कई बार कोशिश करते-करते यह सवाल उठता है,
आखिर कितनी बार खुद को फिर से समझाऊँ।
फिर मन कहता है, संख्या मत गिन,
बस इतना देख कि आज भी तूने कोशिश छोड़ी नहीं।
कुछ हारें आत्मविश्वास को भीतर तक हिला देती हैं,
फिर भी अगले दिन वही काम सामने खड़ा रहता है।
मैंने खुद को महान बनने के लिए नहीं,
बस अपने वादे से पीछे न हटने के लिए संभाला है।
जब उम्मीद बार-बार टूटती है,
तो उसे फिर से जोड़ना भी मेहनत लगता है।
मैंने पूरी उम्मीद माँगी ही नहीं,
बस अगले प्रयास तक टिके रहने जितना भरोसा रखा।
कभी लगता है कि समय निकल रहा है,
और मैं अपनी जगह से बहुत कम आगे बढ़ा हूँ।
फिर पुराने दिनों को याद करता हूँ,
तो पता चलता है कि रफ्तार धीमी थी, ठहराव नहीं।
हर असफलता के बाद रास्ता बदलना जरूरी नहीं,
कभी-कभी केवल अपना तरीका बदलना पड़ता है।
मैंने भी यही सीखा,
हार से पहले खुद को बदलना बेहतर है, उद्देश्य को नहीं।
कुछ लोग पूछते हैं, अब भी क्यों लगे हो,
मेरे पास इसका कोई बड़ा जवाब नहीं।
बस इतना जानता हूँ,
जिस काम को दिल से चुना है, उसे अधूरा छोड़ना मुझे ठीक नहीं लगता।
कभी डरता हूँ कि फिर वही परिणाम आएगा,
फिर सारी मेहनत खाली लग सकती है।
लेकिन इस डर के कारण रुक जाऊँ,
तो पहले ही अपने हाथों से एक संभावना खत्म कर दूँगा।
मेरी प्रगति हमेशा दूसरों को दिखाई नहीं देती,
क्योंकि हर बदलाव किसी उपलब्धि की तरह सामने नहीं आता।
कुछ बदलाव बस इतने होते हैं,
कि कल जो बात तोड़ देती थी, आज वही मुझे संभलकर सोचने देती है।
मैंने खुद से यह वादा नहीं किया कि कभी हारूँगा नहीं,
बस यह तय किया कि हार को अपना अंतिम परिचय नहीं बनने दूँगा।
जहाँ गलती होगी, वहाँ सीखूँगा,
जहाँ समय लगेगा, वहाँ धैर्य रखूँगा।
अगर आज फिर सब कुछ उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ,
तो इसका मतलब यह नहीं कि सारी कोशिश बेकार थी।
कुछ प्रयास परिणाम देते हैं,
और कुछ हमें अगली कोशिश के लिए पहले से अधिक तैयार छोड़ जाते हैं।
कई बार लगा कि अब कुछ बचा नहीं है,
फिर देखा तो हाथों में एक छोटी-सी कोशिश अब भी थी।
उसी को थामा और आगे बढ़ता रहा,
हर बार उम्मीद बड़ी हो, यह जरूरी नहीं, उसका बचा रहना काफी है।
हार के बाद फिर शुरुआत करना कठिन होता है,
क्योंकि पिछली निराशा बार-बार रोकती है।
फिर भी मैंने अपने डर को सुना जरूर,
लेकिन अपने फैसले की जगह उसे कभी नहीं दी।
कुछ दिनों में काम आगे नहीं बढ़ा,
कुछ दिनों में खुद पर भरोसा भी कम हुआ।
फिर भी मैंने रुकने को अंतिम निर्णय नहीं माना,
क्योंकि थका हुआ मन हर चीज़ को अंत समझ लेता है।
मैंने कई बार अपना तरीका बदला,
पर अपने उद्देश्य को हर असफलता के साथ नहीं बदला।
