तन्हाई का सबसे भारी हिस्सा यह नहीं,
कि कोई साथ नहीं होता,
बल्कि यह कि बहुत कुछ कहने को होता है
और सुनने वाला कोई नहीं होता।
अब मैं लोगों से कम,
अपनी यादों से ज़्यादा मिलता हूँ।
कुछ खालीपन ऐसे होते हैं
जिन्हें समय भी नहीं भरता,
बस इंसान उनके साथ जीना सीख जाता है।
कभी-कभी पूरा दिन गुजर जाता है,
और एहसास तब होता है
कि आज किसी ने मेरा नाम भी नहीं लिया।
अकेलापन शोर नहीं करता,
बस धीरे-धीरे
मन के भीतर अपनी जगह बना लेता है।
मैं अब भी लोगों के बीच हँस लेता हूँ,
लेकिन कुछ मुस्कानें
सिर्फ़ आदत होती हैं।
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते,
वे बस दूर हो जाते हैं,
और उनके बाद जो सन्नाटा बचता है,
वही तन्हाई कहलाता है।
अब फ़ोन कम बजता है,
और मन ज़्यादा सोचता है।
अकेलेपन ने मुझे यह सिखाया,
कि हर खाली समय आराम नहीं होता।
कभी-कभी लगता है,
जैसे मैं सबकी कहानियों में शामिल हूँ,
पर मेरी कहानी सुनने वाला कोई नहीं।
कुछ दिनों में दुख नहीं होता,
फिर भी दिल भारी रहता है,
शायद यही तन्हाई का असर है।
मैंने अब लोगों का इंतज़ार करना छोड़ दिया,
लेकिन मन आज भी
किसी अपने की आहट पहचानता है।
अजीब है यह ख़ालीपन,
किसी एक इंसान से शुरू हुआ था,
और अब पूरी ज़िंदगी में फैल गया है।
अब मैं ख़ुद को समझाने में माहिर हो गया हूँ,
क्योंकि समझने वाला कोई और नहीं बचा।
कुछ रातें नींद नहीं चुरातीं,
वे बस पुराने ख़याल लौटा देती हैं।
तन्हाई में सबसे ज़्यादा
आवाज़ अपनी ही यादों की आती है।
मैं अकेला नहीं हूँ,
मेरे साथ बहुत सी अधूरी बातें हैं।
कुछ लोग चले जाते हैं,
लेकिन उनके जाने के बाद
जो आदतें रह जाती हैं,
वही सबसे ज़्यादा सताती हैं।
अब मुझे भीड़ से नहीं,
अपने भीतर की ख़ामोशी से डर लगता है।
कभी-कभी मन सिर्फ़ यह चाहता है
कि कोई बिना वजह याद कर ले।
तन्हाई ने मुझे मज़बूत नहीं बनाया,
बस मेरी चुप्पी को गहरा कर दिया।
दिन भर सब सामान्य लगता है,
लेकिन रात को मन
अपनी असली हालत बता देता है।
कुछ खाली कुर्सियाँ
सिर्फ़ फर्नीचर नहीं होतीं,
वे किसी की कमी का एहसास होती हैं।
मैंने लोगों को खोया नहीं,
बस धीरे-धीरे
उनकी अहमियत मेरी ज़िंदगी से कम होती गई।
अकेलापन तब और बढ़ जाता है,
जब आपकी खुशी बाँटने वाला भी
कोई न हो।
अब मैं अपनी ही बातों पर मुस्कुरा लेता हूँ,
क्योंकि जवाब देने वाला कोई नहीं होता।
तन्हाई का दर्द यह नहीं
कि कोई पास नहीं,
दर्द यह है कि
जिसे पास होना चाहिए था, वह नहीं है।
कुछ रिश्ते यादों में बदल जाते हैं,
और कुछ यादें
जीवन भर का साथ बन जाती हैं।
मैंने अब शिकायत करना छोड़ दिया है,
क्योंकि तन्हाई को शब्दों से नहीं,
सहन करने से समझा जाता है।
सबसे गहरी ख़ामोशी वही होती है,
जब इंसान बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखे,
