तुम पर भरोसा करते समय मैंने कोई हिसाब नहीं रखा,
क्योंकि अपने लोगों से सावधानी नहीं, सहजता होती है।
तुमने वही सहजता तोड़ी,
और उसके बाद सबसे कठिन काम था अपने ही निर्णय पर फिर भरोसा करना।
तुम्हारी बातों में पहले जो अपनापन दिखता था,
सच सामने आने के बाद वही बातें अलग सुनाई देने लगीं।
दुख सिर्फ सच का नहीं था,
दुख यह था कि मैं जिन पलों को सुरक्षित समझता था, उनमें भी अब संदेह घुल गया।
मैंने बहुत देर तक सोचा कि गलती कहाँ हुई,
हर पुरानी बातचीत को मन में दोहराता रहा।
फिर समझ आया,
किसी को ईमानदार समझ लेना गलती नहीं, उसकी बेईमानी को अपनी कमी मान लेना गलती है।
तुम्हारे बाद मैंने लोगों से दूरी नहीं बनाई,
बस अपने भरोसे की गति धीमी कर दी।
अब किसी को जगह देने से पहले,
देखता हूँ कि वह मेरे विश्वास को संभालता भी है या सिर्फ उसका लाभ उठाता है।
कुछ रिश्तों की सबसे बड़ी चोट यह होती है,
कि वे खत्म होने के बाद भी हमारी यादों में अच्छे बने रहते हैं।
तुम्हारे साथ जो सच्चा था,
उसे झूठा कहकर मैं अपने ही अनुभव को गलत नहीं ठहराना चाहता।
तुमने जो किया, उसके लिए मन में सवाल आज भी हैं,
लेकिन अब हर सवाल का जवाब तुमसे लेना जरूरी नहीं।
कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए,
सच जानना नहीं, जो सच सामने है उसे स्वीकार करना काफी होता है।
मैंने अपनी सीमाएँ देर से समझीं,
पर अब उन्हें लेकर शर्म नहीं।
किसी को अपना मानना खूबसूरत है,
मगर अपनी गरिमा की कीमत पर किसी रिश्ते को बचाना जरूरी नहीं।
तुम्हारे विश्वासघात ने मुझे कठोर नहीं किया,
उसने बस मेरी आँखों से जल्दबाज़ी हटा दी।
अब किसी की बात सुनता हूँ,
तो उसके साथ यह भी देखता हूँ कि उसके काम उन शब्दों का साथ देते हैं या नहीं।
कभी डर लगता है कि फिर वही न हो,
पर इस डर को अपने भविष्य का फैसला नहीं बनने दूँगा।
हर इंसान तुम्हारे जैसा नहीं,
और हर नया रिश्ता पुराने घाव की सज़ा नहीं होना चाहिए।
तुमने मेरा भरोसा तोड़ा,
लेकिन मेरी नीयत पर मेरा विश्वास नहीं छीन सके।
आज भी मैं सच्चा रहना चाहता हूँ,
बस अब अपनी सच्चाई के साथ अपनी सीमाओं की रक्षा करना भी जानता हूँ।
तुमसे मिला सबसे गहरा सबक यही था,
कि करीबी होना और भरोसे के लायक होना हमेशा एक बात नहीं।
मैंने रिश्ते को दिल से सच माना,
तुमने शायद उसे अपनी सुविधा के हिसाब से निभाया।
जिस दिन सच्चाई सामने आई,
मुझे तुम्हारी बातों से ज्यादा अपनी पुरानी सहजता याद आई।
मैं कितना निश्चिंत होकर तुम्हें अपना मानता था,
यही बात उस दिन सबसे ज्यादा भीतर तक लगी।
बहुत देर तक मैं बीती बातों को नए अर्थ देता रहा,
सोचा, शायद पहले भी कुछ संकेत थे जिन्हें समझ नहीं पाया।
फिर खुद से कहा,
हर बीती हुई बात को शक की निगाह से देखना भी उस रिश्ते को बार-बार जीना है।
तुम्हारे विश्वासघात ने मुझे यह नहीं सिखाया कि दुनिया बुरी है,
उसने बस मेरी सीमाएँ मुझे साफ़ दिखाई हैं।
अब अपनापन देता हूँ,
पर अपनी सहजता किसी के हाथ में पूरी तरह नहीं सौंपता।
कभी तुम्हारी कही कोई अच्छी बात याद आती है,
तो मन उलझता नहीं कि उसमें कितना सच था।
जो उस समय सच्चा लगा,
उसे सच्चा मानकर आगे बढ़ जाना भी अपने मन के प्रति ईमानदारी है।
मैंने तुम्हें माफ़ किया या नहीं,
