माँ,
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने कई बार खुद को संभाला,
पर तुम्हारे जैसा संभालने वाला फिर कोई नहीं मिला।
अब जब रात देर तक जागता हूँ,
तो तुम्हारा वह कहना याद आता है —
“ज़्यादा मत जागा कर।”
माँ,
तुम्हारी कमी सबसे ज़्यादा
उन दिनों महसूस होती है
जब मन बिना वजह उदास होता है।
कुछ रिश्ते जीवन में साथ चलते हैं,
और कुछ रिश्ते चले जाने के बाद भी
जीवन के भीतर चलते रहते हैं।
माँ,
अब कोई मेरी पसंद-नापसंद
उतनी बारीकी से नहीं जानता
जितना तुम जानती थीं।
तुम्हारे बाद समझ आया
कि प्यार जताने वाले बहुत मिल जाते हैं,
पर परवाह निभाने वाले कम होते हैं।
माँ,
तुम्हारी याद किसी पुराने घाव जैसी नहीं,
एक पुराने घर जैसी है
जहाँ दिल बार-बार लौटना चाहता है।
जब भी कोई मुश्किल आती है,
मैं आज भी सोचता हूँ —
“माँ होती तो क्या कहती?”
माँ,
तुम्हारे बिना जीवन अधूरा नहीं रुका,
पर पूरा भी कभी नहीं लगा।
आज भी कभी-कभी
तुम्हारा नाम मन में आते ही
एक अजीब-सी खामोशी उतर आती है।
माँ,
तुम्हारी डाँट, तुम्हारी हिदायतें,
तुम्हारी छोटी-छोटी बातें,
सब अब दुलार जैसी लगती हैं।
कुछ लोगों के जाने से
सिर्फ़ एक इंसान नहीं जाता,
जीवन का एक पूरा एहसास चला जाता है।
माँ,
तुम्हारे बाद घर का रास्ता वही रहा,
बस वहाँ पहुँचकर मिलने वाला सुकून बदल गया।
जब दुनिया बहुत कठोर लगती है,
मुझे तुम्हारी नरम बातों की कमी सबसे ज़्यादा महसूस होती है।
माँ,
तुम्हारी याद में दर्द तो है,
लेकिन उससे भी ज़्यादा
तुम्हारे प्रेम के लिए गहरा आभार है।
माँ,
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने लोगों से बातें करना सीखा,
पर मन की बात कहना कम हो गया।
अब कोई मेरी थकान को देखकर
बिना पूछे पानी नहीं लाता,
और यही छोटी-सी बात बहुत बड़ी लगती है।
माँ,
तुम्हारी कमी हर समय महसूस नहीं होती,
लेकिन जब होती है,
तो पूरा दिन तुम्हारे नाम हो जाता है।
कुछ यादें ऐसी होती हैं
जो समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं,
तुम्हारा स्नेह उनमें से एक है।
माँ,
अब जब जीवन में कोई अच्छी खबर मिलती है,
खुशी से पहले तुम्हारी याद आ जाती है।
तुम्हारे बाद समझ आया
कि कुछ लोग घर में नहीं रहते,
घर उन्हीं से बना होता है।
माँ,
तुम्हारी आवाज़ भूली नहीं है,
वह आज भी यादों में उतनी ही साफ़ सुनाई देती है।
जब कभी मन बहुत बेचैन होता है,
तो तुम्हारी पुरानी बातें
मरहम की तरह याद आती हैं।
माँ,
तुम्हारे न होने का दुख
किसी एक दिन का नहीं,
जीवन के कई छोटे-छोटे पलों का है।
आज भी अनजाने में
तुम्हें पुकारने का मन करता है,
फिर याद आता है कि जवाब नहीं आएगा।
माँ,
तुम्हारी परवाह की आदत
आज भी छूटी नहीं,
बस उसका एहसास यादों से आता है।
कुछ खाली जगहें
कभी भरने के लिए नहीं होतीं,
वे सिर्फ़ हमें किसी की अहमियत याद दिलाती हैं।
माँ,
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने मुस्कुराना नहीं छोड़ा,
लेकिन बेफ़िक्र होना छूट गया।
जब भी किसी बच्चे को उसकी माँ के साथ देखता हूँ,
