माँ,
कभी-कभी लगता है तुम कहीं गई नहीं,
बस दूसरे कमरे में हो,
और मैं अभी आवाज़ दूँगा
तो तुम कहोगी,
"क्या हुआ बेटा?"
फिर अचानक सच याद आता है,
और दिल कुछ पल के लिए
बहुत शांत हो जाता है,
वैसा शांत,
जिसमें दर्द बोलता नहीं,
बस मौजूद रहता है।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने लोगों के बीच रहना सीखा,
मुस्कुराना भी सीखा,
लेकिन कुछ खाली जगहें ऐसी हैं
जिन्हें मैंने स्वीकार तो कर लिया,
भर नहीं पाया।
माँ,
पहले जब घर लौटता था,
तो दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनाई देती थी,
अब दरवाज़ा तो खुल जाता है,
मगर वह इंतज़ार नहीं मिलता
जो तुम्हारी आँखों में रहता था।
कई बार कोई पुरानी ख़ुशबू,
कोई पुराना गीत,
या रसोई की कोई परिचित महक
तुम्हारी याद दिला देती है,
और पूरा दिन तुम्हारे नाम हो जाता है।
तुम्हारी तस्वीर से बात करना
अजीब लगता था कभी,
अब कई बार मन की बातें
वहीं जाकर कह देता हूँ,
क्योंकि प्रेम को जवाब नहीं,
अपनापन चाहिए होता है।
माँ,
तुम्हारे बिना सबसे कठिन बात यह नहीं
कि तुम साथ नहीं हो,
सबसे कठिन बात यह है
कि जीवन चलता रहता है,
और हर नए दिन में
तुम्हारी कमी का एक नया रूप मिल जाता है।
जब कोई मेरी सफलता की तारीफ़ करता है,
तो मन में एक कसक उठती है,
काश तुम सुन पातीं,
क्योंकि मेरी हर उपलब्धि में
तुम्हारी मेहनत का हिस्सा है।
तुमने मुझे हमेशा संभाल लिया,
इसलिए शायद मैं कभी सीख ही नहीं पाया
कि तुम्हारी कमी को कैसे संभालना है।
माँ,
कुछ यादें ऐसी होती हैं
जिन्हें सोचकर मुस्कुराना चाहिए,
लेकिन तुम्हारी याद आते ही
मुस्कान और नमी
अक्सर साथ-साथ चली आती हैं।
अब समझ आता है
कि तुम्हारी मौजूदगी कितनी बड़ी नेमत थी,
क्योंकि उसके रहते हुए
हमने कभी उसके बिना जीने की कल्पना ही नहीं की थी।
तुम्हारी अलमारी में रखी चीज़ें,
तुम्हारे लिखे हुए छोटे नोट,
तुम्हारे चुने हुए बर्तन,
सब साधारण हैं,
फिर भी उनमें तुम्हारा स्पर्श महसूस होता है।
माँ,
दुनिया ने बहुत कुछ सिखाया,
लेकिन तुम्हारे जाने ने
एक बात सबसे गहराई से सिखाई—
कि कुछ रिश्ते जीवन का हिस्सा नहीं होते,
वे जीवन की नींव होते हैं।
कभी-कभी बहुत खुश होकर भी
दिल उदास हो जाता है,
क्योंकि कुछ खुशियाँ ऐसी होती हैं
जो सिर्फ़ माँ के साथ पूरी लगती हैं।
तुम्हारी याद अब
सिर्फ़ दुख नहीं देती,
वह मुझे तुम्हारे पास बिताए हुए
सुंदर दिनों की याद भी दिलाती है,
और उन दिनों के लिए
दिल में गहरी कृतज्ञता भर देती है।
माँ,
अगर यादों का कोई घर होता,
तो मैं अक्सर वहाँ चला जाता,
जहाँ तुम रसोई में व्यस्त होतीं,
मैं किसी बेवजह की बात पर ज़िद कर रहा होता,
