तुमसे बात करने के बहाने आज भी मन ढूँढ़ लेता है,
मगर हर बहाने को सच बनाना अब नहीं चाहता।
तुम्हारे करीब आने की इच्छा अपनी जगह है,
पर तुम्हारी सहजता उससे कहीं ज्यादा जरूरी है।
तुम्हारी एक छोटी-सी परवाह कई दिनों तक याद रहती है,
क्योंकि मेरा मन उसमें वह अर्थ पढ़ लेता है जो शायद तुमने रखा ही नहीं।
अब दिल को समझाना सीख रहा हूँ,
हर खूबसूरत व्यवहार मेरे लिए लिखा हुआ संकेत नहीं होता।
कभी लगता है, अपनी बात कह दूँ,
फिर डरता हूँ कि मेरे मन का बोझ तुम्हारे हिस्से क्यों आए।
इसलिए प्रेम को चुप रखा है,
ताकि तुम्हारी स्वतंत्रता पर मेरी चाहत का कोई दबाव न पड़े।
तुम्हें देखकर दिन अच्छा हो जाता है,
तुम्हें न देखकर दिन खराब नहीं होता।
शायद धीरे-धीरे यही संतुलन सीख रहा हूँ,
जहाँ किसी की मौजूदगी खुशी हो सकती है, जरूरत नहीं।
तुम्हारी खुशी की खबर सुनकर मन खिल उठता है,
हालाँकि कभी उसमें अपनी जगह न देखकर हल्की टीस भी होती है।
फिर खुद को याद दिलाता हूँ,
सच्ची चाहत में सामने वाले की खुशी के लिए जगह कम नहीं पड़नी चाहिए।
तुम्हारे साथ बिताए साधारण पल,
मेरे लिए अक्सर पूरे दिन की सबसे बड़ी याद बन जाते हैं।
तुम शायद उन्हें भूल भी जाओ,
पर मेरे मन ने उन्हें चुपचाप संभालकर रखा है।
मैंने तुम्हारी हर मुस्कान को अपना अधिकार नहीं माना,
न तुम्हारी हर बात में अपने लिए उम्मीद ढूँढ़ी।
तुम्हें चाहना मेरे मन की सच्चाई है,
तुम्हारा मुझे चाहना तुम्हारा अपना निर्णय।
कभी-कभी लगता है, शायद तुम समझते हो,
फिर तुम्हारी सामान्य-सी सहजता मुझे वास्तविकता याद दिला देती है।
मन थोड़ा उदास होता है,
पर कम से कम अब अपनी कल्पना को तुम्हारी इच्छा नहीं मानता।
तुमसे कुछ पाने की जिद नहीं,
बस जो भावना है उसे झूठ कहकर मिटाना भी नहीं आता।
शायद एकतरफ़ा प्रेम की यही मुश्किल है,
दिल को रोकना नहीं पड़ता, बस उसे मर्यादा में रखना पड़ता है।
अगर कभी यह चाहत पूरी तरह शांत हो जाए,
तो उसे हार नहीं मानूँगा।
मैंने तुम्हें सच्चे मन से चाहा था,
और किसी को बिना बाँधे चाह पाना भी अपने आप में एक सच्चा एहसास है।
तुम्हें चाहना मेरी रोज़ की कोई घोषणा नहीं,
बस दिन के बीच अचानक तुम्हारा ख्याल आ जाना है।
तुम्हें शायद इसकी खबर भी नहीं,
और मुझे अब इस बात की शिकायत भी नहीं।
तुम्हारी छोटी-सी बात को मैं देर तक याद रखता हूँ,
क्योंकि उसमें मुझे अपनापन महसूस होता है।
फिर खुद को समझाता हूँ,
हर अपनापन उस अर्थ में प्रेम नहीं होता जिसमें मेरा मन उसे देखता है।
कभी तुम्हें सब कुछ कह देने का मन करता है,
पर तुम्हारे चेहरे पर झिझक की कल्पना मुझे रोक देती है।
प्रेम अगर सच्चा है,
तो उसमें सामने वाले की सहजता के लिए भी जगह होनी चाहिए।