जहाँ गलती थी वहाँ सुधरा,
जहाँ समय चाहिए था वहाँ खुद को थोड़ा और समय दिया।
किसी को दिखाई नहीं देती वह मेहनत,
जो बार-बार टूटे आत्मविश्वास को जोड़कर की जाती है।
मैंने वही मेहनत की है,
हर सुबह खुद को फिर से काम के लिए तैयार करके।
धीरे बढ़ने की अपनी एक परीक्षा होती है,
हर दिन कोई बड़ी उपलब्धि सामने नहीं आती।
फिर भी छोटे सुधारों को नज़रअंदाज़ नहीं किया,
क्योंकि लंबे सफर में यही छोटे बदलाव टिकते हैं।
कभी लगा कि दूसरों की रफ्तार बहुत आगे निकल गई,
और मैं अपनी जगह पर ही अटका हूँ।
फिर खुद को याद दिलाया,
मेरा काम किसी और की गति से नहीं, अपनी सच्चाई से तय होगा।
मैंने हर असफलता के बाद खुद को दोष नहीं दिया,
कुछ बातें मेरी गलती थीं, कुछ मेरे बस में नहीं।
जहाँ सुधार संभव था वहाँ मेहनत की,
और जहाँ नियंत्रण नहीं था, वहाँ स्वीकार करना सीखा।
थककर रुकना मुझे अब भी आता है,
लेकिन रुकने और छोड़ देने का फर्क समझ गया हूँ।
आराम लेकर लौटना कमजोरी नहीं,
अपने उद्देश्य को हमेशा के लिए छोड़ देना अलग बात है।
आज भी मुझे नहीं पता कि आगे क्या होगा,
पर इतना जानता हूँ कि कोशिश अभी बाकी है।
जब तक भीतर अपने काम के लिए ईमानदारी बची है,
तब तक मेरे लिए कहानी खत्म नहीं हुई है।
कई बार मन ने कहा, अब इस कोशिश का क्या अर्थ है,
पर भीतर से आवाज़ आई, पहले यह देख कि तू कितना बदल चुका है।
नतीजा अभी दूर है तो रहने दे,
हर प्रयास का असर तुरंत दिखाई दे, यह भी जरूरी नहीं।
थकान ने कई बार मेरी रफ्तार कम की,
लेकिन मेरे इरादे को खत्म नहीं किया।
मैंने रुककर खुद को संभाला जरूर,
पर जिस चीज़ को सच मानता था, उसे यूँ ही छोड़ नहीं दिया।
कुछ असफलताएँ इतनी लगातार आईं,
कि उम्मीद भी कभी-कभी बोझ लगने लगी।
फिर भी हर नए दिन थोड़ा-सा विश्वास बचा लिया,
क्योंकि पूरी उम्मीद न सही, एक कदम के लिए जितना चाहिए उतना काफी था।
डर आज भी आता है कि फिर वही न हो जाए,
फिर मेहनत के बाद हाथ खाली न रह जाएँ।
लेकिन अब डर को निर्णय नहीं करने देता,
क्योंकि पिछली हार से इतना तो सीखा है कि कोशिश रोकना समाधान नहीं।
मैंने अपने सपने को शोर नहीं बनाया,
उसे अपनी रोज़मर्रा की जिम्मेदारी की तरह निभाया।
कोई पूछे या न पूछे कि कितना आगे बढ़ा,
मुझे पता है कि मैंने उसे बीच में छोड़ा नहीं।
कभी-कभी प्रगति इतनी छोटी होती है,
कि खुद को भी उसका एहसास नहीं होता।
फिर पुराने दिनों को याद करता हूँ,
तो समझ आता है कि मैं वहीं नहीं हूँ जहाँ पहले था।
हर बार फिर से शुरू करना आसान नहीं,
खासकर तब जब पिछली बार की निराशा ताज़ा हो।
फिर भी हाथ काम पर लग जाते हैं,
