हर बड़ा फैसला अपने साथ थोड़ा डर लाता है,
मैंने अब डर को निर्णय की दुश्मनी समझना छोड़ दिया।
पहले कारण समझता हूँ, फिर संभावना तौलता हूँ,
और उसके बाद ही अपने कदम को सहमति देता हूँ।
कभी सुरक्षित विकल्प चुनना सही था,
कभी वही सुविधा मुझे भीतर से रोकती रही।
अब दोनों में फर्क समझने लगा हूँ,
क्योंकि हर असुविधा खतरा नहीं और हर सुविधा सही नहीं।
कुछ मौके हाथ में आए तो मन बहुत उत्साहित हुआ,
लेकिन मैंने केवल चाहत के कारण हाँ नहीं कहा।
अपने समय, क्षमता और संभावित नुकसान को देखा,
फिर जो उचित लगा, उसी के पक्ष में खड़ा हुआ।
असफलता का डर मुझे आज भी होता है,
खासकर तब जब दाँव पर कोई महत्वपूर्ण चीज़ हो।
पर अब मैं खुद से इतना पूछ लेता हूँ,
अगर यह फैसला गलत हुआ तो क्या मैं उससे सीखकर आगे बढ़ पाऊँगा?
परिवर्तन हमेशा सुंदर नहीं लगता,
पुरानी आदतें और सुविधाएँ बार-बार वापस बुलाती हैं।
फिर भी कुछ बदलाव ऐसे होते हैं,
जिनसे बचते-बचते इंसान अपने ही विकास को रोक देता है।
मैंने जोखिम को बहादुरी की प्रतियोगिता नहीं बनाया,
किसी से ज्यादा साहसी दिखना मेरा उद्देश्य नहीं।
मेरे लिए इतना काफी है,
कि जरूरी निर्णय डर के कारण अधूरा न छोड़ूँ।
कुछ फैसले मेरे पक्ष में नहीं गए,
उनका दुख भी रहा और पछतावा भी।
लेकिन उन्हीं अनुभवों ने सिखाया,
कि अगली बार साहस के साथ थोड़ी और समझदारी भी चाहिए।
कभी पूरा भरोसा नहीं था कि आगे क्या होगा,
फिर भी इतना पता था कि वर्तमान मुझे संतुष्ट नहीं कर रहा।
मैंने बिना जल्दबाज़ी के तैयारी की,
और जब निर्णय लिया तो पीछे की सुविधा को बहाना नहीं बनाया।
हर जोखिम अवसर नहीं होता,
कुछ केवल जल्दबाज़ी का दूसरा नाम होते हैं।
इसलिए अब कदम बढ़ाने से पहले,
अपने डर और अपनी इच्छा दोनों को बराबर सुनता हूँ।
अनिश्चितता में सबसे जरूरी चीज़,
मेरे लिए भविष्य की गारंटी नहीं, वर्तमान की स्पष्टता है।
अगर कारण साफ़ हो और तैयारी ईमानदार,
तो परिणाम चाहे जैसा हो, निर्णय से सीखने की जगह बनी रहती है।
आज भी नए फैसले आसान नहीं,
पर अब उनसे बचना ही मेरी पहली प्रतिक्रिया नहीं।
मैं सोचता हूँ, तौलता हूँ, फिर चुनता हूँ,
और चुने हुए रास्ते की जिम्मेदारी किसी और के कंधों पर नहीं रखता।
कुछ फैसलों में मन ने बहुत रोकने की कोशिश की,
क्योंकि आगे क्या होगा, इसका कोई भरोसा नहीं था।
फिर मैंने डर को जगह दी, पर निर्णय उससे नहीं करवाया,
क्योंकि अनिश्चितता के साथ भी सोच-समझकर चला जा सकता है।
सुरक्षित विकल्प हमेशा गलत नहीं होता,
पर हर बार वही चुनना भी जरूरी नहीं।
कभी भीतर की बढ़ने की इच्छा इतनी साफ़ होती है,
कि सुविधा से बाहर निकलना ही ईमानदार फैसला लगता है।