तुम्हारे पास होने पर कुछ कह नहीं पाता,
दूर होने पर बहुत कुछ मन में चलता रहता है।
शायद यही मेरी कहानी है,
तुम्हारे सामने खामोश और अपने भीतर तुम्हारे नाम से भरा हुआ।
मैंने तुम्हारी हर मुस्कान को अपना संकेत नहीं माना,
क्योंकि तुम्हारी खुशी को अपनी उम्मीदों से बाँधना ठीक नहीं।
तुम जैसे हो, वैसे ही खुश रहो,
मेरी चाहत को तुम्हारे चुनाव पर कोई अधिकार नहीं।
कभी-कभी तुम्हें किसी और के साथ सहज देखकर
मन में हल्की-सी टीस जरूर उठती है।
पर उस टीस को शिकायत नहीं बनने देता,
क्योंकि तुम्हें चाहना तुम्हें चुनने का अधिकार नहीं देता।
तुमसे मिलने के बाद मन अच्छा रहता है,
लेकिन अब उस खुशी के पीछे भविष्य की कल्पना नहीं जोड़ता।
कुछ पल जितने हैं,
उन्हें उतनी ही सच्चाई से जी लेना भी पर्याप्त है।
मैंने अपने मन की बात कहने में देर की,
शायद इसलिए कि खोने का डर, पाने की इच्छा से बड़ा था।
अब लगता है,
कभी-कभी चुप रहना भी अपने प्रेम और सामने वाले की मर्यादा दोनों को बचाता है।
तुम्हारी तरफ मेरा लगाव आज भी है,
पर अब उसके साथ एक समझ भी है।
हर सच्ची भावना का परिणाम रिश्ता नहीं होता,
कुछ प्रेम बस हमें अपने ही मन की गहराई दिखाकर चले जाते हैं।
शायद एक दिन तुम्हारा ख्याल आएगा,
और मन में कोई उम्मीद नहीं, बस एक शांत मुस्कान होगी।
तब समझूँगा,
मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था—बस तुम्हें चाहने से खुद को मुक्त करना सीख लिया।
तुम्हारे साथ बिताया हर छोटा पल मेरे लिए बड़ा था,
पर शायद तुम्हारे लिए वह बस दिन का एक हिस्सा था।
मैंने इसी फर्क को बहुत देर से समझा,
कि एक ही मुलाकात दो लोगों के मन में बराबर जगह नहीं बनाती।
तुम्हें देखने की खुशी मैंने कभी तुम पर जताई नहीं,
कहीं मेरी चाहत तुम्हारी सहजता पर भारी न पड़ जाए।
इसलिए जो कहना था, मन में रखा,
और तुम्हारी मौजूदगी को बिना किसी उम्मीद के महसूस करता रहा।
कभी तुम्हारी एक छोटी-सी बात पूरे दिन याद रहती है,
और तुम्हें शायद याद भी नहीं होता कि तुमने वह कब कही थी।
यही तो एकतरफ़ा प्रेम की चुप पीड़ा है,
एक के लिए साधारण पल, दूसरे के लिए पूरी स्मृति बन जाता है।
मैंने तुम्हारी हर मुस्कान में अपने लिए अर्थ नहीं खोजा,
क्योंकि तुम्हें अपनी कल्पनाओं का जवाब बनाना उचित नहीं लगा।
तुम्हारी भावनाएँ तुम्हारी अपनी हैं,
मेरी चाहत उन्हें बदलने का अधिकार नहीं रखती।
कभी लगता है कह दूँ कि तुम मेरे लिए कितने खास हो,
फिर डरता हूँ कि कहीं मेरी सच्चाई तुम्हें असहज न कर दे।
इसलिए प्रेम को शब्दों से ज्यादा,
अपने व्यवहार की मर्यादा में रखना सीखा है।
तुम्हारे पास होने की इच्छा आज भी है,
पर तुम्हारी दूरी का सम्मान भी उतना ही है।
शायद चाहत का सबसे परिपक्व रूप यही है,