अब इस सवाल का महत्व पहले जैसा नहीं रहा।
मेरे लिए जरूरी यह है,
कि तुम्हारे किए की वजह से मैं अपने भीतर कड़वाहट का घर न बना लूँ।
अब किसी नए रिश्ते में कदम रखते हुए,
मैं शब्दों से ज्यादा छोटे व्यवहार देखता हूँ।
कौन कठिन समय में कैसा रहता है,
यही धीरे-धीरे बताता है कि भरोसा कहाँ रखना चाहिए।
तुम्हारी वजह से भरोसा खत्म नहीं हुआ,
बस भरोसा देने की जल्दी खत्म हो गई।
अब किसी को अपना कहने से पहले,
उसे समय देता हूँ कि वह अपने व्यवहार से खुद को पहचानाए।
तुम्हारे साथ जो हुआ,
उसने मुझे अपनी कीमत समझने में भी मदद की।
मैं किसी के साथ सच्चा रह सकता हूँ,
पर किसी के गलत व्यवहार को सहकर अपनी सच्चाई साबित नहीं करनी।
आज पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो दुख अब भी है, मगर पहले जैसी उलझन नहीं।
तुमने मेरा भरोसा तोड़ा था,
मेरी अपने प्रति आस्था नहीं—वह अब पहले से ज्यादा संभलकर खड़ी है।
तुम पर किया भरोसा आज भी गलत नहीं लगता,
गलत बस इतना हुआ कि मैंने तुम्हारी नीयत को अपनी नीयत जैसा समझ लिया।
तुम्हारे बदलने से मेरी सच्चाई कम नहीं हुई,
बस अब रिश्तों को समझने का मेरा तरीका बदल गया।
जिस दिन तुम्हारा सच सामने आया,
उस दिन सिर्फ एक रिश्ता नहीं, मेरी एक धारणा भी टूटी।
मैं सोचता था अपने लोग चोट नहीं देते,
अब समझता हूँ कि अपनापन और ईमानदारी दोनों को निभाना पड़ता है।
तुम्हारी बातों पर यकीन करने की वजह कोई मजबूरी नहीं थी,
मैंने तुम्हें अपना समझकर भरोसा किया था।
आज उस भरोसे की कमी महसूस होती है,
तुम्हारी नहीं, उस सहज मन की जो तुम्हारे सामने कभी डरा नहीं था।
बहुत समय तक तुम्हारे किए का कारण खोजता रहा,
हर जवाब में अपनी कोई गलती तलाशता रहा।
फिर एक दिन खुद से कहा,
जिसने विश्वास तोड़ा है, उसकी वजह जानना मेरी जिम्मेदारी नहीं।
तुमने जो छिपाया, उससे ज्यादा दुख इस बात का था,
कि सच जानने के बाद पुरानी बातें भी बदलकर दिखने लगीं।
यादें वही थीं,
बस अब उन्हें देखने वाला मन पहले जैसा भोला नहीं रहा।
अब किसी के करीब आने पर मन तुरंत सब नहीं कहता,
वह पहले समय को अपना काम करने देता है।
क्योंकि भरोसा एक बातचीत में नहीं बनता,
वह छोटी-छोटी सच्चाइयों के लगातार निभने से बनता है।
तुम्हारे विश्वासघात के बाद मैंने नफरत नहीं चुनी,
क्योंकि उससे मेरे भीतर की शांति भी तुम्हारे हवाले हो जाती।
मैंने बस दूरी रखी,
ताकि तुम्हारी गलती मेरे आगे के रिश्तों का स्वभाव न बन जाए।
कभी लगता था तुम्हें समझ लूँगा तो सब ठीक हो जाएगा,
फिर समझ आया कि कुछ लोगों को समझना नहीं, स्वीकार करना पड़ता है।
तुम वैसे निकले जैसे तुम थे,
और मुझे वैसा ही रहना है जैसा मैं अपने लिए सच्चा समझता हूँ।
अब भरोसा करने से डर नहीं लगता,
बस उसे देने से पहले समय की कसौटी देखता हूँ।
दिल अभी भी सच्चा है,
मगर अब उसे अपनी समझ के साथ चलना आता है।
तुमने मेरा विश्वास तोड़ा,
लेकिन मेरी अपनी नज़रों में मुझे गिरा नहीं पाए।
मैंने अपनी नीयत को बचाकर रखा,
क्योंकि किसी और की बेईमानी के कारण खुद की सच्चाई छोड़ देना उससे भी बड़ा नुकसान होता।
तुम्हारे साथ सबसे बड़ा दुख यह नहीं था कि तुम बदल गए,
दुख यह था कि मैंने तुम्हें बदलने से पहले ही अपना मान लिया था।
इसलिए तुम्हारी हर नई बात चुभती रही,
