जो मुझे नज़रअंदाज़ करते रहे,
मैंने उन्हें मनाने की कोशिश नहीं की,
कुछ लोग जवाब सुनकर बदलते हैं,
कुछ लोग नतीजे देखकर।
जिस मेज़ पर मेरी राय की कोई जगह नहीं थी,
आज वहीं मेरे काम की मिसाल दी जाती है,
वक़्त ने कुछ नहीं बदला,
बस मेहनत ने पहचान लिख दी।
उन्होंने सोचा था मैं टूट जाऊँगा,
मैंने सोचा था मैं रुकूँगा नहीं,
आख़िर में फ़र्क बस इतना रहा,
उनका अंदाज़ा ग़लत निकला।
मैंने हर अपमान को याद रखा,
नफ़रत के लिए नहीं,
ख़ुद को याद दिलाने के लिए
कि मुझे कहाँ तक पहुँचना है।
जो लोग मेरी नाकामी का इंतज़ार कर रहे थे,
उन्हें सबसे लंबा इंतज़ार वही करना पड़ा,
क्योंकि मैं गिरा ज़रूर,
मगर ठहरा कभी नहीं।
मेरी ख़ामोशी को कमज़ोरी समझने वालों,
शोर मचाना मुझे भी आता था,
मगर मैंने अपनी ऊर्जा
परिणामों के लिए बचाकर रखी।
अब मैं किसी को ग़लत साबित करने नहीं निकलता,
मैं बस अपने सपनों को सही साबित करता हूँ,
और यही बात सबसे ज़्यादा चुभती है।
जिन्होंने रास्ते में दरवाज़े बंद किए थे,
मैंने दीवारों से लड़ाई नहीं की,
अपना रास्ता बना लिया,
और वही मेरी पहचान बन गया।
तुमने मुझे पीछे छोड़ने की कोशिश की थी,
मैंने आगे निकलने पर ध्यान दिया,
फ़र्क नीयत का था,
इसलिए मंज़िल भी अलग मिली।
मैंने कभी बदला लेने की कसम नहीं खाई,
मैंने बस ख़ुद से वादा किया था,
कि अगली बार मेरी पहचान
मेरे परिचय की मोहताज नहीं होगी।
कुछ लोग मेरी चुप्पी पर हँसते थे,
आज मेरी व्यस्तता पर बात करते हैं,
इंसान वही है,
बस उपलब्धियाँ बोलने लगी हैं।
जिस दिन मुझे कम आँका गया था,
उसी दिन मेरा आत्मविश्वास जन्मा था,
क्योंकि कभी-कभी सम्मान नहीं,
असम्मान इंसान को बड़ा बना देता है।
मैंने किसी की ओर उँगली नहीं उठाई,
अपने स्तर को उठाया है,
और यही वह जवाब है
जिसका कोई जवाब नहीं होता।
वक़्त ने मुझे मज़बूत नहीं बनाया,
वक़्त ने सिर्फ़ मौक़ा दिया,
मज़बूत तो मैं उन दिनों बना
जब हार मानना आसान था।
अब मुझे साबित करने की जल्दी नहीं,
मेरी यात्रा ही मेरा परिचय है,
जो समझना चाहें समझ लें,
जो न समझें, उन्हें नतीजे समझा देंगे।
मैंने अपने ज़ख्मों को कहानी नहीं बनाया,
सीढ़ी बना लिया,
और आज जो ऊँचाई दिख रही है,
वह उसी चढ़ाई की कीमत है।
कुछ लोग मुझे रोककर जीतना चाहते थे,
मैंने बढ़कर जीतना चुना,
इसलिए उनकी जीत छोटी रही,
और मेरा सफ़र लंबा।
मैं अब किसी की मंज़ूरी नहीं ढूँढ़ता,
क्योंकि जिस दिन ख़ुद की नज़र में उठ गया,
उस दिन दुनिया की राय
अपना वज़न खो बैठी।
जो लोग कहते थे कि मुझसे नहीं होगा,
आज वही लोग पूछते हैं कैसे हुआ,
मैं मुस्कुरा देता हूँ,
क्योंकि जवाब वर्षों की मेहनत में छिपा है।
मैंने अपनों से मिले सबक भी संभालकर रखे हैं,
क्योंकि चोट जितनी क़रीब से मिलती है,
इंसान उतना ही गहरा बनता है।
मुझे हराने की कोशिश करने वालों का शुक्रिया,
उन्होंने मेरी राह मुश्किल की थी,
और मुश्किल रास्ते ही
मज़बूत मुसाफ़िर बनाते हैं।
मैंने अपने ग़ुस्से को निर्णय नहीं बनने दिया,
उसे ईंधन बनाया,
तभी तो सफ़र आगे बढ़ा,
वरना मैं भी बहसों में उलझा रह जाता।
आज मेरी सफलता शोर नहीं करती,
मगर बहुत कुछ कह जाती है,
क्योंकि कुछ जवाब लिखे नहीं जाते,
जीए जाते हैं।
मैं बदला लेने नहीं लौटा,
मैं बदलकर लौटा हूँ,