मैंने जोखिम उठाने से पहले यह भी सोचा,
अगर बात बिगड़ी तो क्या मैं उसका भार संभाल पाऊँगा।
यही सवाल मुझे आवेग से बचाता है,
और साहस को जिम्मेदारी के साथ रखने देता है।
कुछ अवसर ऐसे थे जिन्हें देखकर मन उत्साहित हुआ,
लेकिन हर उत्साह को मैंने निर्णय नहीं बनने दिया।
पहले अपनी जरूरत समझी,
फिर देखा कि वह चुनाव मेरे जीवन के लिए सच में कितना उचित है।
एक बार गलत फैसला लेने के बाद,
दूसरी बार डर और भी गहरा हो जाता है।
फिर भी मैंने अपने पुराने अनुभव को दीवार नहीं बनने दिया,
उसे सावधानी बनाया और आगे की सोच को थोड़ा बेहतर किया।
कभी लगता है कि परिचित जीवन छोड़ना बहुत महँगा पड़ेगा,
फिर सोचता हूँ कि रुकने की भी अपनी कीमत होती है।
हर कीमत पैसे में नहीं होती,
कुछ कीमतें समय, अवसर और भीतर की बेचैनी के रूप में चुकानी पड़ती हैं।
मैंने साहस को बिना सोचे आगे बढ़ना नहीं माना,
कभी पीछे हटना भी जरूरी लगा तो पीछे हटा।
पर जहाँ सोच, तैयारी और कारण मेरे साथ थे,
वहाँ केवल डर के कारण अपने कदम रोकना भी स्वीकार नहीं किया।
कुछ फैसले ऐसे थे जिनके परिणाम मेरे नियंत्रण में नहीं थे,
इसलिए मैंने परिणाम की गारंटी माँगना छोड़ दिया।
बस इतना चाहा,
कि फैसला मेरी समझ का हो और उससे मिलने वाली सीख को स्वीकार करने का धैर्य भी हो।
जोखिम ने मुझे केवल आगे बढ़ना नहीं सिखाया,
उसने अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लेना भी सिखाया।
अब किसी परिणाम को केवल किस्मत कहकर नहीं छोड़ता,
पहले देखता हूँ कि उसमें मेरी तैयारी और मेरी भूल कहाँ थी।
आज भी अनिश्चितता सामने आती है,
तो दिल में डर उठता है, लेकिन घबराहट हावी नहीं होती।
मैं पहले ठहरकर सोचता हूँ,
फिर वही चुनता हूँ जिसके साथ बाद में खुद से नज़र मिलाना आसान हो।
कभी-कभी सुरक्षित विकल्प सामने होता है,
फिर भी भीतर कुछ नया चुनने की इच्छा बनी रहती है।
मैंने उस इच्छा को आवेग नहीं बनने दिया,
पहले समझा कि क्या दाँव पर है, फिर निर्णय लिया।
कुछ फैसलों में असफलता का डर साफ़ दिखाई देता था,
लेकिन डर के कारण हर संभावना बंद कर देना भी ठीक नहीं लगा।
मैंने तैयारी की,
और जितना जोखिम समझदारी से उठा सकता था, उतना ही उठाया।
परिचित जीवन छोड़ना आसान नहीं,
क्योंकि वहाँ कम से कम सब कुछ जाना-पहचाना होता है।
फिर भी कभी-कभी वही परिचितपन,
हमारी बढ़ने की जरूरत को लंबे समय तक छिपाए रखता है।
मैंने हर मौके को पकड़ने की आदत छोड़ दी,
क्योंकि जोखिम का मतलब केवल आगे बढ़ना नहीं होता।
कभी सही निर्णय किसी अवसर को छोड़ना भी है,
अगर उसकी कीमत मेरी प्राथमिकताओं से बहुत बड़ी हो।
कुछ निर्णयों के परिणाम अच्छे नहीं रहे,
और उनका दुख भी हुआ।
