Maa Ki Mamta Shayari
माँ, तुम्हारी ममता का रंग कुछ ऐसा था, कि बचपन की हर याद में कहीं न कहीं तुम्हारा स्पर्श शामिल है, जैसे तुमने मेरे दिनों को अपने स्नेह से सींचा हो।
जब मैं खाने में नखरे करता था, तुम कभी नाराज़ नहीं होती थीं, बस कोई नया तरीका ढूँढ़ लेती थीं, ताकि मैं खा लूँ, आज समझ आता है, ममता हार मानना नहीं जानती।
तुम्हारी गोद में बैठकर मैंने दुनिया को सुरक्षित माना, क्योंकि मेरे लिए सुरक्षा का पहला अर्थ तुम्हारी बाँहों से शुरू होता था।
माँ, तुम्हारा हाथ सिर पर होना किसी आशीर्वाद से कम नहीं लगता था, उस एक स्पर्श में इतना भरोसा होता था कि डर अपने आप छोटा हो जाता था।
जब मैं उदास होता था, तुम हमेशा कारण नहीं पूछती थीं, कभी-कभी बस पास बैठ जाती थीं, और वह साथ किसी भी समझाइश से ज़्यादा असर करता था।
तुम्हारी ममता की खूबी यह थी कि वह मेरी कमियों से नहीं घबराई, उसने मुझे बदलने की जल्दबाज़ी नहीं की, बस मुझे बेहतर बनने का समय दिया।
माँ, तुमने मेरे बचपन को सिर्फ़ बड़ा नहीं किया, उसे सुंदर भी बनाया, ताकि आज याद करूँ तो मुस्कुराहट भी आए और सुकून भी।
जब मैं रात को देर तक पढ़ता था, तुम भी पूरी तरह नहीं सोती थीं, जैसे मेरी मेहनत में तुम्हारी चिंता भी शामिल हो।
तुम्हारे लिए मेरा दुख कभी छोटा नहीं था, चाहे वह टूटा हुआ खिलौना हो या टूटा हुआ मन, तुम दोनों को बराबर गंभीरता से देखती थीं।
माँ, तुम्हारी ममता ने मुझे यह सिखाया कि प्रेम का मतलब सिर्फ़ साथ होना नहीं, किसी की परवाह को अपनी आदत बना लेना भी है।
जब कभी मैं बीमार पड़ता, तुम्हारे चेहरे की बेचैनी दवा से पहले दिखाई देती थी, और वही बेचैनी मेरे लिए सबसे बड़ी देखभाल थी।
तुम्हारे हाथों का सहलाना, तुम्हारा माथा चूमना, तुम्हारा बिना वजह हाल पूछना, इन सबने मिलकर ममता का अर्थ समझाया।
माँ, तुमने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं दुनिया में अकेला हूँ, क्योंकि तुम्हारा स्नेह हर परिस्थिति में मेरे साथ खड़ा रहा।
आज भी जब बहुत थक जाता हूँ, तो मन अनजाने में उसी सुकून को ढूँढ़ता है जो बचपन में तुम्हारी गोद में मिला करता था।
माँ, तुम्हारी ममता किसी कहानी का हिस्सा नहीं, मेरे पूरे जीवन की पृष्ठभूमि है, जो हर खुशी को गहरा, हर दुख को हल्का, और हर दिन को थोड़ा बेहतर बना देती है।
माँ, जब मैं छोटा था, तुम मेरे बालों में उँगलियाँ फेरती रहती थीं, और मैं निश्चिंत होकर सो जाता था, आज समझता हूँ, नींद मुझे थकान से नहीं, तुम्हारी ममता से आती थी।
तुम्हारी आदत थी मेरी प्लेट में अपनी पसंद की चीज़ रख देना, और अपनी पसंद को चुपचाप किनारे कर देना, तब यह छोटी बात लगती थी, आज उसमें छुपा प्रेम दिखाई देता है।
माँ, तुम्हारी ममता ने कभी यह नहीं पूछा कि मैं कितना योग्य हूँ, उसने बस मुझे अपना समझा, और यही अपनापन मेरे जीवन की सबसे बड़ी ताक़त बना।
जब मुझे बुखार होता था, तुम बार-बार माथा छूकर देखती थीं, जैसे तापमान नहीं, मेरी तकलीफ़ माप रही हो।
तुम्हारे पास बैठना किसी समस्या का हल ढूँढ़ना नहीं था, वह तो बस इतना था कि तुम्हारे पास बैठकर मन को घर जैसा महसूस होता था।
माँ, तुम्हारी ममता का एक रूप यह भी था कि तुम मेरी कही हुई बातों से ज़्यादा अनकही बातों को समझ लेती थीं, और यही समझ सबसे गहरा सहारा बन जाती थी।
जब मैं पहली बार गिरा था, तुमने मुझे उठाया, और जब पहली बार जीवन में हारा, तब भी तुमने ही संभाला, बस तरीक़े बदल गए थे।
तुम्हारा प्रेम कभी किसी शर्त पर नहीं टिका, न अच्छे अंकों पर, न बड़ी उपलब्धियों पर, तुम्हारी नज़र में मैं हमेशा तुम्हारा बच्चा था।
