तुम्हारे जाने के बाद समझ आया,
घर सिर्फ़ ईंटों और कमरों से नहीं बनता,
एक माँ की मौजूदगी भी छत की तरह होती है,
जो दिखाई कम देती है, मगर सबको ढँककर रखती है।
अलमारी में रखी तुम्हारी पुरानी साड़ी से आज भी एक अपनापन आता है,
जैसे कपड़े नहीं,
तुम्हारी हथेलियों की गर्माहट तह करके रख दी गई हो।
पहले जब बुखार आता था,
दवा से पहले तुम्हारा माथे पर रखा हाथ असर करता था,
अब दवाइयाँ तो मिल जाती हैं,
वह यक़ीन कहीं नहीं मिलता माँ।
कभी-कभी रसोई से कोई खुशबू आती है,
और मैं अनजाने में तुम्हें पुकार देता हूँ,
फिर याद आता है,
कुछ आवाज़ें अब सिर्फ़ दिल तक ही पहुँचती हैं।
तुम्हें लगता था मैं बड़ा हो गया हूँ,
और मुझे लगता था तुम हमेशा साथ रहोगी,
हम दोनों ही अपनी-अपनी जगह थोड़ा ग़लत थे माँ।
आज जब अपने बच्चों को समझाता हूँ,
तब तुम्हारे कई पुराने वाक्य याद आते हैं,
जिन्हें कभी मैं ज़िद समझता था,
वे तो अनुभव की छाँव निकले।
तुमने कभी अपने त्याग का हिसाब नहीं रखा,
और हमने कभी पूछा नहीं,
अब यादों के पन्ने पलटता हूँ,
तो हर पन्ने पर तुम्हारा ही हिस्सा मिलता है।
घर में सब कुछ वैसा ही है,
घड़ी भी उसी समय चलती है,
मगर तुम्हारे बिना समय का अर्थ बदल गया है माँ।
तुम्हारी उँगली पकड़कर चलने वाला बच्चा,
आज भी कहीं अंदर मौजूद है,
फ़र्क़ बस इतना है,
अब रास्ते लंबे हैं और उँगली साथ नहीं है।
जब-जब कोई मेरी चिंता करता है,
दिल तुम्हारी तरफ़ चला जाता है,
क्योंकि दुनिया की हर फ़िक्र में,
मैं तुम्हारी फ़िक्र का अक्स ढूँढ़ता हूँ।
बहुत सी बातें थीं जो कहनी थीं,
पर हमेशा लगा समय है,
ज़िंदगी ने सिखा दिया,
कुछ रिश्तों में देर सबसे भारी पछतावा बन जाती है।
तुम्हारे कमरे की ख़ामोशी में भी एक आवाज़ रहती है,
जो कहती है—
"थक गए हो तो थोड़ा बैठ जाओ,"
और मैं फिर कुछ देर वहीं ठहर जाता हूँ माँ।
तुमने हमें उड़ना सिखाया,
मगर खुद कभी अपने लिए आसमान नहीं माँगा,
अब समझ आता है,
माँएँ अक्सर अपने सपनों को बच्चों के नाम कर देती हैं।
दुनिया की भीड़ में जब बहुत अकेलापन लगता है,
तो तुम्हारी कही छोटी-छोटी बातें याद आती हैं,
जिन्होंने उस वक़्त असर नहीं किया,
मगर उम्र भर का सहारा बन गईं।
कई बार आईने में अपने चेहरे को देखता हूँ,
और उसमें तुम्हारी झलक मिल जाती है,
तब लगता है,
तुम गई नहीं हो पूरी तरह,
थोड़ा-थोड़ा मुझमें आज भी रहती हो माँ।
तुम्हारी दुआओँ का असर शायद आज भी बाकी है,
वरना इतने टूटने के बाद भी
हर सुबह उठकर मुस्कुरा लेने की वजह
मुझे और कहाँ से मिलती माँ।
जब भी घर जाता हूँ, एक आदत आज भी वैसी ही मिलती है,
दरवाज़ा तो अब मैं खुद खोल लेता हूँ,
पर मन कुछ पल ठहरकर फिर भी तुम्हें ही ढूँढ़ता है माँ।
बचपन में गिरता था तो घुटने छिलते थे,
अब ज़िंदगी ठोकर देती है तो दिल थक जाता है,
तब तुम्हारा हाथ पकड़ लेता था,
अब यादों का सहारा लेकर संभलता हूँ माँ।
तुमने कभी अपने हिस्से की थकान नहीं बताई,
बस हमारी ज़रूरतें गिनती रहीं,
आज जब अपने कंधों पर ज़िम्मेदारियाँ उठाता हूँ,
तब समझ आता है कि तुम मुस्कुराकर कितना बोझ छुपाती थीं माँ।
रसोई में अब भी वही बर्तन हैं,
वही चूल्हा, वही दीवारें,
बस एक फ़र्क़ है—
खाने में नमक कम ज़्यादा हो जाए तो कोई नहीं कहता,
"लाओ, मैं ठीक कर देती हूँ बेटा।"
कई बार कुछ अच्छा होता है ज़िंदगी में,
और सबसे पहले तुम्हें बताने का मन करता है,
फिर अचानक याद आता है,
कुछ दूरियाँ फ़ोन से नहीं,
सिर्फ़ यादों से तय होती हैं माँ।
तुम्हारी डाँट भी अजीब नेमत थी,
उसमें फ़िक्र छुपी होती थी,
आज दुनिया बहुत नरमी से मिलती है,
फिर भी तुम्हारी एक सख़्त आवाज़ जितना अपनापन कहीं नहीं मिलता।
अब समझ आया है,
तुम हर रात हमारे सो जाने के बाद भी जागती क्यों थीं,
माँ होना शायद सोने से ज़्यादा,
हर पल किसी और के लिए जीना होता है।
तुम्हारी कमी सिर्फ़ एक इंसान की कमी नहीं,
जैसे घर का वह कोना खाली हो जाए
जहाँ बिना कुछ कहे भी सुकून मिल जाता था,
और फिर पूरी उम्र वही सुकून तलाशते रहो माँ।