मैंने लोगों को खोने से ज़्यादा
खुद को खोने से डरना सीखा है,
क्योंकि रिश्ते दोबारा बन सकते हैं,
स्वाभिमान नहीं।
हर मुस्कान के पीछे सहमति नहीं होती,
कई बार हम सिर्फ़ संस्कार निभाते हैं,
मगर जहाँ आत्मसम्मान की बात हो,
वहाँ हमारी ख़ामोशी भी निर्णय होती है।
मैंने अपनी क़ीमत
कभी भीड़ से नहीं पूछी,
क्योंकि जो खुद को जानता हो,
उसे पहचान के लिए तालियों की ज़रूरत नहीं होती।
अब मैं हर बात पर सफ़ाई नहीं देता,
क्योंकि चरित्र को समझने वाले
सबूत नहीं माँगते,
और जो न समझें, उन्हें शब्द नहीं समझा सकते।
स्वाभिमान ने मुझे यह सिखाया है,
कि हर लड़ाई लड़ना समझदारी नहीं,
कई बार खुद को उस जगह से हटा लेना
सबसे बड़ी जीत होती है।
मैंने अपने उसूलों को
सिर्फ़ अच्छे दिनों के लिए नहीं चुना,
मुश्किल वक़्त में भी उन्हें निभाया है,
तभी उनका मूल्य है।
जहाँ सम्मान शर्तों पर मिले,
वहाँ रुकना पसंद नहीं,
क्योंकि स्वाभिमान का रिश्ता
सौदों से नहीं, सच्चाई से होता है।
मैंने कभी ऊँची आवाज़ में
अपनी अहमियत नहीं बताई,
मेरे फैसले ही काफ़ी हैं
यह दिखाने के लिए कि मैं खुद को कितना मानता हूँ।
जो इंसान अपनी नज़रों में गिर जाए,
उसे दुनिया का सम्मान भी सुकून नहीं देता,
इसलिए मैं सबसे पहले
अपने विवेक के सामने सच्चा रहता हूँ।
मैं विनम्र रहूँगा,
सम्मान दूँगा,
रिश्ते भी निभाऊँगा,
मगर अपने स्वाभिमान की कीमत पर कभी नहीं।
स्वाभिमान ने मुझे सिखाया है,
कि हर किसी को जवाब देना ज़रूरी नहीं,
कुछ लोगों को सिर्फ़
आपकी ख़ामोश दूरी ही काफ़ी होती है।
मैंने सम्मान पाने से पहले
सम्मान देना सीखा है,
शायद इसी वजह से
मुझे अपनी क़ीमत समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
हर रिश्ता निभाने की कोशिश की,
मगर खुद को खोकर नहीं,
क्योंकि जो रिश्ता आत्मसम्मान छीन ले,
वह रिश्ता नहीं, बोझ होता है।
मैंने अपने सिद्धांतों को
सुविधाओं के लिए नहीं बदला,
क्योंकि स्वाभिमान का मूल्य
अक्सर आसान रास्तों से बड़ा होता है।
अब मैं हर जगह अपनी मौजूदगी साबित नहीं करता,
जहाँ मेरी गरिमा सुरक्षित नहीं,
वहाँ मेरी अनुपस्थिति ही बेहतर है।
मैंने सीखा है कि
ना कहना भी एक सम्मान है,
खासकर तब,
जब हाँ कहने से खुद को ठेस पहुँचती हो।
स्वाभिमान का अर्थ कठोर होना नहीं,
खुद के प्रति न्यायपूर्ण होना है,
ताकि दुनिया बदल जाए,
पर आपका चरित्र न बदले।
मैंने अपनी सीमाएँ तय की हैं,
ताकि लोग नहीं,
मेरे मूल्य मेरे जीवन की दिशा तय करें।
कुछ लोग साथ छोड़ गए,
कुछ रास्ते बदल गए,
लेकिन अच्छा हुआ,
मेरा स्वाभिमान कभी मेरा साथ छोड़कर नहीं गया।
मैंने हर बार खुद को चुना,
जब विकल्प अपमान और समझौते का था,
क्योंकि सम्मान खोकर जीना
मुझे कभी स्वीकार नहीं था।
मैं झुक सकता हूँ,
अगर सामने प्रेम और आदर हो,
मगर जहाँ गरिमा पर चोट हो,
वहाँ मेरा मौन भी इंकार होता है।
मुझे हर किसी की स्वीकृति नहीं चाहिए,
बस इतना काफ़ी है
कि आईने में देखकर
खुद से नज़रें न चुरानी पड़ें।
मैंने वक़्त के साथ जाना है,
कि आत्मसम्मान खोने के बाद
मिलने वाली हर खुशी
अधूरी लगती है।
अब मैं उन लोगों के पीछे नहीं चलता
जो मेरी क़ीमत नहीं समझते,
क्योंकि स्वाभिमान सिखाता है
कि अपनी जगह छोड़कर सम्मान नहीं मिलता।
मैंने अपनी पहचान
दूसरों की राय पर नहीं बनाई,
उसे अपने कर्मों और मूल्यों से गढ़ा है,
और यही मेरी असली ताक़त है।
हर दरवाज़ा मेरे लिए खुला हो,
यह ज़रूरी नहीं,
मगर जहाँ जाऊँ,