और दुनिया बहुत छोटी,
बहुत सुरक्षित लगती।
आज भी जब बहुत थक जाता हूँ,
तो मन तुम्हें ही पुकारता है,
शायद इसलिए कि इंसान कितना भी बड़ा हो जाए,
उसके भीतर का बच्चा
अपनी माँ को कभी नहीं भूलता।
माँ,
आज भी कभी अचानक कोई अच्छी ख़बर मिलती है,
तो सबसे पहले तुम्हें बताने का मन करता है,
फिर याद आता है कि अब जवाब नहीं आएगा,
और खुशी के बीच एक ख़ामोशी उतर आती है।
तुम्हारे जाने के बाद समझ आया,
कि कमी हमेशा शोर नहीं करती,
कभी-कभी वह रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में छुपी रहती है,
जैसे किसी का नाम लेकर पुकारना,
और फिर कोई उत्तर न मिलना।
माँ,
तुम्हारी याद किसी एक दिन की मेहमान नहीं,
वह तो मेरे दिनों के साथ चलती है,
कभी मुस्कुराहट बनकर,
कभी आँखों की नमी बनकर।
पुरानी तस्वीरें देखता हूँ,
तो चेहरा नहीं,
उन दिनों की गर्माहट याद आती है,
जब तुम्हारे होने भर से
हर चिंता छोटी लगती थी।
अब भी जब बहुत थक जाता हूँ,
तो मन को तुम्हारी गोद याद आती है,
वह गोद जहाँ समस्याएँ हल नहीं होती थीं,
लेकिन उनका बोझ ज़रूर हल्का हो जाता था।
माँ,
तुम्हारे बाद घर वैसा ही है,
दीवारें भी वही हैं,
दरवाज़े भी वही हैं,
बस वह अपनापन कहीं कम हो गया है
जो तुम्हारी मौजूदगी से हर कोने में बसता था।
कई बार लगता है,
काश एक बार फिर तुम्हारे पास बैठ पाता,
किसी बड़ी बात के लिए नहीं,
बस यह बताने के लिए
कि तुम्हारी सीख आज भी मेरे साथ है।
तुम्हारे हाथों का स्पर्श तो याद है,
मगर धीरे-धीरे उसकी गर्मी धुँधली होने लगती है,
और यही बात सबसे ज़्यादा डराती है,
कि वक़्त यादों पर भी असर डाल देता है।
माँ,
कुछ रिश्ते बिछड़कर भी नहीं बिछड़ते,
तुम्हारा रिश्ता भी वैसा ही है,
तुम सामने नहीं हो,
फिर भी मेरे हर फ़ैसले में कहीं न कहीं मौजूद हो।
जब कोई मुझसे पूछता है
कि मुझे सबसे ज़्यादा किसकी याद आती है,
तो मैं अक्सर चुप हो जाता हूँ,
क्योंकि कुछ नाम इतने अपने होते हैं
कि उन्हें शब्दों में कहना आसान नहीं होता।
तुम्हारी कही हुई साधारण बातें
आज अनमोल लगती हैं,
क्योंकि उनमें अनुभव से ज़्यादा
तुम्हारा प्रेम छुपा होता था।
माँ,
अब जब किसी बच्चे को उसकी माँ के साथ देखता हूँ,
तो दिल में एक साथ दो भाव आते हैं,
एक मुस्कान,
और एक हल्की-सी कसक।
तुम्हारी अनुपस्थिति ने मुझे यह सिखाया
कि प्रेम की असली कीमत
उसके चले जाने के बाद नहीं,
उसके रहते हुए समझनी चाहिए थी।
कई बार रात को देर तक जागता हूँ,
और मन पुरानी बातों में चला जाता है,
जहाँ तुम थीं,
तुम्हारी आवाज़ थी,
और जीवन थोड़ा आसान लगता था।
माँ,
तुम्हें खोने का दुख समय के साथ कम नहीं हुआ,
बस उसने अपना रूप बदल लिया है,
