मैंने अपनी पहचान लोगों की याददाश्त पर नहीं छोड़ी,
जो हूँ, उसे अपने कर्मों में लिख दिया है।
हर किसी को खुश रखने की कोशिश में
इंसान अक्सर ख़ुद से दूर हो जाता है,
मैंने यह गलती समय रहते छोड़ दी।
अब मेरी ख़ामोशी में भी आत्मविश्वास है,
क्योंकि हर बात का जवाब देना
परिपक्वता नहीं होता।
मैं वहाँ नहीं रुकता
जहाँ मुझे बार-बार अपनी अहमियत बतानी पड़े,
सम्मान समझाया नहीं जाता, महसूस किया जाता है।
मैंने अपनी अच्छाई बचाकर रखी है,
मगर उसकी कीमत पर कभी
अपना आत्मसम्मान नहीं बेचा।
जो लोग मुझे समझ नहीं पाए,
उनसे शिकायत नहीं है,
हर किताब हर पाठक के लिए नहीं होती।
मैंने अपनी सीमाएँ तय की हैं,
और यही सीमाएँ मुझे
टूटने से बचाती हैं।
अब मैं अपनी शांति की रक्षा करता हूँ,
क्योंकि दुनिया में सबसे महँगी चीज़
अक्सर मन का संतुलन होता है।
मैंने देर से सही, मगर यह समझ लिया,
कि अपनी जगह खोकर किसी को पाना
असल में हार ही है।
मुझे भीड़ में पहचाने जाने का शौक नहीं,
मैं बस इतना चाहता हूँ
कि मेरी मौजूदगी मेरे चरित्र से याद रखी जाए।
मैंने अपने लिए ऐसे उसूल चुने हैं
जो सुविधा के नहीं, सम्मान के साथी हैं।
अब मैं किसी की स्वीकृति का इंतज़ार नहीं करता,
जो निर्णय आत्मविश्वास से लिया जाए,
उसे प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती।
मैंने ख़ुद को कम करके पेश करना छोड़ दिया है,
विनम्र होना और अपनी क़ीमत भूल जाना
दो अलग बातें हैं।
जहाँ मेरी नीयत पर शक हो,
वहाँ मेरी सफ़ाई भी बेकार है,
कुछ जगहों से सम्मान के साथ निकल जाना बेहतर है।
मैं अपनी कमियों से भी परिचित हूँ,
शायद इसी वजह से मेरा आत्मविश्वास
दिखावे पर नहीं टिका।
अब मैं हर रिश्ते में एक बात देखता हूँ,
क्या वहाँ सम्मान है?
बाक़ी बातें बाद में आती हैं।
मैंने ख़ुद को खोकर बहुत कुछ सीखा है,
और अब ख़ुद को पाकर
कुछ खोने का डर नहीं रहा।
मुझे अपनी यात्रा पर भरोसा है,
क्योंकि मैंने शॉर्टकट नहीं,
सच्चाई के रास्ते चुने हैं।
मैंने दूसरों की नज़रों में बड़ा बनने से पहले
अपनी नज़रों में साफ़ रहना चुना है।
अब मैं वहाँ ऊर्जा नहीं लगाता
जहाँ मेरी क़दर ही न हो,
क्योंकि आत्मसम्मान भी
समय की तरह अनमोल होता है।
मैंने यह नहीं सीखा कि लोग क्या सोचते हैं,
मैंने यह सीखा है कि
मैं अपने बारे में क्या सोचता हूँ।
मेरी सबसे बड़ी ताक़त यह नहीं
कि मैं कभी नहीं गिरा,
बल्कि यह है कि गिरकर भी
मैंने अपनी क़ीमत कम नहीं आँकी।
मैं हर अवसर के पीछे नहीं भागता,
कुछ अवसर छोड़ देना भी
स्वाभिमान का हिस्सा होता है।
अब मुझे ख़ुद को साबित करने की जल्दी नहीं,
सच्ची पहचान समय के साथ
अपने आप सामने आ जाती है।
मैंने अपने भीतर की आवाज़ सुनना सीख लिया है,
और उसके बाद बाहरी शोर
पहले जितना प्रभाव नहीं डालता।
जो मुझे सम्मान देते हैं,
मैं उन्हें दिल से जगह देता हूँ,
और जो नहीं देते,
उन्हें दूरी से।
मैंने अपने जीवन का केंद्र