कि मन किसी को चाहता रहे और फिर भी उसकी स्वतंत्रता को सबसे ऊपर रखे।
तुम्हारी खुशी की खबर सुनकर मन सच में खुश होता है,
हालाँकि कभी-कभी उसी खुशी में अपनी अनुपस्थिति चुभती है।
फिर भी तुम्हें कम खुश देखने की इच्छा नहीं,
क्योंकि मेरा प्रेम तुम्हारी खुशी से बड़ा नहीं हो सकता।
मैंने उम्मीदों को धीरे-धीरे छोटा कर लिया,
ताकि तुम्हारी हर सामान्य बात मेरे लिए संकेत न बन जाए।
अब तुमसे मिलना अच्छा लगता है,
पर मिलने के बाद अपने मन को किसी भविष्य की कहानी नहीं सुनाता।
शायद तुम्हें कभी पता ही न चले,
कि तुम्हारे नाम से जुड़ी कितनी बातें मैंने चुपचाप अपने भीतर रखीं।
पर अब उस अनकहे प्रेम से शिकायत भी नहीं,
कुछ भाव कहे न जाएँ तो भी अपनी सच्चाई नहीं खोते।
अगर कभी तुम्हें मेरी चाहत का एहसास हो,
तो उसे लौटाना तुम्हारी मजबूरी नहीं होगी।
मेरे लिए इतना ही काफी है,
कि मैंने किसी को चाहा भी तो उसकी इच्छा और अपनी गरिमा दोनों का सम्मान करते हुए।
तुम्हें देखकर मन में जो हलचल होती है,
उसे तुम्हारे सामने कभी आने नहीं दिया।
डर था कि मेरी एकतरफ़ा चाहत,
तुम्हारे लिए एक अनचाही जिम्मेदारी न बन जाए।
तुमसे बात का कोई खास कारण नहीं होता,
फिर भी बातचीत खत्म होने के बाद देर तक मुस्कुराता हूँ।
तुम्हारे लिए वह एक सामान्य पल होगा,
मेरे लिए पूरे दिन की सबसे याद रहने वाली बात।
मैंने तुम्हारी हर छोटी परवाह को प्रेम नहीं समझा,
क्योंकि मन की उम्मीद और सच के बीच फर्क जानता हूँ।
फिर भी सच यह है,
तुम्हारी थोड़ी-सी जगह ने मेरे भीतर बहुत जगह बना ली।
कभी मन करता है सब कह दूँ,
फिर तुम्हारी सहजता का ख्याल आ जाता है।
मेरी चाहत सच्ची है,
इसलिए तुम्हारी इच्छा का सम्मान करना भी उसी प्रेम का हिस्सा है।
तुम्हें पाने की कोई जिद नहीं,
बस तुम्हें देखकर मन का अच्छा हो जाना अभी बाकी है।
शायद यही अधूरापन है,
जिसमें इंसान पास आने की इच्छा रखते हुए भी दूरी की मर्यादा समझता है।
तुम्हारे साथ बिताए छोटे-छोटे पल,
मेरी यादों में जरूरत से ज्यादा देर ठहरते हैं।
तुम उन्हें भूल जाते हो,
और मैं उन्हें अपनी चुप्पी में फिर से जी लेता हूँ।
कभी तुम्हारे किसी और के साथ खुश होने की कल्पना करता हूँ,
तो मन में हल्की-सी टीस उठती है।
फिर खुद को याद दिलाता हूँ,
तुम्हारी खुशी पर मेरा अधिकार नहीं, मेरी बस सच्ची शुभकामना हो सकती है।
मैंने तुम्हारी ओर बढ़ना इसलिए नहीं रोका कि प्रेम कम हो गया,
बस समझ गया कि हर चाहत को रिश्ता बनना जरूरी नहीं।
कुछ भाव हमारे अपने होते हैं,
उन्हें किसी के उत्तर की शर्त पर रखना भी उचित नहीं।
तुम्हें शायद कभी पता न चले,
कि तुम्हारी एक मुस्कान ने मेरे कितने साधारण दिनों को संभाला है।
यह बात कहने की इच्छा आज भी है,
