तुमने कभी हमारे सामने
अपने अधूरे सपनों की बात नहीं की,
बस हमारे सपनों को पूरा करने में
अपनी पूरी उम्र लगा दी माँ।
जब हम त्योहारों पर नए कपड़ों में खुश होते थे,
तब कभी ध्यान नहीं दिया,
कि कई बार तुम्हारी खुशी
हमारी मुस्कान पहनकर ही पूरी हो जाती थी।
तुम्हारे हिस्से की कितनी आरामभरी दोपहरें
रसोई और ज़िम्मेदारियों में बीत गईं,
और हमने उसे फ़र्ज़ समझ लिया,
जबकि वह प्रेम का सबसे सच्चा रूप था माँ।
बचपन में जब भी कुछ माँगा,
तुमने यह नहीं बताया
कि उसे पूरा करने के लिए
तुम्हें क्या-क्या छोड़ना पड़ा होगा।
तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त यह थी
कि तुमने कठिनाइयों को शिकायत नहीं बनने दिया,
उन्हें चुपचाप प्रेम में बदलकर
हमारे जीवन को आसान बना दिया माँ।
जब हम बीमार पड़ते थे,
तुम्हारी रातें छोटी हो जाती थीं,
और हमारी नींद पूरी,
आज समझ आता है,
तुम्हारा त्याग हमारी सेहत की रखवाली करता था।
तुमने कभी अपने दुखों का बोझ
हमारे कंधों पर नहीं रखा,
बल्कि हमारे बोझ अपने हिस्से में जोड़ लिए,
यही तुम्हारे प्रेम की गहराई थी माँ।
आज जब किसी ज़िम्मेदारी से थक जाता हूँ,
तो तुम्हारी याद आती है,
तुमने तो बिना रुके वर्षों तक
पूरे परिवार की दुनिया संभाली थी।
तुम्हारी कुरबानी केवल मेहनत नहीं थी,
वह हर दिन किया गया एक चुनाव था,
जहाँ तुमने खुद से पहले
हमारी ज़रूरतों को रखा माँ।
हमने तुम्हें अक्सर रसोई में देखा,
पर देर से समझे,
कि तुम केवल खाना नहीं बना रही थीं,
तुम घर के रिश्तों को भी गर्माहट दे रही थीं।
तुमने अपनी परेशानियों को
हमारी पढ़ाई के बीच कभी नहीं आने दिया,
हम किताबों में भविष्य पढ़ते रहे,
और तुम हमारे भविष्य के लिए संघर्ष करती रहीं माँ।
कई बार तुम्हें आराम की ज़रूरत रही होगी,
मगर तुमने पहले हमारा हाल पूछा,
तुम्हारी यही आदत बताती है
कि माँ होना कितना निस्वार्थ होता है।
तुम्हारे त्याग का मूल्य
किसी उपहार या शब्द से नहीं चुकाया जा सकता,
क्योंकि तुमने जो दिया,
वह वस्तुओं से नहीं, जीवन से जुड़ा था माँ।
जब उम्र बढ़ी,
तो तुम्हारे हाथों की झुर्रियाँ दिखाई देने लगीं,
और हर रेखा में
सालों का समर्पण पढ़ा जा सकता था।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो मेरी हर सुविधा के पीछे
तुम्हारी कोई न कोई अनदेखी कुरबानी खड़ी दिखाई देती है,
और दिल सम्मान से भर जाता है माँ।
तुमने कभी यह नहीं कहा
कि तुम्हें भी कुछ चाहिए,
बस हमारी ज़रूरतों की सूची लंबी होती गई,
और तुम्हारी इच्छाएँ चुपचाप छोटी होती गईं माँ।
बचपन में लगता था
सब कुछ अपने आप मिल जाता है,
बड़े होकर समझ आया,
हर सुविधा के पीछे तुम्हारा कोई अधूरा सपना खड़ा था।
तुम्हारे पास शायद अपने लिए समय कम था,
फिर भी हमारे हर छोटे काम के लिए
तुम्हारे पास हमेशा वक़्त निकल आता था,
यही तुम्हारे प्रेम की सबसे बड़ी मिसाल है माँ।
जब हम नई चीज़ों की ज़िद करते थे,
तुम मुस्कुराकर पूरी करने की कोशिश करती थीं,
आज समझ आता है,
कई बार तुमने अपनी पसंद टालकर हमारी खुशी चुनी थी।
तुमने अपने संघर्षों को
कभी परिवार की दीवारों तक नहीं आने दिया,
हम चैन से सोते रहे,
और तुम ज़िम्मेदारियों के साथ जागती रहीं माँ।
कई वर्षों बाद जब घर के ख़र्च समझ आने लगे,
तब एहसास हुआ,
तुम्हारी बचत केवल पैसों की नहीं,
अपनी इच्छाओं की भी होती थी।
तुमने हमें अच्छे विद्यालय भेजने के लिए
कितनी बार अपने लिए कुछ नहीं खरीदा होगा,
उस समय हम किताबें देख रहे थे,
और तुम भविष्य देख रही थीं माँ।
तुम्हारी थकान का कोई हिसाब नहीं रखा गया,
क्योंकि तुमने कभी शिकायत नहीं की,
मगर आज हर छोटी सुविधा में
तुम्हारी मेहनत का अक्स दिखाई देता है।
जब हम अपने सपनों के पीछे भाग रहे थे,
तुम हमारे साथ दौड़ रही थीं,
फ़र्क़ बस इतना था,
हम मंज़िल देख रहे थे और तुम हमारी राह।
तुमने कभी अपने त्याग को उपकार नहीं बनाया,
यही बात उसे और बड़ा बना देती है,
क्योंकि सच्चा समर्पण अक्सर
ख़ामोशी में ही अपना परिचय देता है माँ।
आज जब अपने लिए कोई चीज़ खरीदता हूँ,
तो कई बार तुम्हारी याद आती है,
सोचता हूँ,
तुमने कितनी बार अपने लिए यह ख़ुशी टाल दी होगी।
तुम्हारी सबसे बड़ी कुरबानी शायद यह नहीं थी
कि तुमने कितना सहा,
बल्कि यह थी कि हमें कभी महसूस नहीं होने दिया
कि तुम कितना सह रही हो माँ।
घर की हर उपलब्धि में
तुम्हारा एक अनदेखा हिस्सा शामिल है,
क्योंकि जो नींव दिखाई नहीं देती,
वही पूरी इमारत को संभाले रखती है।
बचपन में तुम्हारा त्याग प्रेम लगता था,
आज समझ आता है,
वह प्रेम के साथ-साथ
असीम धैर्य और साहस भी था माँ।
अगर जीवन में किसी के सामने सिर झुकाना हो,
तो सबसे पहले तुम्हारे सामने झुकेगा,
क्योंकि मेरी हर उपलब्धि में
तुम्हारी अनगिनत अनकही कुरबानियाँ शामिल हैं माँ।