लेकिन अब उनसे भागता नहीं,
जो गलत हुआ उसे समझता हूँ ताकि अगली बार वही गलती केवल हिम्मत के नाम पर न दोहराऊँ।
अनिश्चितता मुझे अब भी परेशान करती है,
क्योंकि कोई भी फैसला पूरी गारंटी लेकर नहीं आता।
फिर भी मैंने यह स्वीकार किया,
कि सोच-समझकर लिया गया निर्णय भी कभी गलत हो सकता है।
कभी मन कहता है कि अभी नहीं,
थोड़ा और रुक जाओ, सब साफ़ हो जाने दो।
लेकिन जीवन की हर महत्वपूर्ण बात,
पूरी निश्चितता आने के बाद ही तय हो, ऐसा कहाँ होता है।
जोखिम लेने से पहले मैंने अपने डर को देखा,
उसके पीछे की वास्तविक चिंता को भी समझा।
फिर जो बात उचित लगी,
उसे केवल इसलिए नहीं छोड़ा कि उसमें असफलता की संभावना थी।
कुछ कदमों ने मुझे वह नहीं दिया जिसकी उम्मीद थी,
पर उन्होंने यह जरूर बताया कि मैं किन चीज़ों के लिए तैयार हूँ।
अब निर्णय लेते समय केवल लाभ नहीं देखता,
यह भी सोचता हूँ कि उस चुनाव के बाद मैं अपने साथ सहज रह पाऊँगा या नहीं।
आज भी बड़े फैसले आसान नहीं लगते,
बस अब मैं उन्हें डर या उत्साह के हवाले नहीं करता।
सोचता हूँ, तौलता हूँ, फिर चुनता हूँ,
और जो चुनता हूँ, उसकी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटता।
कुछ फैसले लेने से पहले मन बहुत डरा,
क्योंकि उसके बाद पुरानी जिंदगी में लौटना आसान नहीं था।
फिर भी मैंने पहले खतरे को समझा,
और जब निर्णय लिया, तो उसके परिणाम से भागा नहीं।
सुविधा की अपनी मिठास होती है,
वहाँ असफल होने का डर थोड़ा कम रहता है।
पर मैंने यह भी देखा,
कि केवल सुरक्षित रहने से हर जरूरी बदलाव नहीं आता।
हर अवसर को पकड़ लेना साहस नहीं,
कभी मना करना भी उतना ही जरूरी होता है।
मैंने पहले अपनी वजह समझी,
फिर तय किया कि किस जोखिम के लायक मेरा प्रयास है।
कुछ कदमों के आगे कोई निश्चित उत्तर नहीं था,
बस इतना पता था कि वर्तमान मुझे संतुष्ट नहीं कर रहा।
मैंने जल्दबाज़ी नहीं की,
पर अनिश्चितता के कारण हमेशा वहीं रहना भी स्वीकार नहीं किया।
असफलता की संभावना सामने थी,
फिर भी मैंने उसके बारे में ईमानदारी से सोचा।
अगर परिणाम मेरे पक्ष में नहीं हुआ,
तो कम-से-कम फैसला मेरा होगा और सीख भी मेरी।
कभी पुरानी आदतें कहती हैं,
यहीं रहो, यहाँ सब जाना-पहचाना है।
लेकिन हर परिचित जगह सही जगह नहीं होती,
कभी आगे बढ़ने के लिए परिचित सुविधा से बाहर निकलना पड़ता है।
मैंने जोखिम को रोमांच नहीं माना,
मेरे लिए वह अपनी सोच और तैयारी की परीक्षा है।
जहाँ जानकारी कम हो, वहाँ पहले समझता हूँ,
और जहाँ निर्णय जरूरी हो, वहाँ डर के बावजूद चुनता हूँ।
कुछ फैसले दूसरों को छोटे लगे,
पर मेरे लिए उनमें बहुत कुछ दाँव पर था।