और कई बार यही परिवर्तन
सबसे गहरा उत्तर होता है।
जिन्होंने मेरी सीमाएँ तय कर दी थीं,
उन्हें यह नहीं पता था,
कि मैं उनकी सोच से नहीं,
अपनी मेहनत से तय होता हूँ।
मेरे बारे में राय बनाना आसान था,
मेरी यात्रा समझना नहीं,
इसलिए लोगों ने बातें ज़्यादा कीं,
और मैंने काम।
जो मुझे ठुकराकर आगे बढ़ गए थे,
उन्हें मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी,
मैं इतना आगे निकल आया
कि अब पीछे कुछ दिखता ही नहीं।
मैंने कभी किसी को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं की,
बस ख़ुद को ऊँचा उठाने में लग गया,
और यही फ़र्क
पूरी कहानी बदल गया।
मेरे धैर्य को लोग हार समझ बैठे थे,
उन्हें क्या पता था,
मैं सही समय तक
अपनी तैयारी पूरी कर रहा था।
अब मैं किसी की याद में नहीं जलता,
अपने लक्ष्य के लिए जलता हूँ,
और यह आग बर्बाद नहीं करती,
पहचान बनाती है।
कुछ रिश्ते टूटे तो अफ़सोस हुआ,
मगर उसी टूटन ने सिखाया,
कि अपनी क़ीमत जानने वाला इंसान
कभी सस्ता नहीं पड़ता।
मुझे गिराने वालों ने बहुत कोशिश की,
मगर एक बात भूल गए,
मैं मंज़िल से पहले नहीं रुकता,
और रुकने वालों में नहीं गिना जाता।
मैंने अपने विरोधियों को जवाब नहीं भेजा,
मैंने अपनी उपलब्धियाँ भेज दीं,
क्योंकि शब्दों पर बहस होती है,
नतीजों पर नहीं।
जो लोग मेरी चुप्पी का मज़ाक उड़ाते थे,
आज मेरी मौजूदगी महसूस करते हैं,
कुछ सफ़र ऐसे होते हैं
जो इंसान को नहीं, उसकी हैसियत को बदल देते हैं।
मेरे पास किसी से हिसाब नहीं बचा,
मैंने सब मेहनत में जोड़ दिया,
और जब जीवन आगे बढ़ता है,
तो पुराने कर्ज़ अपने आप छोटे पड़ जाते हैं।
मैंने दर्द को छिपाया नहीं,
उसे दिशा दे दी,
और दिशा मिला हुआ दर्द
अक्सर असाधारण परिणाम देता है।
आज मैं वहाँ खड़ा हूँ
जहाँ पहुँचने का सपना भी कभी दूर था,
और सबसे अच्छी बात यह है,
मैं यहाँ किसी को हराकर नहीं, ख़ुद को बनाकर पहुँचा हूँ।
जिन्होंने मेरी ख़ामोशी को मेरी हद समझ लिया था,
आज वही लोग मेरी दूरी का मतलब समझने लगे हैं।
मैंने जवाब देने में वक़्त नहीं गंवाया,
मैंने ख़ुद को इतना बेहतर बनाया कि सवाल ही बदल गए।
कभी मेरी मौजूदगी को साधारण कहकर टाल दिया गया था,
अब मेरी कामयाबी का ज़िक्र बिना चाहे भी हो जाता है।
मैंने किसी की हार की दुआ नहीं की,
बस अपनी मेहनत को इतना ऊँचा कर दिया कि तुलना ही बेकार हो गई।
ताने सुनकर भी मैंने रास्ता नहीं बदला,
क्योंकि मुझे पता था मंज़िल तालियों से नहीं, लगातार चलने से मिलती है।
आज जो लोग मेरी क़ीमत गिनते हैं,
उन्हें क्या पता मैं ख़ुद को तब भी जानता था जब कोई साथ नहीं था।
जिस दिन मुझे कम आँका गया,
उसी दिन मैंने तय कर लिया था कि बहस नहीं करूँगा।
कुछ फ़ैसले शब्दों से नहीं, उपलब्धियों से सुनाए जाते हैं,
और मेरा जवाब भी उन्हीं में से एक है।
मैंने दर्द को हथियार नहीं बनाया,
उसे आदतों में बदला, अनुशासन में बदला, पहचान में बदला।
अब जो फ़र्क दिख रहा है, वह अचानक नहीं आया,
यह उन दिनों की कमाई है जब किसी को मुझ पर यक़ीन नहीं था।
मुझे गिराने वालों से कोई शिकायत नहीं रही,
उन्होंने बस इतना किया कि मुझे अपनी ऊँचाई ख़ुद बनानी पड़ गई।
और यक़ीन मानो,
ख़ुद बनाई हुई ऊँचाइयाँ सबसे ज़्यादा देर तक टिकती हैं।