दूसरों की राय को नहीं बनने दिया,
इसीलिए मेरा संतुलन बचा रहा।
अब मैं तुलना से नहीं,
प्रगति से प्रेरित होता हूँ,
क्योंकि हर इंसान का रास्ता अलग होता है।
मैंने अपने आत्मसम्मान को
परिस्थितियों के भरोसे नहीं छोड़ा,
उसे अपने चरित्र का हिस्सा बना लिया।
मेरे पास शायद सब कुछ न हो,
मगर मेरे पास ख़ुद का सम्मान है,
और कई बार यही इंसान की
सबसे बड़ी संपत्ति होती है।
मेरी क़ीमत का फ़ैसला कभी भीड़ ने नहीं किया,
मैंने ख़ुद को उन दिनों भी पहचाना है
जब मेरे लिए कोई ताली नहीं बजती थी।
अब मैं हर किसी को प्रभावित करने नहीं निकलता,
कुछ सफ़र मंज़ूरी के लिए नहीं,
अपने वजूद को समझने के लिए तय किए जाते हैं।
मैंने ख़ुद को साबित करने की ज़िद छोड़ दी,
जिसे समझना होगा वह व्यवहार से समझ लेगा,
और जिसे नहीं समझना,
उसे शब्द भी नहीं समझा सकते।
अब हर दरवाज़े पर दस्तक नहीं देता,
जहाँ सम्मान नहीं मिलता, वहाँ ठहरता नहीं,
क्योंकि आत्मसम्मान ने मुझे सिखाया है
कि हर जगह मौजूद होना ज़रूरी नहीं।
मैंने अपने लिए ऊँची आवाज़ नहीं चुनी,
ऊँचे उसूल चुने हैं,
शोर कुछ देर सुनाई देता है,
चरित्र बहुत देर तक।
कभी मैं लोगों की राय से प्रभावित हो जाता था,
फिर समझ आया कि जो ख़ुद को जानता है,
उसे परिचय बार-बार नहीं देना पड़ता।
मैं किसी से बेहतर बनने की दौड़ में नहीं हूँ,
मैं बस कल वाले अपने आप से आगे निकलना चाहता हूँ,
और यही तुलना मुझे सुकून देती है।
अब मैं रिश्तों में भी अपनी जगह पहचानता हूँ,
जहाँ सम्मान शर्तों पर मिले,
वहाँ दूरी अक्सर सबसे समझदार निर्णय होती है।
मेरे भीतर जो भरोसा है,
वह तारीफ़ों से नहीं बना,
वह उन दिनों से बना है
जब मुझे अकेले अपने पक्ष में खड़ा होना पड़ा था।
मैंने ख़ुद को बदलकर लोगों को नहीं रखा,
जो मेरे स्वभाव में सम्मान देख सके, वे रहे,
जो अभिनय चाहते थे,
वे रास्ते बदलते गए।
अब मैं कम समझाता हूँ, ज़्यादा जीता हूँ,
क्योंकि कुछ सच्चाइयाँ बोली नहीं जातीं,
व्यवहार में दिखाई देती हैं।
मैंने यह भी सीखा है कि हर असहमति दुश्मनी नहीं होती,
और हर दूरी नुकसान नहीं होती,
कई बार दोनों ही
आत्मसम्मान की रक्षा करते हैं।
मुझे अपनी पहचान ऊँची दिखाने की ज़रूरत नहीं,
मैं इतना जानता हूँ कि
जिस इंसान की नज़र में वह ख़ुद गिरा नहीं,
उसे दुनिया झुका नहीं सकती।
अब मेरी शांति किसी की स्वीकृति पर निर्भर नहीं,
मैंने अपने भीतर एक ऐसी जगह बना ली है
जहाँ सम्मान पहले से मौजूद है।
मैंने ख़ुद को अपनाने के बाद जाना,
कि सबसे मज़बूत आत्मविश्वास वही होता है
जो तुलना से नहीं,
स्वीकार से जन्म लेता है।
कुछ लोग अपनी अहमियत साबित करते रहते हैं,
मैं अपनी ऊर्जा बचाकर रखता हूँ,
क्योंकि असली मूल्य को
घोषणाओं की ज़रूरत नहीं होती।
आज मैं वहीं हूँ जहाँ मुझे होना चाहिए,
न किसी से ऊपर, न किसी से नीचे,
बस अपनी नज़रों में पूरा,
और कई बार यही सबसे बड़ी जीत होती है।