मगर तुम्हें असहज करने से बेहतर मुझे चुप रहना लगता है।
अब उम्मीद से ज्यादा स्वीकार है,
फिर भी कभी मन तुम्हारे नाम पर ठहर जाता है।
शायद दिल को पूरी तरह समझ आने में समय लगता है,
कि सच्चा प्रेम हमेशा साथ पाने की कहानी नहीं होता।
अगर कभी मेरे मन की बात तुम्हें समझ आए,
तो उसे अपने ऊपर कोई ऋण मत समझना।
मैंने तुम्हें चाहा था,
क्योंकि मन ने चाहा—तुम्हें कुछ लौटाना ही होगा, ऐसा कभी नहीं सोचा।
तुमसे कुछ माँगना कभी चाहा ही नहीं,
बस मन ने चुपचाप तुम्हें अपना मान लिया था।
तुम्हें खबर भी नहीं हुई,
और मेरे भीतर तुम्हारे नाम का एक पूरा संसार बन गया।
तुमसे बात होती है तो दिन थोड़ा अच्छा लगता है,
न हो तो जिंदगी फिर भी चलती रहती है।
शायद यही एकतरफ़ा चाहत है,
जहाँ खुशी मिलती है, मगर उसका कारण बताने का अधिकार नहीं होता।
कभी तुम्हारी छोटी-सी परवाह को बहुत देर तक याद रखता हूँ,
फिर खुद ही समझाता हूँ कि हर अपनापन प्रेम नहीं होता।
दिल अपनी उम्मीदें बनाता रहा,
और समझ उन्हें धीरे-धीरे समेटती रही।
तुम्हारे करीब होकर भी अपनी बात कह नहीं पाया,
डर था कि मेरे शब्द तुम्हारी सहजता छीन न लें।
इसलिए प्रेम को अपने भीतर ही रखा,
तुम्हें चाहा जरूर, मगर तुम्हारी पसंद पर कोई दावा नहीं किया।
कभी लगता है, शायद तुम्हें भी कुछ महसूस होता हो,
फिर तुम्हारी सहजता देखकर अपनी कल्पना पर मुस्कुरा देता हूँ।
कुछ उम्मीदें खूबसूरत होती हैं,
बस उन्हें सच मान लेने से पहले वास्तविकता को भी सुनना पड़ता है।
तुम्हारी खुशी में सचमुच खुशी होती है,
भले उसमें मेरी कोई जगह न हो।
यही बात सबसे कठिन भी है,
किसी को चाहकर भी उसके जीवन को अपनी चाहत के हिसाब से न चाहना।
मैंने तुम्हें पाने की कोशिश नहीं की,
क्योंकि प्रेम मेरे लिए किसी की इच्छा बदलने का नाम नहीं।
तुम्हें जैसा महसूस करना है, वैसा ही करने दिया,
बस अपने भीतर जो था, उसे झूठ कहकर मिटा नहीं पाया।
अब उम्मीद पहले जैसी नहीं रही,
पर भावना भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
शायद कुछ प्रेम रिश्ते बनने से पहले ही
अपने भीतर एक शांत विदाई सीखने लगते हैं।
कभी तुमसे अपनी बात कह देने का मन करता है,
फिर सोचता हूँ, हर सच्चाई का जवाब मिलना जरूरी नहीं।
कुछ भाव कहे बिना भी सच्चे रहते हैं,
और कुछ प्रेम चुप रहकर भी अपनी गरिमा बचा लेते हैं।
तुम मेरे लिए खास हो,
यह बात आज भी नहीं बदली।
बस अब यह समझ आ गई है,
कि किसी को खास मानना और उसकी जिंदगी में अपना स्थान माँगना अलग बातें हैं।
शायद एक दिन यह चाहत और शांत हो जाएगी,
शायद तुम्हारा ख्याल आए और मन सिर्फ मुस्कुरा दे।
अभी इतना ही काफी है,
कि मैं तुम्हें सच्चे मन से चाहता हूँ और खुद को भी खोने नहीं देता।