और भीतर से पूरी तरह अकेला हो।
भीड़ में खड़े होकर भी
कभी-कभी ऐसा लगता है,
जैसे मेरी ख़ामोशी को सुनने वाला
कोई नहीं बचा।
अकेलापन हमेशा कमरे में नहीं मिलता,
कई बार वह लोगों के बीच बैठकर भी
महसूस हो जाता है।
अब आदत हो गई है
अपने ही मन से बातें करने की,
क्योंकि हर एहसास
सबको समझ नहीं आता।
कुछ दिन ऐसे भी आते हैं,
जब किसी की कमी नहीं होती,
फिर भी भीतर एक खालीपन बना रहता है।
मैं अकेला नहीं हूँ,
बस अब मेरी बातें
ज़्यादातर मेरे भीतर ही रह जाती हैं।
अजीब बात है,
जिन लोगों के लिए कभी समय कम पड़ता था,
आज उन्हें याद करने के लिए
पूरा दिन खाली है।
कुछ ख़ामोशियाँ
शांति नहीं होतीं,
वे उन बातों का बोझ होती हैं
जो कभी कही नहीं गईं।
अब घर लौटने की जल्दी नहीं रहती,
क्योंकि इंतज़ार करने वाला कोई नहीं,
और यही एहसास सबसे ज़्यादा थका देता है।
अकेलेपन ने मुझे तोड़ा नहीं,
बस यह सिखा दिया
कि हर साथ हमेशा नहीं रहता।
कभी-कभी मन सिर्फ़ इतना चाहता है
कि कोई पूछे,
"कैसे हो?"
और जवाब सच में सुने।
कुछ रिश्ते खत्म हो जाते हैं,
लेकिन उनके जाने के बाद
जो सन्नाटा बचता है,
वह बहुत देर तक रहता है।
अब मैं कम बोलता हूँ,
क्योंकि समझ गया हूँ,
हर सुनने वाला
समझने वाला नहीं होता।
अकेलापन तब गहरा लगता है,
जब बहुत कुछ कहने को हो,
और कोई अपना न हो।
कुछ यादें
लोगों की जगह ले लेती हैं,
और फिर इंसान
उन्हीं के साथ जीना सीख जाता है।
दिन कामों में गुजर जाता है,
मगर शामें अक्सर
मन का सच सामने ले आती हैं।
मैंने लोगों से दूरी नहीं बनाई,
बस उम्मीदें थोड़ी कम कर दी हैं।
सब ठीक होने के बाद भी
अगर कुछ अधूरा लगे,
तो समझ लेना
वह अकेलापन है।
कुछ दर्द रोते नहीं,
वे बस इंसान को
पहले जैसा नहीं रहने देते।
अकेले रहना मुश्किल नहीं,
मुश्किल यह है कि
किसी की आदत के बाद
अकेले रहना सीखना पड़ता है।
अब ख़ामोशी से डर नहीं लगता,
क्योंकि वह लंबे समय से
मेरी सबसे नियमित साथी है।
कभी-कभी लगता है
जैसे मैं सबके लिए मौजूद हूँ,
लेकिन मेरे लिए कोई नहीं।
अकेलेपन की सबसे अजीब बात यह है,
यह धीरे-धीरे आता है,
और फिर आदत बन जाता है।
कुछ लोग चले जाते हैं,
और अपने साथ
बातों की पूरी दुनिया ले जाते हैं।
मैं मुस्कुरा लेता हूँ,
काम भी कर लेता हूँ,
बस भीतर की ख़ाली जगह
अब भी वैसी ही है।
अब किसी से शिकायत नहीं,
बस कभी-कभी
खुद की आवाज़ भी
अजनबी लगने लगती है।
कई बार मन थका हुआ नहीं होता,
बस समझे जाने की चाह में
चुप हो जाता है।
अकेलापन वह नहीं
जब आसपास कोई न हो,
अकेलापन वह है
जब कोई आपको महसूस न करे।
कुछ शामें ऐसी होती हैं,
जहाँ कोई ख़ास वजह नहीं होती,
फिर भी मन भारी-सा रहता है।
मैंने अकेलेपन से लड़ना छोड़ दिया,
अब उसे समझने की कोशिश करता हूँ।
सबसे गहरी तन्हाई शायद वही है,
जब इंसान अपनी ही ज़िंदगी में
मेहमान जैसा महसूस करने लगे।