वहाँ मेरा सम्मान बना रहे, यह ज़रूरी है।
स्वाभिमान का सबसे सुंदर रूप यह है,
कि वह आपको विनम्र भी रखता है
और मज़बूत भी,
बिना किसी दिखावे के।
मैंने कभी किसी को नीचा दिखाकर
खुद को ऊँचा साबित नहीं किया,
क्योंकि असली ऊँचाई
चरित्र से बनती है, तुलना से नहीं।
जो लोग खुद की क़ीमत जानते हैं,
वे हर जगह ठहरते नहीं,
वे वहीं रुकते हैं
जहाँ सम्मान और अपनापन दोनों मिलें।
मैं आज भी शांत हूँ,
आज भी विनम्र हूँ,
मगर इतना ज़रूर है कि
अब मेरा स्वाभिमान किसी भी समझौते से बड़ा है।
मैं हर रिश्ता निभाना जानता हूँ,
मगर अपनी क़ीमत खोकर नहीं,
क्योंकि स्वाभिमान वह चीज़ है,
जो एक बार टूट जाए तो फिर वैसा नहीं रहता।
मुझे सबकी पसंद बनना नहीं,
खुद की नज़रों में सही रहना है,
क्योंकि दुनिया की तारीफ़ से ज़्यादा
अपना सम्मान मायने रखता है।
मैंने झुकना सीखा है,
मगर सिर्फ़ संस्कारों के लिए,
जहाँ आत्मसम्मान की बात आए,
वहाँ समझौता मेरी आदत नहीं।
हर दरवाज़े पर दस्तक देना छोड़ दिया है,
जहाँ सम्मान नहीं मिलता, वहाँ रुकना भी नहीं,
क्योंकि स्वाभिमान सिखाता है
कि हर जगह मौजूद रहना ज़रूरी नहीं।
मैं किसी से ऊँचा बनने की कोशिश नहीं करता,
बस इतना चाहता हूँ
कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों,
मेरा चरित्र नीचे न गिरे।
कई बार चुप रह जाना बेहतर होता है,
लेकिन खुद को मिटा देना नहीं,
स्वाभिमान यही सिखाता है
कि शांति और कमज़ोरी एक बात नहीं।
मैंने लोगों की मंज़ूरी से
अपनी क़ीमत तय करना छोड़ दिया,
अब जो हूँ,
अपने सिद्धांतों की वजह से हूँ।
रिश्ते ज़रूरी हैं,
मगर सम्मान उससे भी ज़्यादा,
क्योंकि जहाँ आदर नहीं बचता,
वहाँ अपनापन भी टिक नहीं पाता।
मैंने खोने के डर से
खुद को बदलना नहीं सीखा,
जो मुझे मेरे मूल्यों के साथ स्वीकार करे,
वही मेरे जीवन में रहने योग्य है।
स्वाभिमान का अर्थ घमंड नहीं होता,
यह खुद के प्रति ईमानदारी है,
कि परिस्थितियाँ बदल जाएँ,
पर आपके सिद्धांत न बदलें।
मैं हर बहस जीतना नहीं चाहता,
कुछ जगह सिर्फ़ अपनी गरिमा बचाना काफ़ी होता है,
क्योंकि समझदार लोग
हर चुनौती का जवाब शब्दों से नहीं देते।
अब मैं उन जगहों पर नहीं रुकता
जहाँ बार-बार खुद को साबित करना पड़े,
स्वाभिमान कहता है,
सम्मान माँगा नहीं जाता, महसूस कराया जाता है।
मैंने अपनी सीमाएँ तय कर ली हैं,
ताकि लोग नहीं,
मेरे मूल्य मेरे फैसले तय करें,
और यही मेरे आत्मविश्वास की असली वजह है।
कुछ लोग हर कीमत पर साथ चाहते हैं,
मैं हर कीमत पर सम्मान चाहता हूँ,
क्योंकि बिना सम्मान के साथ
ज़्यादा दिन नहीं चलता।
मैंने वक़्त के साथ यह समझा है,
कि हर रिश्ता बचाना ज़रूरी नहीं,
लेकिन खुद को बचाए रखना
हमेशा ज़रूरी है।
स्वाभिमान वह ख़ामोश ताक़त है,
जो इंसान को भीड़ में भी सीधा खड़ा रखती है,
चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों।
मैं लोगों की नज़रों में बड़ा बनने से पहले,
अपनी नज़रों में सच्चा रहना चाहता हूँ,
क्योंकि चरित्र की जीत
हर उपलब्धि से बड़ी होती है।
मैंने कभी अपनी क़ीमत
किसी के व्यवहार से नहीं आँकी,
क्योंकि मेरा मूल्य
दूसरों की राय से कम या ज़्यादा नहीं होता।
जहाँ सम्मान मिलता है,
वहाँ दिल से जुड़ता हूँ,
और जहाँ नहीं मिलता,
वहाँ बिना शोर किए आगे बढ़ जाता हूँ,
यही मेरा स्वाभिमान है।
मैं आज भी विनम्र हूँ,
मगर खुद को भूलकर नहीं,
क्योंकि स्वाभिमान ने मुझे सिखाया है,
कि सबसे पहले अपनी गरिमा का साथ निभाना चाहिए।