पहले आँसू बनकर आता था,
अब एक शांत खालीपन बनकर साथ चलता है।
आज भी जब जीवन बहुत कठिन लगता है,
तो तुम्हारी याद से ही हिम्मत मिलती है,
क्योंकि तुमने जाते-जाते भी
मुझे टूटना नहीं,
संभलना सिखाया था।
माँ,
कुछ दिनों में तुम्हारी याद बहुत धीरे आती है,
जैसे किसी पुराने कमरे की खिड़की से
हल्की-सी हवा अंदर चली आए,
और फिर पूरे दिन मन कहीं अटका रह जाए।
अब भी कभी थककर घर लौटता हूँ,
तो अनजाने में नज़र तुम्हें ढूँढ़ती है,
फिर याद आता है
कि कुछ इंतज़ार अब सिर्फ़ यादों में पूरे होते हैं।
तुम्हारी आवाज़ भूलने से डर लगता है माँ,
इसलिए कई बार आँखें बंद करके
पुरानी बातें याद करता हूँ,
ताकि तुम्हारा "ख़याल रखना"
मन में ज़िंदा रहे।
बचपन में जब डर लगता था,
मैं तुम्हारे कमरे तक चला जाता था,
आज भी डर लगता है,
बस फ़र्क इतना है
कि अब वह कमरा यादों में है।
माँ,
तुम्हारे जाने के बाद समझ आया,
कि कुछ लोग घर में नहीं रहते,
घर उन्हीं से बना होता है।
कई बार कोई छोटी-सी बात होती है,
और सबसे पहले तुम्हें बताने का मन करता है,
फिर अचानक ख़ामोशी याद दिला देती है
कि कुछ बातें अब दिल में ही रखनी पड़ती हैं।
तुम्हारी पुरानी चीज़ों को छूकर
ऐसा लगता है जैसे वक़्त थोड़ी देर के लिए रुक गया हो,
जैसे तुम अभी आकर कहोगी,
"इतना उदास क्यों बैठे हो?"
माँ,
तुम्हारी कमी हमेशा रोकर महसूस नहीं होती,
कभी-कभी तो किसी भीड़ भरे दिन में
अचानक एक खालीपन आकर बैठ जाता है,
और मैं समझ जाता हूँ,
तुम याद आई हो।
अब जब कोई मेरी चिंता करता है,
तो तुम्हारी याद और गहरी हो जाती है,
क्योंकि दुनिया में बहुत लोग साथ दे सकते हैं,
लेकिन माँ जैसा ख़याल
बहुत कम लोगों को आता है।
तुम्हारे साथ बिताए साधारण दिन
आज सबसे कीमती लगते हैं,
क्योंकि तब पता नहीं था
कि एक दिन वही यादें
जीने का सहारा बन जाएँगी।
माँ,
कई बार आईने में खुद को देखता हूँ,
तो अपनी आदतों में तुम्हारी झलक मिलती है,
और उस पल लगता है
कि तुम पूरी तरह कभी गई ही नहीं।
तुम्हारी डाँट भी याद आती है,
तुम्हारी चिंता भी,
तुम्हारे बार-बार पूछे गए वही सवाल भी,
क्योंकि प्रेम की असली कीमत
अक्सर उसके दूर हो जाने के बाद समझ आती है।
माँ,
तुम्हारे बिना जीवन चल तो रहा है,
लेकिन कुछ जगहें अब भी खाली हैं,
जिन्हें कोई और भर नहीं पाया,
और शायद कभी भर भी न पाए।
जब कभी बहुत खुश होता हूँ,
तो एक उदासी भी साथ आ जाती है,
क्योंकि दिल चाहता है
कि तुम यह सब देख रही होतीं।
माँ,
तुम्हारी याद किसी पुराने घाव जैसी नहीं,
किसी पुराने गीत जैसी है,
जो सुनते ही आँखें नम तो कर देता है,
लेकिन साथ ही
दिल को तुम्हारे प्रेम से भर भी देता है।