दिल चुपचाप तुम्हारे पास चला जाता है।
माँ,
तुम्हारी याद अब सिर्फ़ दर्द नहीं,
मेरे जीवन की सबसे कीमती विरासत है।
माँ,
तुम्हारे जाने के बाद
बहुत लोगों का साथ मिला,
पर वह अपनापन फिर कहीं नहीं मिला।
अब घर में सब कुछ वैसा ही है,
बस तुम्हारी आवाज़ नहीं,
और यही सबसे बड़ा बदलाव है।
माँ,
तुम्हारी कमी का एहसास
अक्सर उन पलों में होता है
जब दिल खुश होता है और तुम्हें बताना चाहता है।
समय ने दर्द को शांत कर दिया,
लेकिन तुम्हारी याद को कभी कम नहीं किया।
माँ,
तुम्हारे बिना जीवन चल तो रहा है,
पर कई बार जीने और निभाने का फर्क महसूस होता है।
आज भी जब कोई मेरी तारीफ़ करता है,
दिल में सबसे पहले तुम्हारा चेहरा उभरता है।
माँ,
तुम्हारी गैरमौजूदगी ने यह सिखाया
कि कुछ रिश्तों की कीमत
उनके जाने के बाद और बढ़ जाती है।
कभी-कभी पुरानी बातों पर मुस्कुरा लेता हूँ,
और उसी मुस्कान में तुम्हारी कमी भी छिपी होती है।
माँ,
अब कोई मेरे मन का हाल
इतनी आसानी से नहीं पढ़ पाता
जितना तुम पढ़ लिया करती थीं।
तुम्हारे बाद समझ आया
कि परवाह का कोई विकल्प नहीं होता।
माँ,
तुम्हारी यादें सिर्फ़ अतीत नहीं,
आज भी मेरे जीवन का सहारा हैं।
जब भी किसी मुश्किल में घिरता हूँ,
अनजाने में तुम्हारी कही हुई बातें याद आने लगती हैं।
माँ,
तुम्हारे बिना सबसे ज़्यादा
तुम्हारा “मैं हूँ ना” याद आता है।
कुछ कमी ऐसी होती है
जो जीवन का हिस्सा बन जाती है,
तुम्हारी कमी मेरे लिए वैसी ही है।
माँ,
तुम चली गई हो,
पर तुम्हारा प्यार अब भी मेरे दिनों को
थोड़ा आसान बना देता है।
माँ,
तुम्हारे जाने के बाद समझ आया,
घर में सबसे ज़रूरी चीज़ सामान नहीं,
तुम्हारा होना था।
अब कोई मेरा इंतज़ार वैसे नहीं करता,
जैसे तुम दरवाज़े की आहट से पहचान लिया करती थीं।
माँ,
तुम्हारी कमी हर दिन नहीं सताती,
लेकिन जब सताती है,
तो दिल बहुत देर तक चुप रहता है।
जीवन में सब कुछ मौजूद है,
बस वह एक आवाज़ नहीं,
जो पूछती थी — “खाना खाया?”
माँ,
तुम्हारे बिना जीना सीख लिया है,
पर तुम्हारे बिना रहना आज भी नहीं सीखा।
अब जब कोई परेशानी आती है,
सब समाधान ढूँढ़ते हैं,
मेरा मन तुम्हें ढूँढ़ता है।
माँ,
तुम्हारी याद का सबसे कठिन हिस्सा
तुम्हारा न होना नहीं,
तुम्हारे बिना आदतों का जीना है।
कुछ खालीपन ऐसे होते हैं
जो समय नहीं भरता,
माँ की जगह उनमें सबसे ऊपर होती है।
माँ,
तुम्हारे बाद समझ आया
कि सुकून भी एक इंसान हो सकता है।
आज भी किसी खुशी पर
सबको बताने का मन नहीं करता,
बस तुम्हें याद करने का मन करता है।
माँ,
तुम्हारी गैरमौजूदगी ने मुझे मज़बूत तो बना दिया,
लेकिन पहले जैसा निश्चिंत नहीं रहने दिया।
तुम्हारे हाथों की वह साधारण-सी परवाह,
आज जीवन की सबसे अनमोल याद लगती है।
माँ,
अब कोई डाँटता नहीं,
और यही बात कई बार बहुत रुला देती है।
जब भी थककर बैठता हूँ,
याद आता है कि कभी एक जगह थी
जहाँ थकान अपने आप उतर जाती थी।
माँ,
तुम्हारी कमी दुख की तरह नहीं,
एक अधूरी दुआ की तरह साथ रहती है।