Maa Ke Liye Shayari
माँ, तुमने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि घर चलाना कितना कठिन होता है, तुम हर परेशानी को मुस्कान के पीछे रख देती थीं, और हम बच्चों को सिर्फ़ सुकून दिखाई देता था।
जब मैं अपनी ज़िद पर अड़ा रहता था, तुम अक्सर चुप हो जाती थीं, तब लगता था कि मैं जीत गया, आज समझ आता है, कई बार तुमने रिश्ता बचाने के लिए बहस नहीं, प्रेम चुना था।
तुम्हारे पास मेरे हर सवाल का उत्तर नहीं था, फिर भी तुम सबसे भरोसेमंद थीं, क्योंकि तुम्हें हर बात जानना ज़रूरी नहीं था, तुम्हारा साथ होना ही आधी मुश्किल आसान कर देता था।
ज़िंदगी ने जब-जब मुझे लोगों की पहचान कराई, तब-तब तुम्हारी सीख याद आई, कि अच्छे कपड़ों से नहीं, अच्छे व्यवहार से इंसान की असली पहचान होती है, और यह बात उम्र के साथ और सच्ची लगने लगी।
अब कभी घर जाता हूँ, तो देखता हूँ कि तुम पहले जैसी तेज़ नहीं रहीं, मगर मेरे लिए तुम्हारी चिंता आज भी वैसी ही है, समय ने तुम्हारी उम्र बढ़ाई है, तुम्हारा अपनापन नहीं बदला।
माँ, तुम्हारे प्रेम की सबसे सुंदर बात यह नहीं कि तुमने मेरे लिए कितना किया, बल्कि यह है कि इतना सब करने के बाद भी तुमने कभी अपने हिस्से का श्रेय नहीं माँगा, बस मेरी मुस्कान देखकर संतुष्ट हो गईं।
माँ, जब मैं छोटा था तो तुम्हारा हाथ पकड़कर चलता था, आज मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ, पर सच यह है कि मेरी हिम्मत अब भी तुम्हारे विश्वास का सहारा लेकर चलती है।
तुमने कभी मुझे ऊँचा उड़ने से नहीं रोका, बस इतना सिखाया कि ऊँचाई चाहे जितनी मिले, ज़मीन से रिश्ता नहीं टूटना चाहिए, यही वजह है कि हर सफलता के बाद सबसे पहले तुम्हारी याद आती है।
मुझे आज भी वह शामें याद हैं, जब तुम दरवाज़े पर खड़ी मेरा इंतज़ार करती थीं, तब समझ नहीं था कि इंतज़ार क्या होता है, अब किसी अपने की राह देखते हुए तुम्हारी बेचैनी का थोड़ा-सा अर्थ समझ पाता हूँ।
तुम्हारी डाँट भी अजीब थी, उसमें नाराज़गी कम और चिंता ज़्यादा होती थी, तुम मुझे बदलना नहीं चाहती थीं, बस मुझे किसी ग़लत राह से बचाना चाहती थीं।
समय के साथ बहुत से चेहरे बदले, बहुत से रिश्तों के रंग भी बदले, लेकिन तुम्हारा अपनापन वैसा ही रहा, जैसे बरसों पुरानी वह रोशनी जो कभी तेज़ तो कभी धीमी हो सकती है, मगर बुझती नहीं।
माँ, अगर मुझसे पूछा जाए कि सुरक्षा कैसी लगती है, तो मैं किसी जगह का नाम नहीं लूँगा, मैं बस तुम्हारे पास बैठी हुई उन ख़ामोश शामों को याद करूँगा, जहाँ बिना कुछ कहे भी सब कुछ ठीक लगने लगता था।
माँ, जब भी ज़िंदगी मुझे बहुत समझदार होने का एहसास दिलाती है, तुमसे बात होते ही पता चल जाता है, कि मेरे भीतर अब भी एक बच्चा रहता है, जो सबसे पहले तुम्हें ही अपनी बात बताना चाहता है।
तुमने मेरे लिए जो किया, उसकी याद किसी एक घटना में नहीं समाती, वह तो मेरी आदतों में बसा हुआ है, किसी की मदद करना, बड़ों का सम्मान करना, गलत होकर भी सच स्वीकार लेना— इन सबमें कहीं न कहीं तुम मौजूद हो।
मुझे नहीं पता तुम्हारी कितनी इच्छाएँ घर की ज़रूरतों के पीछे छूट गई होंगी, मगर इतना जानता हूँ, मेरी कई खुशियों की नींव तुम्हारे अनकहे समझौतों पर रखी गई थी।
बचपन में लगता था, तुम हर बात पर चिंता क्यों करती हो, आज जब अपने लोगों की फ़िक्र होने लगी है, तो समझ आया, प्रेम अक्सर सवालों में नहीं, चिंताओं में दिखाई देता है।
तुम्हारे हाथों का बना साधारण-सा खाना भी किसी दावत से ज़्यादा याद आता है, शायद स्वाद सिर्फ मसालों में नहीं होता, उस अपनापन में भी होता है जो कोई अपनेपन से परोसता है।
माँ, दुनिया ने मुझे बहुत कुछ दिया है, लेकिन सुकून आज भी वहीं मिलता है, जहाँ फ़ोन उठाते ही दूसरी तरफ़ से तुम्हारी आवाज़ कहती है— "खाना खाया या नहीं?"
माँ, तुमने कभी यह नहीं पूछा कि मैं कितना बड़ा बनूँगा, तुम बस इतना चाहती थीं कि मैं अच्छा इंसान बनूँ, आज जो लोग मेरे व्यवहार की तारीफ़ करते हैं, उसमें मेरी नहीं, तुम्हारी परवरिश बोलती है।
मुझे याद है, जब मैं हारकर चुप बैठ जाता था, तुम समाधान नहीं देती थीं, बस इतना कहती थीं, "फिर से कोशिश कर", और न जाने क्यों, तुम्हारे कहने भर से मुश्किल छोटी लगने लगती थी।
तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी शायद यही है, कि तुमने अपने प्रेम का कभी एहसान नहीं जताया, तुमने दिया भी चुपचाप, और संभाला भी चुपचाप, जैसे मेरा सुख ही तुम्हारी सबसे प्रिय ख़बर हो।
अब समझ आता है, घर की रौनक सामान से नहीं आती, किसी अपने की मौजूदगी से आती है, और हमारे घर में वह मौजूदगी हमेशा तुम थीं, जो हर कोने को अपनापन दे जाती थीं।
माँ, मैं तुम्हारा कर्ज़ चुकाने की बात नहीं करता, क्योंकि कुछ रिश्ते हिसाब के लिए नहीं होते, बस इतना चाहता हूँ, कि जिस तरह तुमने हर मोड़ पर मेरा हाथ थामा, वैसे ही मेरी मोहब्बत और सम्मान हमेशा तुम्हारे साथ रहें।
कभी-कभी तुम्हें देखकर लगता है, सबसे मज़बूत लोग शोर नहीं करते, वे बस अपने परिवार के लिए खड़े रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे तुम रही, हर तूफ़ान के बीच एक शांत भरोसे की तरह।