इसीलिए मैंने उनकी राय से ज्यादा,
उन परिणामों के बारे में सोचा जिन्हें मुझे खुद जीना था।
हर जोखिम सफल नहीं हुआ,
कुछ ने निराश किया और कुछ ने दिशा बदल दी।
फिर भी उनसे डरकर रुक जाना नहीं सीखा,
क्योंकि हर निर्णय का मूल्य केवल उसके परिणाम से तय नहीं होता।
अब जब कोई बड़ा फैसला सामने आता है,
तो न अंधा उत्साह होता है, न तुरंत डर।
पहले पूछता हूँ कि क्या यह मेरे लिए सही है,
फिर जितना समझ सकता हूँ समझकर अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता हूँ।
सुरक्षित रहना आसान था, इसलिए शायद आगे बढ़ना कठिन लगा,
पर मैंने डर के साथ बैठकर दोनों विकल्पों को समझा।
फिर जो सही लगा, उसकी जिम्मेदारी भी स्वीकार की,
क्योंकि निर्णय मेरा था तो उसका परिणाम भी मेरा होना चाहिए।
हर नया कदम अपने साथ थोड़ी अनिश्चितता लाता है,
यह जानते हुए भी मन ने कई बार पीछे खींचा।
लेकिन केवल डर के कारण रुके रहना भी,
हर बार सुरक्षित निर्णय नहीं होता।
कुछ फैसले ऐसे थे जिनमें कोई आश्वासन नहीं मिला,
बस अनुभव, तैयारी और अपनी समझ साथ थी।
मैंने आँखें बंद करके कदम नहीं रखा,
पहले जोखिम समझा, फिर आगे बढ़ने की हिम्मत की।
पुरानी सुविधा छोड़ना जितना बाहर से आसान लगता है,
अंदर से उतना ही कठिन होता है।
आदतें रोकती हैं, असफलता डराती है,
फिर भी बदलाव की कीमत से हमेशा बचा नहीं जा सकता।
मैंने हर अवसर को अवसर नहीं माना,
कुछ चीज़ें चमकदार थीं, पर मेरे लिए सही नहीं।
जोखिम लेना सीखा है,
पर अपनी समझ को किनारे रखकर नहीं।
कभी-कभी फैसला लेने से पहले,
मन में कई संभावित परिणाम घूमते रहते हैं।
फिर समझ आया,
हर परिणाम नियंत्रित नहीं किया जा सकता, पर निर्णय सोच-समझकर लिया जा सकता है।
असफल होने की संभावना को मैंने छिपाया नहीं,
इसीलिए हर कदम उठाने से पहले खुद से सवाल किया।
अगर यह ठीक नहीं हुआ तो क्या सीखूँगा,
और अगर नहीं किया तो क्या हमेशा यही सोचता रहूँगा?
कुछ जोखिमों ने मुझे आगे नहीं पहुँचाया,
लेकिन उन्होंने मेरी समझ जरूर बढ़ाई।
अब हर असफल निर्णय को बेकार नहीं मानता,
कभी अनुभव भी वही कीमत होता है जो परिणाम नहीं दे पाता।
सुविधा में रहकर मन शांत रहता है,
पर हर शांति संतोष नहीं होती।
कभी भीतर की बेचैनी बताती है,
कि बदलाव से डरना और बदलाव की जरूरत न होना एक बात नहीं।
मैंने जोखिम को बहादुरी का प्रमाण नहीं बनाया,
जहाँ रुकना सही लगा, वहाँ रुक गया।
जहाँ सोचने के बाद भी कदम जरूरी लगा,
वहाँ डर को साथ लेकर निर्णय लिया।
अब अनिश्चितता से दोस्ती तो नहीं,
पर उससे भागने की आदत भी नहीं रही।
मैं परिणाम की गारंटी नहीं माँगता,
बस इतना चाहता हूँ कि फैसला मेरा हो और उससे सीखने की हिम्मत भी मेरी।