माँ, तुम्हारी चिंता कभी दख़ल नहीं लगी, क्योंकि उसमें नियंत्रण नहीं, सिर्फ़ सुरक्षा का भाव था।
जब मैं स्कूल से लौटता था, तुम्हारा दरवाज़े पर मिलना एक साधारण दृश्य था, लेकिन आज लगता है, वह मेरे दिन का सबसे सुंदर हिस्सा था।
तुम्हारी ममता ने मुझे सिर्फ़ सुरक्षित नहीं रखा, उसने मुझे दयालु भी बनाया, ताकि मैं दूसरों के दर्द को समझ सकूँ।
माँ, तुम्हारे हाथों से खिलाया हुआ निवाला आज भी याद है, क्योंकि उसमें स्वाद से पहले अपनापन मिला करता था।
जब कभी दुनिया बहुत कठोर लगती है, तो तुम्हारी याद एक मुलायम एहसास बनकर आती है, जैसे किसी ने सिर पर हाथ रख दिया हो।
तुमने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अकेला हूँ, और शायद यही ममता की सबसे बड़ी शक्ति है, वह बिना शोर किए हिम्मत बन जाती है।
माँ, अगर जीवन की सबसे कोमल चीज़ का नाम पूछो, तो मैं तुम्हारी ममता कहूँगा, क्योंकि उसमें प्रेम भी था, सुरक्षा भी, त्याग भी, और सबसे बढ़कर एक ऐसा अपनापन था जो आज तक मेरे साथ चल रहा है।
माँ, तुम्हारी ममता का एहसास किसी बड़े अवसर पर नहीं, उन साधारण दिनों में सबसे ज़्यादा हुआ, जब तुम बिना कहे मेरी हर छोटी ज़रूरत का ध्यान रखती थीं।
जब मैं खेलते-खेलते थक जाता था, तुम्हारे पास आकर बैठ जाता था, न जाने क्यों, तुम्हारे पास बैठना ही आराम जैसा लगता था।
माँ, तुम्हारी गोद में कोई जादू नहीं था, फिर भी वहाँ पहुँचते ही डर छोटे लगने लगते थे, और मन को यक़ीन हो जाता था कि सब ठीक हो जाएगा।
तुम्हारी ममता का सबसे सुंदर रूप तुम्हारी चिंता में दिखाई देता था, तुम बार-बार पूछती थीं, "कुछ खाया या नहीं?" और उस साधारण सवाल में बहुत सारा प्रेम छुपा होता था।
जब मैं बीमार पड़ता था, तुम्हारी बेचैनी देखकर लगता था जैसे दर्द मुझे नहीं, तुम्हें हो रहा हो, और यही ममता की सबसे सच्ची पहचान है।
माँ, तुमने मुझे कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया, यहाँ तक कि उन दिनों भी जब मैं खुद को नहीं समझ पाता था, तुम्हारा स्नेह मेरे साथ खड़ा रहता था।
तुम्हारे हाथों का स्पर्श सिर्फ़ एक स्पर्श नहीं था, वह एक भरोसा था कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं सुरक्षित हूँ।
बचपन में समझ नहीं पाया कि तुम हर बात पर इतना ध्यान क्यों देती हो, आज जब अपने लोगों की चिंता होती है, तो तुम्हारी ममता और गहराई से समझ आती है।
माँ, तुम्हारा प्रेम शोर नहीं करता था, वह चुपचाप मेरे दिनों में बसा रहता था, ठीक वैसे ही जैसे घर में फैली हुई वह गर्माहट जिसका एहसास हमेशा रहता है।
जब मैं हारकर लौटता था, तुम मेरी हार नहीं देखती थीं, तुम बस यह देखती थीं कि मैं कितना दुखी हूँ, और तुम्हारी वही नज़र मुझे फिर से संभाल लेती थी।
तुम्हारी ममता ने मुझे सिर्फ़ प्यार नहीं दिया, उसने मुझे यह विश्वास भी दिया कि दुनिया कितनी भी कठिन क्यों न हो, कहीं न कहीं मेरा एक सुरक्षित ठिकाना है।
माँ, तुम्हारे लिए मैं कभी बड़ा नहीं हुआ, और शायद यही ममता की खूबी है, वह उम्र नहीं देखती, सिर्फ़ अपना बच्चा देखती है।
जब कभी मन बहुत थक जाता है, तो बचपन की याद आती है, जहाँ तुम्हारी गोद थी, तुम्हारा हाथ था, और सारी चिंताएँ बहुत छोटी थीं।
तुम्हारी ममता किसी एक दिन की नहीं थी, वह हर दिन मेरे साथ रही, मेरी मुस्कान में, मेरी गलतियों में, मेरी सफलताओं में, और मेरी कमज़ोरियों में भी।
माँ, अगर सुकून को किसी एहसास में बदलना हो, तो वह तुम्हारी ममता होगी, क्योंकि मैंने जीवन में सबसे निस्वार्थ अपनापन तुम्हारे ही प्रेम में महसूस किया है।