क्योंकि मैं उसमें उसी पुराने भरोसे को खोजता रहा।
तुमसे सवाल कर सकता था,
पर भरोसा करते हुए सवालों की दीवार खड़ी करना नहीं आता था।
आज समझता हूँ,
विश्वास अंधापन नहीं होना चाहिए, उसमें अपनी समझ की रोशनी भी जरूरी है।
तुम्हारे शब्द और तुम्हारे व्यवहार,
एक समय के बाद एक-दूसरे से मेल नहीं खाते थे।
मैं शब्दों को सच मानता रहा,
और व्यवहार उस सच का धीरे-धीरे खंडन करता रहा।
जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा बदला,
वह तुम्हारा जाना नहीं, तुम्हारा सच सामने आना था।
तब जाना,
किसी को खोने से ज्यादा कठिन कभी-कभी यह मानना होता है कि हम उसे ठीक से जानते ही नहीं थे।
मैंने तुम्हारी गलती को अपनी कमी समझ लिया,
बहुत दिनों तक खुद को ही कटघरे में खड़ा रखा।
फिर धीरे से यह बात समझ आई,
दूसरे की बेईमानी का बोझ अपने चरित्र पर उठाना जरूरी नहीं।
अब किसी पर भरोसा करते हुए मन जल्दबाज़ी नहीं करता,
पहले समय को इंसान की असलियत दिखाने देता है।
बातों से प्रभावित होना कम हुआ है,
छोटी-छोटी जिम्मेदारियों में निभाया गया सच ज्यादा दिखाई देता है।
तुमसे मिला सबक यह नहीं कि किसी पर भरोसा मत करना,
बल्कि यह कि भरोसा करते हुए खुद को भूलना मत।
रिश्ते में जगह दो,
पर अपनी सीमाओं की कीमत पर नहीं।
कभी पुरानी यादें अच्छी लगती हैं,
फिर अचानक वही यादें एक नया सवाल छोड़ जाती हैं।
क्या जो अपनापन मैंने महसूस किया था, वह तुम्हारे लिए भी उतना ही सच्चा था?
इसका जवाब अब जानना जरूरी नहीं लगता।
तुम्हारे विश्वासघात ने मुझे लोगों से दूर नहीं किया,
बस अपने मन की आवाज़ के करीब कर दिया।
अब कोई बात गलत लगे,
तो उसे सिर्फ इसलिए सही नहीं मानता कि सामने वाला अपना है।
मैं फिर भरोसा करूँगा,
क्योंकि तुम्हारी वजह से अपनी अच्छी आदतें नहीं बदलना चाहता।
बस अगली बार किसी को अपना बनाते हुए,
अपने आत्मसम्मान और समझ को भी उतनी ही जगह दूँगा।
तुमने मेरा भरोसा एक दिन में नहीं तोड़ा,
पहले छोटी-छोटी बातों को अनदेखा किया, फिर सच छिपाने लगे।
मुझे चोट उस आखिरी बात से कम लगी,
जितनी यह समझने में लगी कि जिसे अपना माना, उसे मुझसे ईमानदार होना जरूरी नहीं लगा।
मैंने तुम्हारी बातों पर सवाल इसलिए नहीं किए,
क्योंकि भरोसे में हर बात की जाँच नहीं की जाती।
अब पीछे देखता हूँ तो समझ आता है,
मेरी सच्चाई गलत नहीं थी, बस जगह गलत चुन ली थी।
तुम्हारे बदलते व्यवहार ने मुझे खुद से सवाल करवाए,
कहीं मैंने ही तुम्हें जरूरत से ज्यादा अपना तो नहीं मान लिया।
फिर समझ आया,
किसी को दिल से जगह देना कमजोरी नहीं, बस उसके साथ जिम्मेदारी भी आती है।
तुमने जो कहा और जो किया,
उन दोनों के बीच की दूरी सबसे ज्यादा चुभी।
शब्दों पर यकीन करना आसान था,
पर व्यवहार ने धीरे-धीरे वह यकीन अपने आप बदल दिया।
अब हर नए रिश्ते में मन थोड़ा ठहरता है,
पहले भरोसा करने के बजाय समय को बोलने देता हूँ।
क्योंकि मीठी बातें किसी को अपना नहीं बनातीं,
किसी का लगातार एक जैसा रहना बनाता है।
तुम्हारे जाने का दुख अपनी जगह है,
पर उससे ज्यादा अफसोस उस सहजता का है जो तुम्हारे साथ चली गई।
अब किसी के करीब आते ही मन पूरी तरह नहीं खुलता,
उसे पहले यह देखना होता है कि सामने वाला भरोसे को संभाल सकता है या नहीं।