क्योंकि कुछ चीज़ें इच्छा से नहीं, प्रतिबद्धता से चलती हैं।
मैंने असफलता को अपनी पहचान नहीं बनने दिया,
उसे बस अपनी कहानी का एक कठिन हिस्सा माना।
जहाँ गलती थी, वहाँ सुधार किया,
जहाँ समय चाहिए था, वहाँ धैर्य रखना सीखा।
किसी दिन हिम्मत कम हो तो खुद को कमजोर मत समझना,
हर इंसान के भीतर ऐसे दिन आते हैं।
बस अपने भीतर की पूरी कहानी एक थके हुए दिन से मत लिखना,
कल फिर अपने लिए कुछ करने की जगह बचाकर रखना।
मुझे नहीं पता यह कोशिश कहाँ तक जाएगी,
लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि मैं इसे ईमानदारी से निभा रहा हूँ।
शायद यही मेरा सबसे सच्चा आत्मविश्वास है,
कि अनिश्चित परिणाम के बावजूद मैंने अपना प्रयास छोड़ना नहीं चुना।
कई बार लगा कि अब और कोशिश करने की ताकत नहीं बची,
फिर भी अपने अधूरे काम को यूँ ही छोड़ना मन ने नहीं माना।
थकान आज भी आती है,
बस अब उसे फैसला करने का अधिकार नहीं देता।
हर बार उम्मीद के मुताबिक कुछ नहीं हुआ,
कई बार अपने ही फैसलों पर भरोसा डगमगाया।
फिर भी जिस बात के लिए निकला था,
उसे बीच में छोड़ देना मुझे अपनी ही नज़र में भारी लगता था।
कुछ दिन ऐसे भी आए जब लगा,
शायद यह सपना मेरे लिए नहीं है।
फिर मैंने सपना नहीं बदला,
पहले खुद को समझने और अपनी कमी सुधारने की कोशिश की।
बार-बार असफल होने के बाद भी,
मेरी कोशिश पहले जैसी नहीं रही।
अब मैं केवल दोबारा शुरू नहीं करता,
हर बार पिछली गलती को साथ लेकर थोड़ा बेहतर शुरू करता हूँ।
डर अब भी है, संदेह भी आता है,
और कई बार मन पीछे लौटने को कहता है।
लेकिन भीतर एक बात साफ है,
जब तक कारण जीवित है, कोशिश की गुंजाइश भी जीवित है।
धीरे बढ़ना मुझे मंज़ूर है,
बस अपने ही हाथों रुक जाना मंज़ूर नहीं।
हर दिन बहुत कुछ नहीं बदलता,
पर रोज़ थोड़ा निभाना भी एक तरह की जीत है।
जब किसी ने मेरी कोशिश पर विश्वास नहीं किया,
तब मुझे पहली बार अपने विश्वास की कीमत समझ आई।
दूसरों की स्वीकृति का इंतज़ार करता रहता,
तो शायद खुद तक भी नहीं पहुँच पाता।
कभी काम अधूरा रहा, कभी हिम्मत कम हुई,
कभी लगा कि समय मेरे पक्ष में नहीं है।
फिर भी मैंने अपने उद्देश्य से रिश्ता नहीं तोड़ा,
क्योंकि मुश्किल दौर बदल सकता है, मेरा संकल्प नहीं।
मैंने यह नहीं माना कि हर बार सफल होना जरूरी है,
बस इतना माना कि हर बार सीखकर लौटना मेरे हाथ में है।
इसी सोच ने मुझे बचाए रखा,
वरना कई बार हार बहुत समझदार लगने लगती है।
आज भी रास्ता आसान नहीं हुआ,
लेकिन अब कठिनाई देखकर मन तुरंत पीछे नहीं हटता।
मैंने खुद को यह भरोसा दिया है,
कि धीरे चल सकता हूँ, रुक सकता हूँ, संभल सकता हूँ—पर अपने निर्णय से हार नहीं मानूँगा।