मैंने तुम्हारे विश्वासघात को अपनी कमी मानना छोड़ दिया,
हर रिश्ते में खुद को दोषी ठहराना न्याय नहीं।
तुमने जैसा व्यवहार चुना,
उसकी जिम्मेदारी मेरे चरित्र पर नहीं रखी जा सकती।
कभी पुरानी बातें याद आती हैं,
तो मन उलझता है कि उनमें कितना सच था।
अब उन यादों को मिटाने की जरूरत नहीं लगती,
बस उन्हें उतना ही सच मानता हूँ जितना उस समय मैंने महसूस किया था।
तुमसे मिली चोट ने मुझे कठोर नहीं बनाया,
बस थोड़ा सजग कर दिया।
अब भरोसा करता हूँ,
मगर अपनी सीमाओं को साथ रखकर।
शायद किसी पर फिर से पूरा विश्वास करने में समय लगे,
पर मैंने विश्वास करना छोड़ा नहीं।
बस अब इतना जानता हूँ,
किसी को अपना मानने से पहले खुद के भरोसे को सुरक्षित रखना भी जरूरी है।
तुमने जो खोया, उसका हिसाब मैं नहीं रखता,
क्योंकि मेरा उद्देश्य तुम्हें पछताना नहीं है।
मुझे बस इतना सीखना था,
कि किसी के विश्वासघात के बाद भी अपनी सच्चाई पर विश्वास बचाए रखा जा सकता है।
तुम पर भरोसा करना मेरी भूल नहीं थी,
तुम्हारे उस भरोसे के लायक न निकलना तुम्हारा चुनाव था।
मैंने रिश्ते को सच्चाई से देखा था,
इसलिए तुम्हारे बदल जाने का दुख आज भी इतना साफ़ महसूस होता है।
तुम्हारी कही बातों पर कभी दोबारा सोचा नहीं,
क्योंकि अपने लोगों की बात पर शक करने की आदत नहीं थी।
अब वही पुरानी बातें याद आती हैं,
तो उनके अर्थ से ज्यादा अपनी सादगी याद आती है।
चोट तुम्हारे दूर जाने से नहीं लगी,
चोट इस बात की थी कि जिस जगह खुद को सुरक्षित समझा था, वहीं मन असहज हो गया।
उस दिन से मैंने दरवाज़े बंद नहीं किए,
बस किसी को भीतर आने से पहले थोड़ा समय देना सीख लिया।
तुमने जो तोड़ा, वह सिर्फ एक रिश्ता नहीं था,
मेरी सहजता भी कुछ समय के लिए तुम अपने साथ ले गए।
हर नई पहचान में मन पहले ठहरता है,
जैसे किसी पुराने अनुभव से पूछ रहा हो—इस बार कितना भरोसा करना ठीक होगा?
बहुत दिनों तक सोचता रहा,
क्या हमारी पुरानी बातें भी उतनी ही सच्ची थीं जितनी मुझे लगती थीं।
फिर समझ आया,
किसी के गलत फैसले से हमारे साथ बिताया हर अच्छा पल झूठा नहीं हो जाता।
मैंने तुम्हारे व्यवहार को अपने मूल्य का प्रमाण मान लिया था,
यही बात सबसे देर से समझ आई।
तुमने मेरा भरोसा तोड़ा,
लेकिन मेरी नीयत, मेरी सच्चाई और मेरा सम्मान तुमसे तय नहीं होता।
अब किसी पर विश्वास करने से डर नहीं लगता,
बस विश्वास को जल्दबाज़ी में सौंपने की आदत नहीं रही।
समय को भी अपना काम करने देता हूँ,
क्योंकि सच्चे रिश्ते शब्दों से नहीं, लगातार व्यवहार से पहचाने जाते हैं।
तुम्हारे बाद मैंने रिश्तों में एक बात सीखी,
अपनापन और सीमाएँ साथ-साथ रखी जा सकती हैं।
किसी को अपना मानना खूबसूरत है,
पर अपनी आवाज़ को खो देना उसकी कीमत नहीं होनी चाहिए।
तुमसे मिली चोट को नफरत में बदलना आसान था,
पर उससे मेरे भीतर भी वही कठोरता आ जाती जो मुझे पसंद नहीं।
इसलिए तुम्हें माफ़ किया या नहीं, यह भी अब जरूरी नहीं,
बस इतना जरूरी है कि तुम्हारे किए को दोबारा अपनी जिंदगी पर हावी न होने दूँ।
आज भी भरोसा करने से पहले मन थोड़ा सावधान रहता है,
शायद यह कमजोरी नहीं, अनुभव की आवाज़ है।
मैं फिर किसी को जगह दूँगा,
मगर इस बार अपनी समझ और आत्मसम्मान को साथ रखकर।